Sunday, May 17, 2015

वह भी कोई देस है महाराज - अनिल यादव

रेटिंग: ५/५
पुस्तक पढ़ी गयी : अप्रैल ६ से अप्रैल १४ के बीच


संकरण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : १६०
प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन


पहला वाक्य:
पुरानी दिल्ली के भयानक गन्दगी, बदबू , और भीड़ से भरे प्लेटफार्म नंबर नौ पर खड़ी मटमैली ब्रह्मपुत्र मेल को देखकर एकबारगी लगा कि यह ट्रेन एक ज़माने से इसी तरह खड़ी है।

अनिल कुमार यदाव जी का यात्रा वृत्तांत वह भी कोई देस है महाराज पढ़ा। पिछले साल इस पुस्तक कि बहुत तारीफ़ सुनी थी और इसलिए इसको पढ़ने के लिए मन उत्सुक था। जब ये ऑनलाइन साइट्स में मिलनी शुरू हुई तो मैंने भी एक प्रति अपने लिए मंगवा दी। सच कहूँ तो इससे पहले मैंने जो भी यात्रा वृत्तांत पढ़े थे वो सब ब्लॉग पे ही पड़े थे और यात्रा वृत्तांत किस तरीके का होना चाहिए इसका एक फार्मूला सा बन गया था और ये भी कि यात्रा वृत्तांत का एक मकसद होता है। ये मकसद जो मैंने समझा वो ये था कि किसी भी पर्यटन स्थल के विषय में वो बाते बताना जो एक भावी पर्यटक की मदद करे उस स्थल में आने के लिए और उस जगह में पर्यटन स्थलों में घूमने के लिए। जब मैंने सुना कि वह भी कोई देस है महाराज हमारे उत्तर पूर्वी राज्यों का ब्यौरा है तो सोचा इसमें भी वैसा ही कुछ होगा। लेकिन कितना गलत था मैं। वह भी कोई देस है महाराज एक यात्रा वृत्तांत ही नहीं है ये एक ऐसा दस्तावेज है जो पाठक को उत्तर पूर्वी राज्यों का वो यथार्थ दिखाता है जो एक पर्यटक के रूप में देखना मुश्किल है। वहाँ कि राजनीतिक और सामजिक स्थिति को दर्शाती ये पुस्तक आपको एक अलग तरीके से उत्तर पूर्वी राज्यों से मिलवाती है।



अनिल जी ने ये यात्रा २९ नवम्बर २००० में कि थी और यात्रा लगभग २ महीने से ऊपर कि थी। इसका मतलब इस यात्रा का ब्यौरा लगभग पंद्रह साल पुराना है। इस पंद्रह साल में शायद कुछ बदलाव उधर आया हो। बहरहाल, अनिल जी का यात्रा वृत्तांत असम से शुरू होता है और त्रिपुरा में जाकर अंत होता है। अक्सर जब भी हम उत्तर पूर्वी राज्यों के विषय में सोचते हैं तो हमारे मन में जो तस्वीर बनती है वो एक ऐसी जगह कि होती है जिसे प्रकृति ने खूबसूरती से नवाज़ा है। और इस तस्वीर से आगे हम बढ़ने की कोशिश भी नहीं करते हैं। लेकिन ऐसे में हम कभी उन परेशानियों को नहीं देख पाते जिससे वो हिस्सा जूझ रहा है।  यह पुस्तक आपको इस बात से अवगत कराती है। पाठक को पता चलता है  बाहरी लोगों को असम में प्रताड़ना झेलनी पढ़ रही है।   आतंकवादी संघटनो को राज्यों के लोग टैक्स देते हैं।  युवा ड्रग्स और एड्स कि चपेट में आकर अपने जीवन को बर्बाद कर रहे है। लोग आक्रोशित है और उन्हें लगता है उनके साथ सौतेला व्यवहार हुआ है। राज्यों की विभिन्न जातियाँ आपस में प्रभुत्त्व के लिए लड़ रही हैं। कई बार लेखक इनके कारणों से पाठक को अवगत कराता है और कई बार इन सवालों को पाठको के लिए छोड़ देता है।

अगर आप ये जानना चाहते हैं कि उत्तर पूर्वी राज्यों में घूमने लायक जगह कौन सी है तो आप इससे निराश होंगे लेकिन अगर आप उत्तर पूर्वी राज्यों को जानना चाहते हैं तो इसमें यह पुस्तक जरूर आपकी मदद करेगा। वृत्तांत ने शुरू से आखरी तक मुझे अपने में बाँध के रखा। हाँ, इतने कम पृष्ठों में इतनी जानकारी है कि मुझे लगता है इस पुस्तक को मुझे दोबारा पढना पड़ेगा। पुस्तक को आप एक बार पढेगे तो जल्दी भुला नहीं पायेगे और याकीन मानिए एक अलग नज़रिए से उत्तर पूर्वी राज्यों को देखेंगे।

मेरी राय में इस पुस्तक को हर किसी को पढना चाहिए।


पुस्तक के कुछ अंश :

अचानक लगा कि उस देस वाले इधर के देस को लगातार गाली दे रहे हैं तो वहाँ जाती ट्रेन भी कुछ न कुछ ज़रूर कह रही होगी। मैं आँखें बंद कर सारी आवाजों को सुनने कि कोशिश करने लगा। सरसराती ठंडी हवा और अनवरत धचक धचक के बीच कल से व्यर्थ, रूटीन लगती बातों के टुकड़े डिब्बे में भटक रहे हैं। उन्हें बार बार दोहराया जा रहा है। इतनी  भावनाओं के साथ अलग अलग ढंग से बोले जाने वाले इन वाक्यों के पीछे मंशा क्या है।
हालत बहुत खराब है।
वहाँ पोजीशन ठीक नहीं है।
माहोल ठीक नहीं है। चारों तरफ गड़बड़ है।
आजकल फिर मामला गंडोगोल है।
जैसे लोग किसी विक्षिप्त, हिंसक मरीज कि तबियत के बारे में बात कर रहे हैं जिसके साथ उसी वार्ड में जैसे तैसे गुज़र करना है।


मैंने अपने को सोचते पाया कि अगर कभी मेरा कोई धर्म हुआ तो वह ऐसा ही सादा, इकहरा और पवित्र होगा। पवित्र! वह क्या होता है? लेकिन तुम्हारा कोई धर्म क्यों नहीं है? इसलिए कि धर्म पाखंड, छुआछूत, कट्टरपन, घृणा, अंधविश्वास और शोषण के महीन तरीके लाता है। 

पुस्तक को निम्न लिंक के माध्यम से मंगवा सकते हैं :
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