चेम्बूर का दाता - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग : ३.५ /५
उपन्यास २६ जुलाई २०१५ से २८ जुलाई २०१५ तक पढ़ा गया

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : ३०१
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स
सीरीज : विमल #३९



पहला वाक्य :

"आगे क्या होगा?"
विमल ने अपलक नीलम के तरफ देखा।

चेम्बूर का दाता विमल सीरीज कि तिकड़ी का पहला उपन्यास है। मैंने इससे पहले कि तिकड़ी तो नहीं पढ़ी है लेकिन इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मुझे कुछ कुछ पता चला की उस में क्या हुआ होगा?
विमल ने अपने सबसे बड़े दुश्मन राज बहादुर बखिया पर विजय प्राप्त कर दी थी। ऐसा करके उसने मुम्बई अंडरवर्ल्ड की नीव हिला डाली थी। इसके पश्चात जब बखिया के राईट हैण्ड इनायत दफेदार ने राजा साहब बने सोहेल पर हमला किया तो सोहल तो बच गया लेकिन वो ये गलत फहमी पैदा करने में सफल हुआ कि वो मारा जा चुका है।
उसकी कोशिश ने विमल के ठिये होटल सी व्यू को भी नष्ट कर दिया था जिससे विमल के काफी लोग मारे गए। जब दफेदार निश्चिन्त हुआ तो उस पर विमल ने ऐसा हमला किया कि दफेदार अपने साथियों समेत मारा गया।
चेम्बूर के दाता की कहानी यहीं से आगे बढ़ती है। विमल फैसला कर चुका है कि अब वो मुम्बई से ड्रग के कारोबार का नामोनिशान मिटा देगा। इसके लिए उसको ड्रग पुशर्स की जानकारी चाहिए होती है। उसे पता चलता है वो उसे विवेक दलवी नामक पत्रकर से प्राप्त हो जायेगी। लेकिन दलवी अभी पुलिस प्रोटेक्शन में है क्योंकि वो गैंगस्टर इब्राहिम बटाला के खिलाफ चश्मुदीन गवाह है। बटाला ने उसके नाम की सुपारी अपने आदमी को दी है। क्या दलवी ज़िंदा बच पायेगा?क्या विमल को वो जानकारी मिलेगी जो उसकी योजना को परवान चढाने के लिए बेहद ज़रूरी है?



होटल सी व्यू के मालिक राजा गजेन्द्र सिंह के मरने की खबर तब झुठला दी जाती है जब उसके मृत शरीर को अग्नि के हवाला करने वाला पंडित ये बताता है कि मरने वाला मुसलमान था। ये सुनकर होटल में मरे हुए लोगों के परिजन राजा साहब को मारने में आमादा है। विमल इनके गुस्से को कैसे शांत करेगा?

विमल ने अपना पैसा दादा डोलस नामक व्यक्ति के पास जमा करवाया होता है। उसके ऑपरेटर राजेश और मंगेश लोखंडे नामक दो सेज भाई है। वो नहीं जानते विमल कौन है। मंगेश को जब काफी दिनों तक कोई भी चेम्बूर के ऑफिस में नहीं मिलता तो वो इस पैसे को हथियाने की योजना बनाता है। इसके लिए वो ग्राहक यानी विमल का खून करने पर आमादा है। क्या वो अपनी कोशिशो में कामयाब होगा??

विमल गरीबों का रखवाला है। उनकी दिक्कतों को दूर करने वाला दीनबंधु दीनानाथ है। पर अभी उसका चेम्बूर का दफ्तर जहाँ उसका दरबार लगता है बंद है। लेकिन फिर भी एक व्यक्ति इस बंद दरबार की हाजरी लगाता रहता है?कौन है ये आदमी?क्या उसकी फ़रियाद सुनी जायेगी?
एक रहस्यमयी किरदार विपल्व तुलाधार के विषय में विमल को पता लगता है। कौन है वो?
इसके इलावा विमल को लग रहा है कि कोई उसके पीछे है। क्या ये उसका वहम है ? अगर कोई उस पर नज़र रख रहा है तो वो कौन हो सकता है? और इसके पीछे उसका मकसद क्या है?


मुश्किलें बहुत हैं लेकिन विमल इनसे झूझेगा। कैसे??ये तो उपन्यास पढ़ कर ही पता कर पाओगे आप।तो पढियेगा ज़रूर विमल की तिकड़ी का ये पहला उपन्यास।

अब अगर उपन्यास की बात करूँ तो उपन्यास काफी रोचक है। कहानी तेज गति से भागती है और ख़त्म होते होते मस्तिषक में कई सवाल छोड़ देती है।उपन्यास विमल के ज़िन्दगी के ५ दिन का ब्यौरा है। उपन्यास कि शुरुआत ९ जनवरी से शुरुआत होती है और अंत १३ जनवरी  पर होता है।
ये सवाल ऐसे हैं कि तिकड़ी के अगले उपन्यास को पढ़ने के आप बाध्य हो जाते हैं। मैं तो हुआ।
उपन्यास एक बेहतरीन थ्रिलर है जो पाठकों को अंत तक अपने गिरफ्त में बाँध कर रखता है।  उपन्यास में कहीं भी बोरियत नहीं हुई।  हाँ, शशिकांत माने और इब्राहम बटाला का संवाद खासतौर पर बहुत रोचक था। जिस तरीके से वो इब्राहिम की हवा टाइट करता है वो पढ़कर मज़ा आ गया। हाँ, लेकिन ये एकल उपन्यास के जैसे नहीं पढ़ा जा सकता है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उपन्यास के अंत में काफी सवाल रह जाते हैं जो इस तिकड़ी के अगले उपन्यास लाल निशान में मिलेंगे। इसलिए इस तिकड़ी का अगला उपन्यास आपके पास हो तो चैन रहेगा वरना जब तक वो नहीं आएगा बैचैनी बनी रहेगी।

उपन्यास में कोई कमी मुझे नहीं लगी। हाँ,क्योंकि मैंने इससे पहले कि तिकड़ी नहीं पढ़ी थी तो शुरुआत में उसके विषय में संक्षिप्त में कुछ लिखा होता तो ज्यादा अच्छा रहता। और उपन्यास में चेम्बूर का दफ्तर बंद ही रहता है और विमल कोई दाता  वाला काम भी नहीं करता है।  तो इस उपन्यास का शीर्षक मुझे 'चेम्बूर का दाता' कुछ जमा नहीं। शीर्षक उसके छेड़े हुए आखरी युद्ध (विमल की जुबान में) के हिसाब से होता तो ज्यादा सटीक बैठता।

उपन्यास को निम्न लिंक्स के  माध्यम से मँगवाया जा सकता है :
न्यूज़हंट
अमेज़न

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