डबल गेम - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग : ३/५
उपन्यास १४ नवम्बर से १६ नवम्बर के बीच में पढ़ा गया

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स
पृष्ठ संख्या : ३०१
सीरीज : सुनील #१२१


पहला वाक्य :
सुनील ब्लास्ट के ऑफिस में अपने केबिन में मौजूद था जबकि फोन की घंटी बजी। 

अचला तलवार एक गर्ल्स हॉस्टल की प्रबनधक थी। उसकी एक दोस्त थी उदिता चोपड़ा जो मॉडल बनने की तमन्नाई थी ,लेकिन अभी तक उसे कोई सफलता हासिल नहीं हुई थी। ऐसे में जब अमृत सिक्का नाम के व्यक्ति ने उसे एक काम दिया जिसके तहत उसे सुजाता सक्सेना बनकर एक फ्लैट में रहना था तो उदिता ने पैसों के चक्कर में इसके लिए हामी भर दी। उदिता किसी मुसीबत में न फंसे इसके लिए उसका साथ देने के लिए अचला तलवार भी राजी हो गयी। लेकिन फिर उन दोनों को दाल में कुछ काला लगा। सुजाता सक्सेना, जिसकी बाबत अमृत कहता था कि ये काम उसी के कहने पर हो रहा है, उन्हें खतरे में जान पड़ी और अपने इसी ख्याल की पुष्टि के लिए अचला ब्लास्ट के ऑफिस जाकर सुनील से मिली। अपना ख्याल उसपे उसने जाहिर किया तो सुनील ने मदद करना स्वीकार कर दिया।
उदिता चोपड़ा को सुजाता सक्सेना बनाने का क्या माजरा था? क्या सुनील इस राज का पता लगा पाया? और क्या अचला तलवार का शक जायज़ निकला?
ऐसे कई सवाल आपके मन में कौन्धेंगे जब आप इस उपन्यास के पृष्ठ पलटते जायेंगे।

'डबल गेम' सुनील सीरीज का १२० वाँ उपन्यास है। उपन्यास एक थ्रिलर है और काफी रोमांचक है। उपन्यास मुझे पसंद आया। उपन्यास का कथानक तेज रफ़्तार से भागता है और अंत तक पाठक की रूचि अपने में बनाए रखता है। सुनील और रमाकान्त की चुहुलबाजी भी इस उपन्यास में मनोरंजन करती है।
हाँ, उपन्यास में मुझे निम्न बातें जरूर खटकी थी।
सुजाता सक्सेना के बैग में सुनील को एक खंजर दिखा था जिसकी बाबत उसने उससे पूछा भी था ।
फिर जब उसे पता चला अमृत सिक्का का खून खंजर की वजह से हुआ तो सुजाता का ख्याल उसके ध्यान में क्यों नहीं आया??
दूसरा युथ क्लब में जब अचला ने अपना बैग सुनील के सामने खाली किया था तो उसमे बटवा नहीं मिला  था लेकिन वहाँ से निकलने के बाद जब पुलिस ने तलाशी ली तो बटवा बैग में मिला था।
जब उदिता और अचला ने पुलिस को फोन करके सिक्का की मौत के विषय में बताया तो तब उसका हैंडबैग चेक क्यों नहीं किया गया।
इनके इलावा उपन्यास में मुझे कोई कमी नहीं लगी और उपन्यास एक थ्रिलर के हिसाब से एकदम खरा उतरता है।  उपन्यास आपको पढना चाहिए।
अगर उपन्यास आपने पढ़ा है तो अपनी राय टिपण्णी बक्से में जरूर लिखियेगा और अगर आपने उपन्यास नहीं पढ़ा है तो आप निम्न लिंक से इसे मंगवा सकते हैं :
राजकॉमिक्स


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2 Comments
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  1. विकास जी आप तो खुर्दबीन निगाहों से उपन्यास पढ़ते है।

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    1. जी ऐसा तो नहीं है सुधीर जी। लेकिन अगर उपन्यास पढ़ते वक्त कुछ खटक जाता है तो उसके विषय में इधर लिख देता हूँ। आभार आपका कमेंट करने के लिए।

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