Monday, January 5, 2015

निठल्ले की डायरी - हरिशंकर परसाई

रेटिंग : ३/५

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : १४८
प्रकाशक : राजकमल पेपरबैक्स


पहला वाक्य :
निठल्ला भी कहीं डायरी लिखने का काम करेगा !

निठल्ले की डायरी (Nithalle ki diary) हरिशंकर परसाई (Harishankar Parsai) जी के व्यंगों का एक संग्रह है। इसमें उनके २६ व्यंग शामिल है जिसमे समाज में फैले भ्रष्टाचार,दिखावा, दोगलापन और अफसरशाही को उन्होंने अपनी कलम से निशाना बनाया है। परसाई जी ने ये व्यंग एक ऐसे व्यक्ति के माध्यम से कहे हैं जो की निठल्ला कहलाता है। और उसी के डायरी में दर्ज उसके अनुभव ही इस पुस्तक की शक्ल लेते हैं। यह व्यक्ति कोई आम निठल्ला नहीं था ।

यह निठल्ला कुछ भिन्न किस्म का था।  पूरी डायरी पढने के बाद मालूम होता है कि वह 'निठल्ला' के नाम से इसलिए बदनाम था कि वो लगातार काम नही करता था ।

वो एक दिन फैसला करता है वो अब दूसरों की मदद करेगा। अब ये मदद उसे किधर और किन किन लोगो से मिलाएगी ये पुस्तक को पढ़िएगा तो पता चलेगा। और क्या वो लोगों का भला कर भी पायेगा ?

मैं तो कहूँगा इसे पढ़िए। परसाई जी ने किसी को भी नहीं छोड़ा है अपनी कलम की धार से। भले ही ये कई साल पहले लिखे गये थे लेकिन आज भी ये उतने ही  सच्चाई से समाज की हालत को बयान करते हैं ये व्यंग ।
इस संग्रह में उनके निम्न २५ व्यंग संकलित किये गये हैं :

शिवशंकर का केस :
शिवशंकर को तबादला चाहिए लेकिन जहाँ उसे तबादला चाहिए वहाँ उससे अच्छी पहुँच वाला किसी नेता रिश्तेदार है। क्या हमारा निठल्ला उसका मनवांछित तबादला करा पायेगा?

रामभरोसे का इलाज़ :
रामभरोसे का ईलाज होना है। अस्पताल में दो गुट हैं और गुटों के बीच से किसी मरीज की जान बचाना टेडी खीर है। निठल्ला घुस तो जाता है लेकिन फिर रामभरोसे को राम के भरोसे छोड़कर ही आता है।



युग की पीड़ा का सामना 
ये व्यंग है साहित्यकारों पर जो अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं हैं। हमारा निठल्ला एक कॉफ़ी हाउस में एक कवि से मिलता है जो युग की पीड़ा से ग्रस्त हैं। वो अकेले हैं और अकेले क्यूँ हैं ये उन्ही कि ज़बान से सुनिए:

वह उन्हें देखता रहा। बड़े दर्द से बोला - मैं निपट अकेला हूँ।
मैंने पुछा - अकेले क्यों हो?
उसने कहा - क्योंकि मैं किसी से मिलता जुलता नहीं हूँ। सबको मेरे पास आना चाहिए। वे नहीं आते हैं, तो अकेला हूँ।

क्या निठल्ला इनको इनकी पीड़ा से निजाद दिला पायेगा?

