Sunday, March 15, 2015

साथ सहा गया दुःख - नरेन्द्र कोहली

रेटिंग : २.५/५
उपन्यास  ख़त्म करने की  तरीक : ६ फरवरी २०१५
संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : १३६
प्रकाशक : राजपाल


पहला वाक्य :
दिन भर  वो एक दूसरे से खीझे-खीझे रहे।

नरेन्द्र कोहली जी का ये उपन्यास अमित और सुमन की कहानी है। अमित और सुमन की शादी हो चुकी है लेकिन उनके बीच सामंजस्य की अभी भी कमी है। सुमन अपने घर की लाड़ली थी जहाँ सभी उसकी आव भगत में रहते थे इसलिए उसके अन्दर अनुशाशन की कमी है। वो चीज़ें व्यवस्थित नहीं  रख पाती है, कई बार चीज़ें गुमा देती है, किताबों को बेतरतीब तरीके से इस्तेमाल करती है। शादी से पहले अमित उसकी इन बातों को बचपना समझ कर ज्यादा महत्व नहीं देता था  लेकिन जब शादी के बाद भी सुमन का रवैया नहीं बदलता तो उसकी ये लापरवाही उनके बीच के झगड़े का कारण बन जाती है। इसी बीच उनका बच्चा होता है और इस नये जोड़े के ऊपर कई और जिम्मेदारी आ जाती है। क्या ये इनका निर्वाह ठीक ढंग से कर पाते हैं? क्या ये अपने बीच सामंजस्य बैठा पाते हैं ? अब नए बच्चे कि जिम्मेदारी को वो कैसे निभाते हैं ? उनके इन्ही अनुभवों के साक्षी आप इस उपन्यास को पढ़कर बनेंगे।



इस उपन्यास के तरफ मेरे विचार मिश्रित हैं। यह उपन्यास मुझे पसंद तो आया लेकिन कई जगह मुझे कुछ बातें ऐसी लगी जो बिल्कुल मानने योग्य नहीं थी। खैर शुरुआत उपन्यास कि उन बातों से करता हूँ जो मुझे अच्छी लगी। अमित और सुमन एक सामान्य जोड़ा है। अगर आदतों की बात करें तो उनकी आदत एक दूसरे से एक दम भिन्न थी। जहाँ अमित सफाई और अनुशाशन पसंद व्यक्ति था वहीं सुमन को ये काम कभी करने ही नहीं पड़े। वो अपने घर की लाडली थी और इस कारण उसे कुछ करने कि आदत ही नहीं थी। अमित इस बात को जानता है और पहले इस बाबत उससे कुछ बात नहीं करता है और अक्सर उसकी लापरवाही को हँसी में टाल देता है। ये गलती अकसर प्रेमी युगुल करते हैं। वो पहले तो अपने साथी की उन आदतों को नज़रंदाज़ करते जो उन्हें पसंद नहीं , लेकिन बाद में ( अक्सर शादी के बाद) चाहते हैं कि उनका साथी उन आदतों को बदले। और अकसर यही लड़ाई का पहला कारण भी बनता है। यही चीज़ अमित और सुमन के साथ भी होती है। अमित पहले सुमन की लापरवाही को अक्सर हँसी में उड़ाता था लेकिन शादी के बाद सुमन की वो लापरवाही,जो कि उसकी आदत है, उसे बचपना नहीं लगती और वो उसे टोकता रहता। सुमन को ये बात बड़ी अजीब लगती है क्योंकि वो जानती है कि अमित ने शादी से पहले उसकी इन आदतों के विषय में कभी उसे नहीं टोका और शादी के बाद के बदलाव को वो समझ नहीं पाती है। इस मामले में प्रेमी युगल की समस्यायों का लेखक ने बड़ा सटीक वर्णन किया है।

दूसरा लेखक ने बड़ी बारीकी से एकल परिवारों के समस्याओं का भी वर्णन किया है जो कि अक्सर नए जोड़ों को होती है। अक्सर संयुक्त परिवार में लोग एक दूसरे की मदद करते हैं जिससे काम का बोझ उन पर कम पड़ता है। वहीं एकल परिवार में ये काम का बोझ पति पत्नी के ऊपर आ जाता है। फिर नौकरी और घर के काम के साथ सामंजस्य बैठना मुश्किल होता जाता है। इसी मुश्किल का सामना अमित और सुमन को करना पड़ता है।  पहले तो बहुत जद्दोजहत के बाद उन्हें ऐसी आया मिलती है जो उन्हें ठीक लगती हैं  लेकिन अगर उसकी तबियत खराब हो जाए तो उन्हें फिर से परेशानी का सामना करना पड़ता है। इससे दोनों को अपने काम के साथ समझोता करना पड़ता है जो कि अक्सर उनके सीनियर्स को नहीं भाता है।  हम देखते हैं इसी कारण सुमन को दो टूक बातें भी सुननी पड़ती है।  क्योंकि दोनों का यह पहला बच्चा है तो उनके बच्चे सँभालने के अनुभव की कमी को भी बहुत बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है। कैसे वो छोटी छोटी बातों को बहुत गंभीरता से लेते हैं ? किताबों को पड़ते हैं जो उन्हें ज्ञान तो देता है लेकिन अनुभव नहीं देता पाता है। इसी कारण आया से भी उनकी कभी कभार बहस हो जाती है। आया बच्चे की देखभाल को अपने अनुभव के बल पर करती है जो कि कभी कभी किताबी बातों से अलग हो जाता है तो सुमन परेशान हो जाती है।

