एक बुक जर्नल: जंगल - नरेन्द्र कोहली (Jungle by Narendra Kohli)

Thursday, November 6, 2014

जंगल - नरेन्द्र कोहली (Jungle by Narendra Kohli)

रेटिंग: ३.५/५
उपन्यास ख़त्म करने की तारिक: २६ अक्टूबर,२०१४

संसकरण विवरण :
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : १०४
प्रकाशक : राजपाल


प्रथम वाक्य:

सांबली और गछट के सरकारी जंगलों में , लकड़ी की कटाई-चिराई का काम आरंभ होने वाला था ।


वैसे तो ये उपन्यास एक गाँव के ठेकेदारों के विषय में है, लेकिन उनका जीवन किसी शहर या विश्व के पूंजीपतियों से ज्यादा भिन्न नहीं हैं। उपन्यास का मुख्य पात्र अकबर खाँ ही है क्यूंकि उपन्यास उसी की तरक्की एक मामूली मुंशी से ठेकेदार बनने से होता है और अंत उसकी मृत्यु पे होता है । अकबर खाँ अपने जीजा के पास एक मुंशी का काम करता था, लेकिन वो उधर संतुष्ट नहीं था । इसलिए जब उसे मौका एक ठेका मिलने का मौका मिलता है तो रोकर और गिदगिड़ा कर उसे हासिल कर ही लेता है। उसके दिन फिरने लगते हैं और पैसे कमाने का भूत उसके सर चढ़कर बोलने लगता है । उसी के माध्यम से पाठक बाकि ठेकेदारों के जीवन से भी रूबरू होता है।

ठेकेदारों का जीवन और रहन सहन विलासी है।  वो ठेकों के लिए  अफसरों के तलवे चाटते हैं।

पीरशाह स्वयं को अच्छी तरह पहचानता था । उसे हिन्दुस्तानी अफसरों के विषय में भी कोई भ्रान्ति नहीं थी । वह जानता था की जब तक चारवुड स्वयं ही उससे कुछ न पूछे , पीरशाह उसके सामने मुँह खोलने का साहस नही कर सकता । पर वह अपने विषय में फज़लदाद खाँ की गलतफहमियों को नष्ट नहीं करना चाहता था । फज़लदाद खाँ को ही नहीं , सारे ठेकेदारों को देसी अफसरों के अधिकारों के विषय में भ्रांतियाँ बनी रहनी चाहिए। एक बार उन लोगों का भ्रम खुल गया तो सारी खुशामद, सलामें और डालियाँ समाप्त हो जाएँगी। पीरशाह अच्छी तरह जानता था, यह ठेकेदारों की सद्भावना नहीं है ।

मजदूरों को शोषित करके ही धन कमाया जा सकता है यही उनका आदर्श लगता है।

तुमने आरामतलबी की आदत डाल ली, तो तुम कभी सफल नही हो सकोगे । तुम्हारे कारिंदे , मुंशी और मजदूर तुम्हे लूट कर खा जायेंगे । तुम्हे कुछ कमाना है तो अपने कर्मचारियों के सर पर सवार रहना होगा । उन पर पक्का नियंत्रण रखना होगा। उनकी निगरानी करनी होगी और उन्हें चैन नहीं लेने देना होगा । यदि तुमने ज़रा भी आलस्य या लापरवाही से काम लिया, तो तुम्हारा सारा किया-किराया मिट्टी में मिल जाएगा और तुम सफल ठेकेदार कभी नहीं बन पाओगे ।  ठेकेदार की सफलता का रहस्य केवल एक बात में है - अपने मजदूरों का अधिक-से-अधिक शोषण करने में । उनसे जितना अधिक काम करवाओगे, और जितना कम उनको दोगे, उतने ही लाभ में रहोगे । 

वो एक दूसरे की मदद करने के लिए भी तैयार रहते हैं क्यूंकि वो नहीं चाहते की एक ठेकेदार के नीचे जितने भी मजदूर हैं वो विद्रोह करें या स्वतंत्र हों।  

नानकचन्द को बचाना ही होगा। यदि नानकचंद और उसका लड़का पकडे गए तो नानकचंद की ज़मीन का वारिस कोई नहीं रह जाएगा। उसके किसान स्वतंत्र हो जायेंगे , जो जितनी ज़मीन जोतता है,उसका स्वामी बन बैठेगा । किसानों की स्वतंत्रता सारे इलाके के लिए हानिकारक होगी। उनकी देखा-देखी कल अकबर खाँ के किसान भी स्वतंत्र होना चाहेंगे।