राष्ट्र का नया बोध
हर नागरिक का कर्तव्य होता है कि वो सरकार की मदद करे जमाखोरों को पकड़ने में। आप भी यही सोचते होंगे और यकीन मानिये निठल्ला भी यही सोचता था तभी तो अपने मित्र को लेकर जमाखोर सेठ को पकडवाने चला था। आगे क्या हुआ पढ़िए? सरकारी मशिनिरी किस तरह काम करती है उसका उल्लेख है इस व्यंग में।

प्रेमी के साथ एक सफ़र
जगन्नाथ काका के साथ लौटते हुये निठल्ले कि मुलाकात एक प्रेमी से होती है। प्रेमी भी रेल के उसी डब्बे में सफ़र कर रहा है जिसमे कि ये दोनों है। प्रेमी अपनी प्रेमिका को रिझाना चाह रहा है लेकिन कामयाब नहीं हो पा रहा है। अब निठल्ले के ऊपर ये दारोमदार आ गया है कि वो इस प्रेम को पार लगाये। क्या वो सफल हुआ? पढ़िए और जानिये।

वाक आउट! स्लीप आउट ! ईट आउट !
संसद के काम करने की प्रक्रिया पर एक व्यंग। इस वर्ष भी आप देखे तो राज्यसभा में वाकआउट के सिलसिले कुछ ज्यादा ही रहे जिससे कई महत्वपूर्ण बिल पास न हो सके। इसी प्रक्रिया पर एक करारा कटाक्ष किया गया है।

सर्वोदय दर्शन
एक सर्वोदयी शिवर चल रहा है और निठल्ला उधर जा पहुँचता है। वो उधर क्या देखता है ये तो वो ही ढंग से आपको बता पाएगा।

साहब का सम्मान
कपड़ा व्यापारियों के संघठन ने नए आयकर अफसर की कविताओं के चलते उनका सम्मान किया है। अब ये सम्मान असल में क्यूँ हुआ है ये तो आपको तभी पता चलेगा जब आप इस समारोह में पहुँचेंगे।

पहला पुल
लोककर्म विभाग के रामसेवक मिश्र ने नौकरी छोड़ दी है। उनको हनुमान जी ने स्वप्न में आकर राम कथा लिखने का आदेश दिया है। अब हनुमान जी कि बात कोई टाल सकता हैं भला, तो रामसेवक जी ने लिखना शुरू किया। अब उन्होंने क्या लिखा है ये तो जानना उनके मुख से ही ठीक होगा।

'कोई सुनने वाला नहीं है'
निठल्ले को एक व्यक्ति हमेशा मिलता था जिसे लगता है संसार में जो भी होता है उसको दुःख देने के लिए ही होता है। उसके विषय में निठल्ले के विचार कुछ यों थे :

हर चीज़ उसे तंग करती थी; हर चीज़ उसके लिए अन्याय बनकर आती थी। अपनी पत्नी के बारे में भी उसकी ये धारणा होगी कि इस स्त्री का जन्म मुझसे विवाह करके मुझे तंग करने के लिए हुआ था। इसने भी मुझ पर अन्याय किया। छाती से चिपके बच्चे को भी वो अपने प्रति अन्याय मानता होगा।

कौन था ये विचित्र आदमी? क्या दुःख था उसे? क्यूँ वो इतना परेशान रहता था? क्या निठल्ला उसे उसकी परेशानी से निजाद दिलाने में कामयाब रहा?
सरकारी दफ्तरों में अक्सर तरक्की मेहनत पे नहीं बल्कि चाटुकारिता के कौशल पे मिलती है। इसमें भी यही दर्शाया है।

पीढियाँ और गिट्टियाँ
ये व्यंग भी साहित्यकारों के ऊपर है। साहित्यकारों में भी पीढ़ियों की सोच में मतभेद रहता है। वो एक ताकतवर ओहदा अपने पास रखते हैं। इस ओहदे की ही तो लड़ाई है।

रामसिंह की ट्रेनिंग
रामसिंह एक शिष्टाचारी और ईमानदार पुलिस वाला है। लेकिन अपनी इन्ही कमियों कि वजह से उसे अपने को पुलिस वाला सिद्ध करने में दिक्कत होती है। अब वो निठल्ले के पास मदद कि गुहार लेके आया है। क्या निठल्ला इसकी मदद कर पायेगा?

