एक बुक जर्नल: पैंसठ लाख की डकेती और मौत का विलाप - सुरेन्द्र मोहन पाठक

Wednesday, December 31, 2014

पैंसठ लाख की डकेती और मौत का विलाप - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग : ४ /५
उपन्यास ख़त्म करने की दिनांक :

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक्स
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स
पृष्ठ संख्या : २८४
सीरीज : विमल #४



विमल (Vimal)  सुरेन्द्र मोहन पाठक (Surendra Mohan Pathak) जी का रचा हुआ  ऐसा किरदार है जिसके विषय में कहा जाता है 'न भूतो न भविष्यति' यानी ऐसा किरदार जिसके जैसा किरदार न पहले रचा गया  था न हि भविष्य में रचा जाएगा। लेकिन मेरी बद्किस्त्मती ऐसी कि मैं इस किरदार से नावाकिफ़ था। इसी साल से ही तो पाठक जी को पढ़ना शुरू किया था। और शुरुआत कोलाबा कांस्पीरेसी (Colaba Conspiracy) से की थी। फिर उनके रचना संसार से जब वाकिफ हुआ तो उनके रचे किरदारों के भी नज़दीक आया। फिर पता चला कि विमल सीरीज का एक उपन्यास जो लारे दीन के हीत आ रहा है तो वो मैंने प्री-आर्डर करा लिया। मुझे किसी भी सीरीज को आधे से पढ़ना गवारा नहीं क्यूँ कि हम किरदार की ग्रोथ का पता आधी सीरीज से पढ़कर नहीं लगा सकते । लेकिन इधर बदकिस्मती ये है कि पाठक जी कि कोई भी सीरीज शुरू से उपलब्ध नहीं है। लेकिन फिर एक उम्मीद की किरण थी कि इस उपन्यास कि कहानी में वो पैंसठ लाख हैं जो कि उनके उपन्यास 'पैंसठ लाख की डकेती' में लुटे गये थे । तो सजन्नो आपके खादिम ने ये ही ठीक समझा कि पहले 'पैंसठ' लाख कि डकेती' को पढ़ा जाए फिर 'जो लरे दीन के हीत' को। इन दोनों को पढ़कर ही हम विमल के ग्रोथ का अंदाजा लगा सकते हैं क्यूंकि एक विमल सीरीज का ४ उपन्यास है और दूसरा ४२ वाँ । खैर, ज्यादा और न पकाते हुए मैं मुद्दे की बात पर आता हूँ।

इस पुस्तक में विमल का उपन्यास तो है ही साथ में पाठक सर कि लिखी हुई कहानी मौत का विलाप भी है। पहले मैं उपन्यास के विषय में लिखूंगा और फिर मौत के विलाप के विषय में कुछ लिखूँगा।





पैंसठ लाख की डकेती - ४ /५

पहला वाक्य :
मायाराम ने एक नया सिगरेट सुलगाया और अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर निगाह डाली।

विमल आजकल अमृतसर में एक लखपति सेठ लाला हवेलीराम के ड्राईवर रमेश कुमार शर्मा के रूप में काम कर रहा था। वह एक साल से इधर था और आराम की ज़िन्दगी बसर कर रहा था। उसकी आरामदायक ज़िन्दगी में तब हलचल मचती है जब वो देखता है कि उसके ऊपर दो लोग नज़र रखे हुए हैं। वो भागने कि कोशिश करता है लेकिन मायाराम उसका रास्ता रोक लेता है। मायाराम उसे बताता है कि वो भारत बैंक को लूटने का मकसद रखता है और उसे विमल का साथ चाहिए। अगर विमल ऐसा नहीं करेगा तो मायाराम उसकी पोल खोल देगा कि वो असल में एक इश्तिहारी मुजरिम था। विमल मजबूर होकर उसका साथ देने के तैयार हो जाता है। क्या मायाराम और विमल बैंक लूटने में कामयाब होंगे? विमल पहले भी एक डकेती में अपने साथियों से धोखा खा चुका है। क्या ये डकेती पूरी इमानदारी से की जायेगी ? अगर आप जानना चाहते हैं की ये हैरतंगेज़ उपन्यास क्या मोड़ लेता है तो इस उपन्यास को पढ़ना न भूलियेगा।

