Sunday, June 21, 2015

हफ्ते में पढ़ी गयी कहानियाँ (८ जून से १४ जून)

पिछले  हफ्ते मैंने लमही का अप्रैल जून विशेषांक पढ़ा। इस विशेषांक में पांच कहानीयाँ थी जिनके विषय में इस पोस्ट में मैं कुछ लिखना चाहूँगा। कहानीयाँ मुझे हमेशा से ही पसंद रही है। उपन्यास पढ़ने के लिए अक्सर आपके पास पेशेंस होना ज़रूरी होता है क्यूँकी उपन्यास अक्सर आप कुछ दिनों में ही समाप्त कर पाते हैं लेकिन कहानियों को आप अक्सर कुछ ही मिनटों में पढ़कर समाप्त कर सकते हैं। आप कुछ वक़्त के लिए अपने आपको कहानी के संसार में खो देते हैं और कई बार ये ही कहानियाँ आपकी सोच को ऐसा रुख दे देती है जिस तरफ आपने विचार करने की जहमत नहीं उठायी है या उस रुख की तरफ सोचने की फुर्सत ही आपको न मिली हो। अक्सर मेरे मित्र वक़्त कि कमी को अपने साहित्य से न जुड़े होने कि वजह बताते हैं। वो कहते हैं कि वो पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन उपन्यास के विस्तृत कथानक को पढ़ने के लिए उनकी भागती दौड़ती व्यस्त ज़िन्दगी में वक़्त ही नहीं होता। ऐसे में ये कहानियाँ उन मित्रों कि साहित्यिक पिपासा शांत करने में ज़रूर लाभदायक होंगी क्यूँकी एक कहानी को पढ़ने में औसतन १५ - ३० मिनट का ही वक़्त जाता है। तो अगर आपकी भी यही मजबूरी है तो आप भी उपन्यासों कि जगह कहानियों को पढ़ सकते हैं। तो फिलहाल उन कहानियों के विषय में जो इस हफ्ते मैंने पढ़ी। जैसे कि मैं पहले कह चुका हूँ ये सारी कहानियाँ लमही, जो कि एक साहित्यिक पत्रिका है, के अप्रैल-जून अंक में प्रकाशित हुई थी।



१)अपराधियों के बीच - दिनेश पालीवाल

पहला वाक्य :
रात गहराई तो भीतर के डर ने मन को पूरी तरह जकड़ लिया।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वो समाज के साथ रहता है। लेकिन क्या उसकी समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी भी है? शहरों में अक्सर हर किसी कि अपने आप से मतलब रहता है। कोई किसी के पचड़े में हाथ डालना पसंद नहीं करता लेकिन अगर कोई व्यक्ति ऐसा करने लगे तो उसे बेवकूफ या पागल ही कहा जाता है। सदानंद भी ऐसा ही व्यक्ति था। वो एक अखबार निकालता था और शहर के बाहुबलियों के खिलाफ लिखता रहता था। इससे उसे धमकियाँ तो मिलती रहती थी ही और इसके इलावा पारिवारिक कलह भी बढ़ जाती थी। उसकी बीवी रितिका उसके इस रवैय्ये से नाराज रहती थी और एक दिन वो अपना घर छोड़ कर ही चली जाती है।
नैरेटर कि मौसी उसे रितिका को समझाने के लिए बुलाती है। क्या नैरेटर रितिका को समझा पाता है? फिर वो एक अपराधिक घटना से रूबरू होता है। वो घटना उसे इस बात का एहसास दिलाती है कि सदानंद कितना अलग था आम लोगों से और शायद यही उसका अपराध था जिसकी सजा रितिका ने घर छोड़ कर उसे दी थी।
कहानी पठनीय थी।


२)लहरों की बाँसुरी - सूरज प्रकाश
पहला वाक्य :
अभी वाशरूम में हूँ कि मोबाइल कि घंटी बजी है।
अंजलि समीर की फेसबुक मित्र थी। कुछ दिनों पहले उनके बीच थोड़ी ग़लतफ़हमी थी हो गयी थी जिसकी वजह से उनके बीच न चैटिंग हुई थी न ही बातें। ऐसे में समीर को जब अंजलि का फ़ोन आया और उसने समीर को डोमेस्टिक एअरपोर्ट में आने को कहा तो समीर का हैरान होना लाज़मी था। समीर ने अंजलि को देखा नहीं था। केवल फेसबुक और दो चार बार फ़ोन पर ही बात हुई थी। क्यों बुलाया था अंजलि ने उसे और वो भी दो तीन दिन के कपड़ों के साथ? आगे क्या हुआ ये तो आप कहानी पढ़कर ही जान पायेंगे।
लहरों की बाँसुरी दमन में समुन्दर किनारे बिताये गये कुछ दिनों कि कहानी है। जब समीर ने अंजलि को पहले देखा तो उसको एक बिंदास अति आधुनिक लड़की पाया। लेकिन अक्सर दूसरों के प्रति हमारा पहला अनुमान ठीक नहीं होता है। यही समीर और पाठक को पता चलता है। जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती जाती है वैसे वैसे पाठक अंजलि के व्यक्तित्व से भी परिचित होता जाता है। और अंजलि का सम्मान करने लगता है। कहानी मुझे पसंद आई।