नगर पालक
म्युनिसिपालिटी के काम करने के तरीके पर एक करारा व्यंग है।

विकास-कथा
विकास मंत्रालय के ओर से देश के लेखकों को एक चिट्ठी पहुंची है। उन्हें एक विकास रिपोर्ट की व्याख्या करनी है। अब निठल्ले ने भी इस पर व्याख्या की और उसे ईनाम मिल गया। क्या थी ये रिपोर्ट और क्या थी ये व्याख्या? अफसरशाही के ऊपर एक करारा व्यंग।

रिसर्च का चक्कर 
काका की राय मानकर निठल्ला एक विश्वविद्यालय में रिसर्च करने को तैयार हो गया। लेकिन रिसर्च करना कोई आसान काम नहीं है और निठल्ले जी को ये बात शीर्घ ही पता चल गयी। विश्वविद्यालयों में राजनीती और गुटबाजी यथार्थ है। अक्सर इसमें वहाँ के प्रोफेसर ही शामिल होते हैं। इसी के ऊपर ये व्यंग लिखा गया है।

एमरजेंसी आचरण
सेठ गोबर्दंदास जी का आचरण इमरजेंसी के अनुरूप नहीं है । वे सुरक्षा कोष में सोना देना चाहते हैं, कीमतें बढ़ाना नहीं चाहते। आखिर इस आचरण को सरकार कैसे रोकती है ये तो इस व्यंग को पढ़कर ही जान पाओगे।

एक सुलझा आदमी
ये कहानी एक सुलझे हुए आदमी की है। उसकी दृष्टि इतनी साफ़ कैसे हुई ये तो आप इस रचना को पढने के बाद ही जान पायेंगे। पढ़िएगा ज़रूर तब तक
उन सवाल और जवाबों का उसपर क्या असर हुआ आप ये पढ़िए , शायद आप भी एक सुलझे हुए आदमी बन जायें :

मेरा ह्रदय गद्गद हो गया। अश्रुपात होते लगा। मैंने आखें बंद कर लीं। मुख से स्वर निकलने लगे- अहा ! वाह! कैसा सुख है?
इसी समय मेरा एक परिचित वहाँ आ गया। बोला - क्या आँखें आ गई हैं? कोई दवा डाल रखी हैं?
मैंने कहा - अंजन लग गया है। पर बाहर की आँखों में नहीं, भीतर की आँखों में। नई दृष्टि मिल गई है। बड़ा संतोष है। अब सब सहज हो गया है। इतिहास सामने आ गया। जीवन के रहस्य खुल गए। न मन में कोई सवाल उठता, न कोई शंका पैदा होती। जितना जानने योग्य था जाना जा चुका। सब हमारी जाति जान चुकी। अब न कुछ जानने लायक बचा, न करने लायक।  

आशंकापुत्र
इस रचना में आशंकापुत्र हैं पांडे जी। वो निठल्ले के पडोसी हैं। मध्यमवर्गीय परिवारों के बीच उनका रहन सहन का स्तर थोड़ा बढ़िया है। लेकिन वो हर किसी को शंका की दृष्टि से देखते हैं। पांडे जी के इस आचरण से निठल्ला काफी परेशान है वो सोचता रहता है :

किस आशंका से घबराया रहता है? हर आदमी से डर क्यों लगता है? किसी से घुल मिल क्यों नहीं पाता? किसी पर इसका विश्वास क्यों नहीं है? हमेशा अनिष्ट ही क्यों सोचता रहता है? यह इतना छुई-मुई क्यों है ?
कोई कारण समझ में नहीं आता।

