Tuesday, February 10, 2015

बिना दरवाज़े का मकान - रामदरश मिश्र

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रेटिंग : ४/५
उपन्यास ख़त्म करने की तारीक : ८ फरबरी २०१५

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या :१३६
प्रकाशक :राजकमल पेपरबैक्स

बिना दरवाज़े का मकान समाज की सच्चाइयों को पेश करता हुआ एक मार्मिक उपन्यास है। दीपा और उसका पति बहादुर एक खुशहाल जीवन जी रहे थे। बहादुर रिक्शा चलाता था और दीपा घर में ही रहती थी । लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, उनके जीवन में कुछ ऐसा घटित होता है कि दीपा को घर -घर जाकर काम करना पड़ता है। ऐसा क्या हुआ था बहादुर के साथ?? उसे समाज के उस चेहरे से वाकिफ होना पड़ता है जिससे अभी तक उसके पति ने उसे महरूम रखा था। और क्या अनुभव रहे दीपा के ? ये बातें तो आप इस उपन्यास को पढ़ कर ही जान पायेंगे।



उपन्यास दीपा के चरित्र के माध्यम से समाज के दोगले पण को दर्शाता है । उपन्यास का कलेवर भले ही लघु हो लेकिन ये समाज का चित्रण बखूबी और बिना लीपा पोती के करता है।

उपन्यास का शीर्षक दीपा और बहादुर के मकान के ऊपर है।  जब वो लोगों के घर काम करने जाती थी तो उसे रहने को आसरा वहीं मिल जाता था। लेकिन अकसर मालिक लोगों की बातें उससे सुननी पड़ती थी इसलिए वो सोचती है कि उसका अपना मकान ही होता तो बेहतर होता।  वो किसी तरह घर तो बनवा तो लेती है लेकिन उसमे दरवाज़ा लगाने के पैसे उसके पास नहीं बचते हैं।  अब वो दोनों एक ऐसे घर में रह रहे हैं जिसमे दरवाज़ा नहीं है और यही उनके जीवन का भी हाल है।  अब वो कर्ज से दबे हुए हैं और कोई भी आकर अपने पैसे के लिए उन्हें जली कटी सुना देता है। ये ही नहीं वो उसके चरित्र पे भी ऊँगली उठाते हैं।  ये बातें उसे चुभ सी जाती है कि केवल उसकी जात और गरीबी के कारण वो उसे वो ऐसी बातें सुनाते हैं। वो उनके असली चेहरे से वाकिफ है।

कहीं भ्रष्ट इंस्पेक्टर पैसा कमाने में इतना व्यस्त है कि परिवार के विषय में वो कुछ सोचता ही नहीं है । उसके पास परिवार को देने के पैसे तो हैं लेकिन प्यार और वक़्त नहीं है। इसलिए उसका परिवार भी अय्याशियों में मशगूल रहता है और उसकी कोई परवाह नहीं करता है।दूसरी जगह एक ऐसी औरत है जो सबसे तो मीठा मीठा बोलती है लेकिन अपनी बहु ,जो कि गरीब घराने से है,को मानसिक और शाररिक प्रताड़ना देती रहती है।ऐसे ही कई परिवारों और समाज की अंदरूनी  सच्चाई  को हम दीपा के माध्यम से देखते हैं।

ये ही नहीं हम औरतों के प्रति समाज के नज़रिये को देखते हैं।  दीपा के पति के साथ दुर्घटना होने के बाद लोग उसे गलत नज़र से देखने लगते हैं। इसमें वो मालिक ही नहीं जिनके यहाँ वो काम करती है बल्कि वो लोग भी हैं जो बहादुर को अपना दोस्त कहते थे। दूसरी और हम दीपा की जद्दोजहत से भी रूबरू होते हैं। उसकी भी कुछ इच्छाएं हैं जिन्हे पूरा करने में बहादुर अभी समर्थ नहीं है और कभी कभी ये ही इच्छायें झल्लाहट के रूप में निकलती है। उपन्यास की कहानी तो एक दिन की है लेकिन उस एक दिन में हम दीपा की पूरी ज़िन्दगी से वाकिफ हो जाते हैं।

हाँ,कहीं कहीं पर गरीबों का अमीरों के प्रति रोष और उनका बार बार ये कहना कि बिना बेमानी के बिना कोई अमीर नहीं हो सकता है उनके पूर्वाग्रह को दिखाता है। वही अमीरों का ये समझना की गरीब बेइमान और उनकी औरतें बाजारू होती है उनके पूर्वाग्रह को दिखाता है।

एक बात जिसकी कमी इसमें मुझे लगी वो थी भाषा का एक तरह का होना। दिल्ली ऐसी जगह है जहाँ हिंदी की बोली एक ही मोहल्ले में अलग अलग देखने को मिलती है। पंजाबी,गढ़वाली ,पूर्वंचाली और अन्य अनेक भाषाओँ का प्रभाव उस जगह के लोगों की बोली में दिखता है। वैसे लेखकीय में लेखक ने इस कमी के विषय में पहले ही बता दिया है लेकिन अगर ये  प्रभाव किरदारों की भाषा मे दिखता तो काफी अच्छा लगता। ऐसा नहीं है कि कुछ प्रभाव नहीं है लकिन ये उतना नहीं है जितना होना चाहिए था।

उपन्यास को पढ़कर आपको ज़रूर अपने आस पास में मौजूद लोग ध्यान आयेंगे और आप सहसा कह उठेंगे की यह किरदार तो अमूक व्यक्ति के तरह है।

उपन्यास की कहानी दिल्ली के उत्तमनगर में बसाई गयी है।और ये एक संयोग ही था की मैं उपन्यास पढ़ते वक़्त उत्तमनगर में आया हुआ था। बिंदापुर ,मनास्कुंज और दूसरे जाने पहचाने जगह के नामो ने भी इस उपन्यास के अनुभव को प्रभावित किया।

उपन्यास काफी अच्छा है और अगर आप सामाजिक उपन्यास को पढने में रुचि रखते हैं तो आपको ये उपन्यास आपको ज़रूर पसंद आएगा।अगर आपने उपन्यास को पढ़ा है तो अपनी राय देना नहीं भूलियेगा और अगर आप उपन्यास को मंगवाना चाहते हैं तो आप इसे निम्न लिंक्स के माध्यम से मंगवा सकते हैं:
अमेज़न

2 comments:

  1. टिप्पणी-3
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    हिँदी साहित्य की अमूल्य धरोहर का परिचय देने के लिए धन्यवाद.

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