पत्ताखोर - मधु काँकरिया

रेटिंग : ४/५
उपन्यास जून २२ से जून २७ के बीच पढ़ा गया


संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : २१२
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन



पहला वाक्य :
कनपटी पर चुनचुनाते पसीने को अपने मुड़े-तुड़े कुर्ते की बाँह से पोंछा हेमंत बाबू  ने।

आदित्य हेमंत बाबू  और  वनश्री का इकलौता बेटा था।  आदित्य एक संवेदनशील लड़का था ये बात हेमंत बाबू तो जान गये थे लेकिन वनश्री को इससे कोई लेना देना नहीं था। फिर आदित्य कि ज़िन्दगी में एक बदलाव आया जिसने उसकी ही नहीं परन्तु उसके माता पिता कि ज़िन्दगी भी बदल दी। आदित्य नशे का आदि बन गया था।
आदित्य को नशे कि आदत कैसे लगी ? इसी प्रश्न ने आदित्य के अभिभावकों को भी सकते में डाल दिया। इसके बाद शुरू हुआ संघर्ष आदित्य और नशे के बीच। नशा एक ऐसी बीमारी है जो एक बार किसी व्यक्ति को अपने गिरफ्त में ले ले फिर उसे आसानी से नहीं छोड़ता है।  क्या आदित्य इस बिमारी से निजाद पा पायेगा और अगर हाँ तो कैसे ?
इन सारी बातों को जानने के लिए आपको इस उपन्यास को पढना पड़ेगा।

नशा एक ऐसे दीमक कि तरह है जो हमारी देश कि युवा नसल को लगकर उसे कमज़ोर कर रहा है। पत्ताखोर की पृष्ठभूमि बंगाल है।  बंगाल में एक पुड़िया हेरोइन या ब्राउन शुगर को पत्ता कहा जाता है और इसका सेवन करने वाले को पत्ताखोर।  नशे कि बिमारी अब बड़े बड़े शहरों में ही सीमित नहीं रह गयी है अपितु छोटे छोटे शहरों में भी वो युवाओं को अपने गिरफ्त में ले रही है।  मधु काँकरिया जी ने उपन्यास के माध्यम से इस नशे से जुड़े हुए कई पहलुओं को उजागर किया है।

आदित्य के माध्यम से हम उन युवकों की मनः स्थिति को जानते हैं जो नशे की लत से जूझ रहे हैं।  आदित्य कई ऐसे युवकों से मिलता है जो नशे के आदि हैं और नशे से जुड़ने के अलग अलग कारणों के होते हुए भी उनका अंत एक ही होता है।  कोई दुःख को भुलाने के लिए करता है, कोई रोमांच के लिए, कोई अवसाद के चलते लेकिन कुछ दिनों के बाद उनका नशे को जारी रखने का केवल एक ही कारण होता है और वो  होता है withdrawal से छुटकारा पाना। इसके इलावा कैसे उन्हें नशे की लत लगाई जाती है, कैसे  इस धंधे में जुड़ने का प्रलोभन दिया जाता है और उनके इस जीवन से जुड़ी कई बातों से पाठक रूबरू होता है।

 नशे के आदी लोगों के परिवारों पर इस आदत का क्या असर पड़ता है, इसका भी बहुत मार्मिक वर्णन लेखिका ने किया है। लेकिन फिर वो कैसे इस सदमे से उभरते हैं और संघर्ष करते हैं वो भी पढने के बाद एक नया नजरिया पाठक को देता है।

उपन्यास के दो भाग हैं। पहले भाग में पाठक आदित्य को नशे से संघर्ष करते हुए और किंकर्तव्यविमूढ़ देखते हैं। वो जानता नहीं है कि उसे ज़िन्दगी में क्या चाहिए?फिर दूसरे भाग में आदित्य को एक नए रूप में देखते हैं। यहाँ वो असली दुनिया से वाकिफ होता है और उसे पता चलता है कि उसके अभिवाभावकों ने उसे कितना सुरक्षित जीवन दिया है।  लेखिका ने मोहनबागान लेन का जो वर्णन किया है वो भारत में किसी भी स्लम  का वर्णन हो सकता है।  कहानी पढ़ते वक़्त मुझे  लगा कि मैं मोहनबागान लेन में ही हूँ।   उपन्यास के इस हिस्से में आदित्य कि ज़िन्दगी एक नया मोड़ ले लेती है। पाठक भी इसको महसूस करेगा।

अंत में इतना ही कहूँगा कि उपन्यास कि विषय वस्तु काफी  संवेदनशील है और लेखिका ने बेहतरीन तरीके से इसे प्रस्तुत किया है।  उपन्यास पठनीय है और पात्र सारे जीवंत हैं। नशे कि दुनिया से मैं ज्यादा वाकिफ तो नहीं हुआ हूँ लेकिन इसका प्रस्तुतीकरण भी मुझे जीवंत लगा। उपन्यास मुझे काफी पसंद आया और मेरी माने तो उपन्यास को एक बार पढ़ा जाना चाहिए।

अगर आपने उपन्यास पढ़ा है तो आप अपनी राय देना न भूलियेगा और अगर आपने इस उपन्यास को नहीं पढ़ा है तो आप इस उपन्यास को निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं :
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