एक भ्रष्टाचारी अफसर की मानसिक स्थति को बयान करता है ये व्यंग।

चमचे की दिल्ली-यात्रा
आदमी को तब तक बड़ा नहीं माना जा सकता जब तक उसके चमचे न हों। और ये बात नेताओं में तो पूर्णतः सच है। चमचे ही उनके कान और आँखें होती है। वो उनके क्षेत्र की खबर उन तक पहुँचाते रहते हैं। ऐसे ही कोई चमचे जब अपने नेताजी से मिलने दिल्ली के लिए रवाना होते हैं तो वो कैसी तैयारी करते हैं , ये आप इस कृति को पढ़कर समझ पायेंगे।

देश भक्ति की पॉलिश
जब निठल्ले के मित्र ने ,जो विदेश में रहता है, उसको बताया कि उसके सपने में भारत माता ने आकर उनके शहर के कंचन बाबू को एक उच्च देश भक्त बताया है, तो अपना निठल्ला पहुँच गया कंचन बाबू से मिलने। उसे कंचन बाबू सड़क पर जूते पोलिश करते हुए मिले। ये क्या माजरा था? इतना बढ़ा सेठ रास्ते में जूते क्यों पॉलिश कर रहा था? निठल्ला इससे हैरान हुआ। उसने कंचन बाबू से पुछा तो उन्होंने इसका कारण भी बताया। क्या कारण बताया ये तो आप उन्ही की जुबानी सुनियेगा।

एक गोभक्त से भेंट
रास्ते में एक गोभक्त से निठल्ला मिला और उससे गोभक्ति पर कुछ विचार विमर्श किया। ये क्या था ये तो आप पढ़कर ही जान पाओगे। बस इसका थोड़ा अंश प्रस्तुत करता हूँ :

पर स्वामीजी, यह कैसी पूजा है कि गाय हड्डी का ढाँचा लिए हुए मुहल्ले में कागज़ और कपड़े खाती फिरती है और जगह जगह पिटती है! 
-बच्चा ये कोई अचरच की बात नहीं है। हमारे यहाँ जिसकी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा कर डालते हैं। यही सच्ची पूजा है। नारी को भी हमने पूज्य माना और उसकी जैसी दुर्दशा की सो तुम जानते ही हो। 

भेडें और भेड़िये
नेता रुपी भेड़िये कैसे जनता रुपी भेड़ों को बरगलाते हैं, इसका एक उत्तम चित्रण किया है।

एक वैष्णव कथा 
एक दफ्तर के बाबु बड़े परेशान थे। उनके दफ्तर में हुए लाखों के गबन का खुलासा हो चुका था। खाए सबने थे लेकिन बर्खास्तगी की सूली उन्ही के गर्दन में आके फंसी थी। उन्होंने सुना था कि अगर ध्यान से बुलाओ तो भगवन मदद के लिए ज़रूर आते हैं। अब बबुआइन मदद की गुहार लगाती है। क्या भगवन प्रकट होते हैं? और अगर आते हैं भी तो उनकी मदद कैसे करते हैं?

विज्ञापन में बिकती नारी 
ये व्यंग है विज्ञापनों पर जिसने नारी को एक वस्तु बना लिया है। हम कई विज्ञापन देखते हैं जिसमे स्त्री या तो कोई महंगे उत्पाद बेचती दिखाई देती है और अक्सर उस विज्ञापन का सार यही होता है कि यदि आप उस उत्पाद को प्रयोग में लायेंगे तो आप अपने चारों और उन स्त्रियों को पाएंगे।

मिल लेना 
ये 'मिल लेना' कोई आम मिलना नहीं है। ये वो मिलना है जब कोई आपका जानकार आपसे किसी व्यक्ति से मिलकर उसकी सिफारिश उससे करने के लिए कहता है। अभी तक निठल्ला इस कला को नहीं सीख पाया है। वो इस मिलने की कला से अनभिज्ञ है और उसे इस वजह से कैसी परेशानी का सामना करना पड़ता है यही इस लेख में दिखाया गया है।