उपन्यास मुझे काफी पसंद आया। ये एक थ्रिलर है और इसने अंत तक मुझे रोमांचित किया। मुझे कहीं भी बोरियत का एहसास नहीं हुआ। बस अंत मुझे ऐसा लगा कि अधूरा रह गया। विमल नीलम के साथ दिल्ली आता है लेकिन अंत में इन दोनों के बीच क्या हुआ इसमें रौशनी नहीं डाली गयी। इस कारण अंत अधूरा सा प्रतीत हुआ। दूसरी बात जो मुझे अजीब लगी कि जब विमल के  मायाराम के पास मौजूद रिवाल्वर का आभास हो गया था तो उसने वो रिवाल्वर उससे ले क्यों नहीं लिया । वो अलग बात है बाद में रिवाल्वर कोई काम नहीं आया। खैर ये छोटी छोटी कमी थी जिससे उपन्यास पढ़ने के मज़े को कम नहीं किया।

मेरा मानना है कि एक थ्रिलर को परखने का पैमाना यही होना चाहिए कि वो आपको अंत तक रोमांचित करे और पन्नों को पलटने के लिए मजबूर करता रहे। ये उपन्यास इस पैमाने पे खरा उतरता है। क्या आपको ये उपन्यास पढ़ना चाहिए? मैं कहूँगा ज़रूर पढ़िए इसे।



मौत का विलाप (Maut Ka Vilaap) ३.५/५

पहला वाक्य:
अमृता शेरगिल मार्ग के उस इलाके में आधी रात को वो चीख यूँ गूँजी जैसे मौत विलाप कर रही हो।

अमृता शेरगिल मार्ग एक ऐसा इलाका है जहाँ अधिकतर कलाकार, लेखक और कवि लोग ही बसते थे। मारपीट चिल्लम चिल्ली उधर होना मामूली दिनचर्या का एक हिस्सा था और वहां का कोई भी बाशिंदा इस पर गौर नहीं करता था। इसलिए जब एक चीख आधी रात को सुनाई दी तो धीरज खन्ना, जो कि एक नामी पेंटर था, को ये बात कुछ अटपटी नहीं लगी। वो अपनी पेंटिंग बनाना शुरू करने वाला था और खुश था क्योंकि बहुत मुश्किलों के बाद उसे अपने चित्र के लिए एक मॉडल मिली थी। लेकिन जब चीखों का सिलसिला नहीं रुका तो चीखने वाले को डांटने के इरादे से वो खिड़की पर गया। वहाँ जो उसने देखा वो दिल दहलाने वाला था। एक व्यक्ति बड़ी बेहरहमी से एक युवती का क़त्ल कर रहा था। वो बचाने के लिए भागा लेकिन कातिल क़त्ल करके भाग चुका था। सारे लोग मूक दर्शक बने हुए थे। पुलिस के आने के बाद उसे पता चला वो एक जानी मानी गायक है। फिर क्यों हुआ उसका क़त्ल ? और ऐसी गायक आधी रात को क्या कर रही थी ? और धीरज का इसमें क्या किरदार था? जानने के लिए पढ़िए पाठक सर की कृति 'मौत का विलाप' (Maut ka Vilaap).

एक बेहद रहस्मय कहानी। इस कहानी में ऐसे मोड़ आते हैं कि पाठक चकरा जाता है। पढ़कर मज़ा आया।


क्या आपने इस उपन्यास को पढ़ा है ? आपकी इसके विषय में क्या राय है, टिपण्णी बक्से में अपनी राय ज़रूर लिखियेगा। जो संस्करण मेरे पास था वो राजा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित था। अब नए संस्करण आ चुके हैं तो उनके लिंक नीचे दिए हैं।

पैंसठ लाख की डकैती
किंडल




2 comments:

  1. I liked the novel. It was so hyped. My rating 3.5/5. I thought ending could have been better. Sometimes I think pathak saheb copies plot from firangi novel. Anyway if he does it he does mix well with local flavor. He is amazing story teller. Pathak saheb zindabad

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    1. सही कहा अपने। पैंसठ लाख से भी बेहतर उपन्यास उन्होंने लिखे हैं। हाँ,ये भी सच है प्लाट कई बार बाहर के उपन्यासों से उठाये गए होते हैं। लेकिन उनपर जो वो अपना तड़का लगाते हैं वो बेहतरीन होता है। ब्लॉग पर टिपण्णी करने के लिए शुक्रिया। आते रहियेगा।

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