३) मंडी का महाजाल - रणविजय सिंह सत्यकेतु
पहला वाक्य :
बलेसर के गीतों की गूँज के साथ ट्रेक्टर-ट्राली का काफिला मंडी में घुसा तो हर किसान की नजर गेट पर अटक गयी।
रणविजय सत्यकेतु की कहानी किसानों के परिश्रम कि कहानी है। ये एक मार्मिक कहानी है। किसान मेहनत करके धरती कि छाती चीर कर उससे अन्न रुपी सोना उगाता है लेकिन यहीं पर उसका परिश्रम समाप्त नहीं हो जाता है। अपने उगाये धन का सही मूल्य निकलवाना भी उसे पड़ता है। ऐसे में वो मंडी जाता है जहाँ अफसरों और दलालों के हाथों वो अपने आप को मजबूर पाता है। कहानी मंडी का जो हाल ब्यान करती है वो सचमुच मन को दुखी कर देता है। भारत एक कृषि प्रधान देश है लेकिन यहाँ के भूमिहरो कि हालत बहुत दयनीय है। हम आये दिन खबर सुनते रहते हैं कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ये तो तब होता है जब उनकी फसल को नुक्सान पहुँचता है लेकिन क्या जब उनकी फसल होती है तो क्या उन्हें इसका सही मूल्य मिलता है? यही बात ये कहानी दर्शाती है। मंडी के चलने का चित्रण यथार्थ ही लगता है और मन को दुखी कर देता है। एक बेहतरीन कहानी।

४)घुरिया - मीना पाठक
पहला वाक्य :
बड़ी खुशनुमा दोपहरी है, खुशबू लिए हुए हवा के झोंके बसंती और फुलवा को सहला रही है, ऊपर आसमान में भूरे बादल उड़ रहे हैं, उनकी छाया जमीन पर दौड़ रही है, दुआर से थोड़ी दूर मैदान में घास के ऊपर बादलों की उड़ती हुई छाया रोमांच पैदा कर रही है।

बसंती, फुलिया और गुरिया गहरी सहेलियां थी जो कि दिनभर आपस में खेला और झगडा करती थी। लेकिन वक़्त के साथ तीनो बढ़ी होती गयी। बसंती और फुलवा तो पढ़ने के लिए गाँव से बाहर चली गयीं और गाँव में केवल घुरिया रह गयी। घुरिया दिमागी रूप से कमजोर थी। उसका शरीर तो बढ़ रहा था लेकिन दिमाग अभी भी बच्चो जैसा था। ऐसे में केवल उसकी माँ ही थी जो उसका ख्याल रखती थी। लेकिन जब उसकी माँ का देहांत हो जाता है तो उसके तरफ ध्यान देने वाला कोई नहीं बचता है। फिर उसके साथ ऐसा कुछ होता है कि समाज में फैली हैवानियत का चेहरा सामने ला जाता है। कहानी ह्रदयस्पर्शी है।


५)तवायफ - हर्ष बाला शर्मा

पहला वाक्य :
बाहर बारिश हो रही थी.... माजिदा के अन्दर जब भी बारिश होती है तो बाहर भी बारिश शुरु हो जाती है।

माजिदा एक कोठा चलाती है। यह कहानी उस दिन कि जिस दिन रशीद एक नई लड़की को कोठे में लेकर आता है। माजिदा हर नई लड़की के आने पर दुखी हो जाती है और अपने को उसके जिस्म को बेचने के लिए जिम्मेदार मानकर खुद को सजा देती है। माजिदा कुछ फैसला करती है लेकिन क्या वो अपने फैसले पर कामयाब हो पायेगी। कहने को तो वो इस कोठे कि मालकिन है पर क्या ये उसके हाथ में है कि वहाँ आने वाली लड़कियों का इस्तेमाल कैसे हो? कहानी को रोमांचक बनाया जा सकता था लेकिन नहीं बनाया गया जो कि कहानी को यथार्थ के नज़दीक ले जाता है। कहानी मुझे अच्छी लगी।


६)टूटी परिधि का वृत - उपासना नीरव
पहला वाक्य :
रात आसमान को आगोश में कसती जा रही थी।
माकुर एक ५-६ साल का छोटा बच्चा है।  उसकी माँ के देहांत को हुए अभी कुछ ही समय बीता है। इससे उसके जीवन में क्या क्या बदलाव आता  है उनका इस कहानी में मार्मिक चित्रण किया गया है। कहानी मुझे अच्छी लगी।


No comments:

Post a Comment

Disclaimer:

Ek Book Journal is a participant in the Amazon Services LLC Associates Program, an affiliate advertising program designed to provide a means for sites to earn advertising fees by advertising and linking to Amazon.com or amazon.in.

लोकप्रिय पोस्ट्स