उपन्यास का मूल विषय बच्चे कि बीमारी और मृत्यु के दुःख को अमित और सुमन द्वारा साथ सहना और बाँटना है।  इसका मार्मिक चित्रण किया गया है।  मैं तो खैर अभी शादी शुदा भी नहीं हूँ और बच्चे के विषय में सोच भी नहीं सकता हूँ।  उसके खोने के दुःख की कल्पना ही कर सकता हूँ । इसमें इसी को इसका विषय बनाया गया है।  जो पति पत्नी एक दूसरे से अलग होने कि सोचते थे वो इस बच्चे के कारण जुड़ते हैं।  और जिस दुःख का सामना उन्हें करना पड़ता है वो उन दोनों को और नज़दीक ला देता है।

सुमन की आँखें पुन्नी की काट के और मुड़ गईं। 
"तुम मुझसे नाराज होते थे। लड़ पड़ते थे। मुझसे बात तक नहीं करते थे।... पर तब मेरे पास पुन्नी थी। उसे देखकर मैं अपना दुःख भूल जाती थी। उसे खिलाने लगती। मैंने उसे चाहा इसलिए था कि तुम मुझसे लड़ते थे। जब जब तुम मुझसे लड़े, मैंने सोचा पुन्नी के लिए जीऊँगी। पुन्नी के सहारे जीवन काट दूँगी...अब पुन्नी भी नहीं है। अब तुम मुझसे  लड़ पड़े तो..."
"सुम्मी !", अमित रो पड़ा, "अब तुमसे कैसे लडूँगा? अब तक केवल सुखों का साझा था तो लड़ लेते थे। यह पहला दुःख है जो हमने इकट्ठे झेला है। सुख में कोई किसी को क्या समझेगा? सुख में प्यार कहाँ पनपता है सुम्मी? केवल शिकायतें उभरती हैं।  मैंने अपना-आप पुन्नी के लिए छोड़ा था ...इस बात को तुम समझती हो सुम्मी। और कोई कैसे समझेगा? यह हमारा दुःख है - हम दोनों का...इस दुःख को कोई और तो हमारे साथ नहीं बाँट सकता ना !... अब हम कैसे लड़ सकते हैं..."

उपन्यास की कमी जो मुझे लगी वो ये थी कि इसकी कुछ बातें यथार्थ के नज़दीक मुझे नहीं लगी।  पूरे उपन्यास के दौरान हम सुनते आते हैं कि कैसे सुमन अपने परिवार की लाडली थी और उसको हर कोई पलकों पर बैठा के रखता था लेकिन वही परिवार उसके प्रसव के दौरान गायब रहता है। और तो और  अमित के परिवार का भी कोई सदस्य उधर नहीं होता। ये बात पचती नहीं है। पूरे घटनाक्रम के दौरान दोनों परिवारों में से किसी सदस्य का न होना अजीब बात है। अक्सर जब भी लड़की गर्भवती होती है तो उसके मायके से या ससुराल से कोई न कोई आकर पति-पत्नी की मदद करता ही है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। जब अमित सुमन को अस्पताल डिलीवरी के लिए ले जाता है तब भी उनके साथ कोई नहीं होता है ।  और तो और जब बच्चे की तबियत खराब होती है दोनों परिवार के बड़े बूढ़े जो अक्सर ऐसे मामले में साथ देते हैं उनका भी नामो निशान नहीं दिखता है। ये बात मुझे तो नहीं  जमी और मुझे ऐसा लगा कि उपन्यास को एक अलग टोन देने के लिए इन बातों को दरकिनार किया गया। दूसरी  बात  उपन्यास  का  अंत  मुझे  ऐसे लगा कि काफी जल्दी हो गया। अमित और सुमन  अपने आने वाले जीवन में कैसे इस  दुःख  से निपटते इस बात को भी लिखना चाहिए था। दोनों एक निर्णय लेते हैं (कभी न झगड़ने का और साथ साथ रहने का) और उसी में उपन्यास अंत हो जाता है। लेकिन ये निर्णय भावुकता और दुःख में लिया गया था और असल ज़िन्दगी में क्या वो इस निर्णय में कायम रह पाए इस बात को भी उपन्यास में दिखाते तो सही रहता।

खैर, उपन्यास बहुत मार्मिक है और एक संवेदनशील विषय पर लिखा गया है। उपन्यास के पात्र जीवंत हैं और आप रोजमर्रा के जीवन में अमित और सुमन जैसे लोगों से रूबरू होते हैं।  उनकी परेशानियाँ वो ही हैं जो आपसी ताल मेल बैठाने से पहले हर जोड़े को होती हैं।  यह जोड़ा जिस दुःख का सामना करता है और फिर जो बदलाव उसमें आता है उसका चित्रण उपन्यास में बहुत अच्छे ढंग से किया है। उपन्यास को पढने की सलाह मैं हर किसी को दूँगा। अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो अपनी राय देना न भूलियेगा और अगर आपने इस उपन्यास को नहीं पढ़ा तो इसको आप निम्न लिंक्स से मंगवाकर पढ़ सकते हैं :
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