जैसा कि मैंने शुरुआत में भी कहा था परसाई जी ने इन पच्चीस लेखों में समाज के हर हिस्से पर व्यंग किया। ये व्यंग बड़ा सटीक है। आजकल की राजनीतिक हालत देखें तो मैं आपको 'एक सुलझा हुआ आदमी' और 'एक गोभक्त से भेंट' पढने की सलाह ज़रूर दूँगा।

किताब के कुछ हिस्से :

मैंने कहा - आप ही सोचिये कि क्या करें ।
उन्होंने जवाब दिया - सब सोच लिया। कुछ करो, तो आधे अच्छे काम होते हैं और आधे बुरे। कुछ नहीं करने से कोई बुरा काम नहीं होता। बुरा करने से यही अच्छा है कि बैठे-बैठे अच्छा सोचा करो।

मेरी तरफ देखा। बोले-कहाँ चल दिए?
मैंने कहा - काका, मैंने तय किया है कि दूसरों का भला करूँगा।
काका बोले - और अपना भला कब करोगे? अरे, जो अपना ही भला नहीं कर सकता वह दूसरे का भला क्या करेगा? वह जानता ही नहीं कि भला क्या होता है? देखता नही है, जितने जनता के सेवक हैं, सबके घर भरे हुए हैं? क्यूँ ? क्योंकि माल बटोर रखा है उन्होंने? इसलिए कि अपने पास धन होगा, तभी यह समझ में आएगा कि धन का क्या महत्व हैं और तभी निर्धन जनता की हालत सुधारने की स्फूर्ति पैदा होगी।

मास्टर मेरे पास आ गये। बोले- पहचाना?
-हाँ-आँ, कुछ-कुछ...मगर...
-हाँ-मैं वही हूँ! हरीराम मास्टर! इधर फाटक पर बिना ईलाज के मर गया था न! अब प्रेत बनकर इलाज कराने आया हूँ।
-मगर ये लोग प्रेत का ईलाज करते भी हैं ?
-करते हैं। इनके हिसाब में देखो-कई नाम लिखे रहते हैं, जिनके लिए दवा स्टोर से निकल जाती है। वे वास्तविक आदमी नहीं होते, प्रेत होते हैं। मेरे मरने के बाद इन लोगो ने मेरा नाम रजिस्टर में चढ़ा दिया और खर्च बताने लगे। अब मैं खुद आ गया।

क्या आपने इस पुस्तक को पढ़ा है? अगर हाँ, तो अपनी राय देना न भूलियेगा। और अगर आपने नहीं पढ़ा है तो आप इस पुस्तक को निम्न लिंक्स से मंगवा सकते हैं :
फ्लिप्कार्ट
अमेज़न

11 comments:

  1. यह एक व्यंग्यात्मक रचना है, जो अनेक विसंगतियों पर तीव्र प्रहार करती है।
    इसके अलावा अशोक जमनानी की 'बूढी डायरी' भी एक पढने लायक अच्छी रचना है।
    www.yuvaam.blogspot.com

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    1. जी अशोक जमनानी जी को पढने की कोशिश रहेगी। उनके उपन्यास क्या ऑनलाइन विक्रेताओं के पास उपलब्ध हैं।

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  2. Excellent review! I'll come back to this page as reference summarising all the essays. Thanks :)

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    1. शुक्रिया, गोरब भाई। ये लेख आपके कुछ काम आ सका ये जानकर अच्छा लगा। आते रहियेगा।

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  3. ऐसे ही दो चार निठल्ले हो जाएंगे तो देश सुधर जाए ।

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  4. mujhe is kitab ki pdf copy chahiye. please help me. i can pay for the same

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    1. मेरे पास किताब की पीडीएफ नहीं है। मैं तो खरीद कर पढ़ने वालों में से हूँ।चूँकि आप भी खरीदने के इच्छुक हैं तो आप amazon का kindle एडिशन ले सकते हैं। नीचे लिंक दिया है। उधर जाकर खरीद कर पढ़ सकते हैं।
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