क़ानून उनकी जेब में रहता है जिसे वो पैसे या अपने रसूख के कारण तोड़ने और मरोड़ने में सफल रहते हैं। और चूंकि वो तालाब के मगर हैं तो पुलिस के कारिंदे भी उनसे बैर नहीं रखते हैं और अपने उल्लू को सीधा करने की फ़िराक़ में रहते हैं।

"राजा साहब ! ऐसा जुल्म हमारे साथ मत कीजिये।" थानेदार ने अकबर खाँ की ज़्यादती के विरुद्ध शिकायत की,"एक मासूम लड़की की हत्या को छिपा जाने के लिए,पाँच सौ रूपये काफी नहीं हैं।"
"यह हत्या नहीं है भाई !दुर्घटना है । आपको लाला नानकचंद से सहानुभूति होनी चाहिए।"
"नानकचंद मोटी मुर्गी है राजा साहब !" थानेदार ने मोल लगाया, "एक हज़ार दे देने से नानकचंद कंगाल नहीं हो जाएगा। और हमें चाँदी के रुपये नहीं ,नोट चाहिए नोट।"
अकबर खाँ ने अपनी सहमति दे दी।

"यदि आप इतने ही आश्वस्त हैं ,तो गोपी को पकड़ लें।"

" पकड़ तो सकता हूँ।" थानेदार उदासीनातापूर्वक मुस्कराया,"उसे मृत्युदंड भी दिलवा सकता हूँ। पर मेरा ऐसा करने का कोई इरादा नहीं । जमाँ खाँ मर गया, गुलाबजान मर गयी; अब मैं उनके पीछे अपनी गर्दन क्यों कटवाऊँ। मेरा राजा खुशहाल खाँ से शत्रुता मोल लेने का कोई इरादा नहीं है ।"


"यदि तुमने राजा फज़लदाद खाँ, राजा दिलावर खाँ या ऐसे ही किसी राजा , जमींदार , ठेकेदार पर हाथ डालने की कोशिश की, तो बहुत शोर मचेगा - वे लोग धनी हैं । तुम्हे एक आदमी को पकड़कर फांसी पर चढ़वाना है । चुपचाप याकूब को पकड़ लो । गरीब आदमी है, कोई चूं भी नहीं करेगा । हत्या किसी ने भी की हो, हमें तो कोई एक आदमी चाहिए, जिसे हत्यारा करार दिया जा सके। हमारे लिए सब से आसान यही है कि याकूब को फाँसी चढ़ा दें । जाओ अब देर मत करो।"
 "बहुत अच्छा हुजूर !"
थानेदार ने कड़क सैल्यूट मारा और बाहर निकल गया।


वो गाँव में सर्वोपरि है और चूंकि कानून भी उनके तलवे चाटता है तो वो गाँव में मनमानी करते हैं और गरीबों का आर्थिक और योन शोषण करने से भी नहीं हिचकते हैं।

यह मकान ज़माँ खाँ का पुराना अड्डा था;राजा खुशहाल खाँ से स्वतंत्र,उसका अपना केंद्र ।ज़माँ खाँ के चेले-चाटे उसे यहाँ घेरे रहते थे। उसने इससे पहले भी अनेक रातें यहाँ बिताई थीं। कितनी ही रातों में, गाँव की कुँआरी लडकियाँ तथा नवयुवती विवाहिताएँ, उसके कँधे पर लद कर यहाँ आयी थीं ;और रात के आखिरी प्रहर में रोती हुई अपने फटे कपड़ों को संभालती,छिपती-छिपाती निकल कर गयीं थीं ।
अब ज़माँ खाँ, गुलाबजान के साथ बसने यहाँ आ गया था । गुलाबजान एक सजा-सजाया भरा-पूरा घर देखकर प्रसन्न थी । उसने अपनी स्वतंत्र गृहस्थी संभाल ली थी।


उपन्यास बेहतरीन है और समाज का असल रूप दिखाता है।  इसके किरदार जीवंत प्रतीत होते हैं और कभी कभी इस सच्चे किरदारों को देखकर निराशा मन में आ सकती है, लेकिन फिर भी मैं चाहूँगा सभी इस उपन्यास को पढ़ें।  कोहली जी ने कथानक को एक छोटे से गाँव में दिखा कर ये दर्शया है कि समाज की  मूल विशेषताएं, उसमे मौजूद विभिन्न वर्गों का समीकरण और उस समाज की  मुश्किलें एक जैसे ही रहती हैं फिर चाहे वो समाज एक गाँव का हो  या किसी क़स्बे का या फिर एक शहर का।


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अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आप अपनी प्रतिक्रिया देने में नहीं झिझाकियेगा।  और अगर ऐसे ही किसी बेहतरीन उपन्यास के नाम आप साझा करना चाहें तो वो भी ज़रूर कीजियेगा। 

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