Monday, April 14, 2014

त्रिशंकु - मन्नू भंडारी

Rating: 3.5/5
Finished On: 30 march, 2014



संस्करण विवरण
format-पेपरबैक
प्रकाशक - राधाकृष्ण प्रकाशन
पृष्ट संख्या - 160

त्रिशंकु मन्नू भंडारी जी का कहानी संग्रह है, जिसमें उनकी निम्न कहानियों को संग्रहित किया है-

आते-जाते यायावर 2.5/5
नरेन मिताली से उसकी सहेली रमला  के घर पे मिलता है। नरेन एक ऐसा आदमी है जो किसी बंधन से बंधना नहीं चाहता है। लेकिन जब रमला नरेन को मिताली को छोड़ आने को कहती है तो उन्हें बातचीत करने का मौका मिलता है। वो न चाहकर भी नरेन के प्रति आकर्षित हो जाती  है । आगे क्या होता है ये तो आप कहानी पढने के बाद ही जानेंगे।

दरार भरने की दरार 3/5
नंदिता के पास जब श्रुति आती है तो उसे लगता है जैसे कोई बड़ी बात है और श्रुति को उसका सहारा चाहिए। श्रुति और उसके पति विभु में क्या बात हुई थी और क्या नंदिता उसकी मदद कर पाएंगी??

स्त्री-सुबोधिनी 2.5/5
स्त्री सुबोधिनी एक ऐसी औरत,जिसने अपने बेवकूफी के कारण प्यार में धोखा खाया, का पत्र है दूसरी औरतों के लिए। पत्र में उन्होंने अपनी स्त्री बहनों को कुछ हिदायत दी हैं, जिससे वो अपने प्रेम प्रसंगों से होने वाले दुखों से बच सकती हैं।

शायद 3.5/5
राखाल जहाज में काम करता है। उसकी बीवी है, बच्चे हैं लेकिन जहाज की नौकरी ऐसी है की वह घर एक दो साल में ही जा पाता है। जब वो छुट्टियों में तीन साल बाद घर लौटता है तो उसे अपना घर ही पराया लगने लगता है।

त्रिशंकु 4.5/5
एक उम्दा कहानी। त्रिशंकु का अर्थ मुझे पहले मालूम नहीं था, गूगल पर सर्च किया तो पता चला की इसका अर्थ है 'निराधार लटकते रहना' और ये इस कहानी पर सटीक बैठता है। कहानी  आजकल के समय के ऐसे परिवारों की है जिसमे अभिभावक अपने को mordern समझते हैं लेकिन जब उनके बच्चे उनका अनुसरण करते हैं तो वे घूम फिर कर अपनी सोच उनपे थोपने की कोशिश करते है।  कहानी है तनु की और उसके अभिभावकों की जो की बेहद mordern ख्यालों के लोग है। तनु की ममी ने प्रेम विवाह किया था जबकि उनके पिताजी इसके विरोध में थे। ये उनके mordern होने का सबूत  था , लेकिन जब तनु इसका अनुसरण करने की कोशिश करती हैं तो उनका रवय्या अपने पिता जी की तरह ही होता है। वे त्रिशंकु की तरह एक ऐसे स्थान पर निराधार लटकी हुई हैं जिसमें ऊपर तो mordernity की सोच है और नीचे की तरफ अपने लोक-लाज को मान्यता देने वाली पुरानी सोच। और इस सोच के बीच दबती है उनकी लड़की तनु जो तय करने में असमर्थ है की जिस चीज की उसकी ममी और उनके साथी हमेशा तारीफ़ करते आयें हैं जब वह खुद वही करना चाहती है तो क्यूँ उसे रोका जाता है। क्या mordern होने की बात करना ही अच्छा है और उसे अपने आचरण में लाना नहीं। या mordernity केवल अपने हिस्साब से तय की जाती है और जब बच्चे ये करने की कोशिश करते हैं तो उन्हें वैसे ही दबाया जाता है।
कहानी की एक पात्र तनु इस सोच को बड़े सही तरीके से बताती हैं-
केवल मैं इस सारी स्थिति से एकदम तटस्थ होकर यही सोच रही थी की नाना पूरी तरह नाना थे -शत प्रतिशत-और इसी से ममी के लिए लड़ना कितना आसान हो गया होगा। पर इन ममी से लड़ा भी कैसे जाए जो एक पल नाना होकर जीती हैं तो एक पल ममी होकर!

रेत की  दीवार 3/5
रवि छुट्टियों में घर आया हुआ है। वो इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष का छात्र है।  उसके घर की आर्थिक स्थिति सही नहीं है , लेकिन उसके पिताजी फिर भी उसे पढ़ा रहे हैं और  वो उसके ऊपर अपने परेशानियों को नहीं जाताना चाहते हैं। लेकिन फिर भी वो इन बातों को समझता है और इन जिम्मेदारियों को उठाना उसके लिए मुश्किल हो रहा है। ये एक रेत की दीवार की तरह है जिसमे वो धंसता जा रहा है।

तीसरा हिस्सा 3.5/5
शेरा बाबु के तीन हिस्से हैं -घर,नौकरी और उनकी पत्रिका। घर और नौकरी के साथ तो वे समझोता कर चुके हैं पर अपने वक्तित्व के तीसरे हिस्से का वे समझोता नहीं करना चाहते हैं। 
अच्छी कहानी थी और कभी कभार हास्यकर भी है - विशेषतः शेरा बाबू की अपने मन में की गयी टिप्पणियाँ, जो उनके मन की खीज को दर्शाती हैं।

अ-लगाव 3.5/5
अ-लगाव कहानी हमारी सामाजिक स्थिति को दर्शाती है। आजकल कोई बात होती है तो उसे मीडिया म्विन तूल पकड़ते ज्यादा देरी नहीं लगती है। इसपर  मंत्री उस घटना को सुलझाने का आशवाशन देते है और दबाव में उन्हें इसके लिए कार्यवाही करनी पड़ती है, किन्तु इन सब से क्या इन्साफ मिल सकता है या ये क्या एक आडम्बर होता है?? इस कहानी में ये दर्शाया गया है। बिसेसर की लाश जब पुलिया के पास गाँव में मिलती है, तो हडकंप मच जाता है। चुनाव सर पर हैं और ये घटना तूल पकड़ने लगती है। दबाव में आकर उन्हें इस पर काम करना पड़ता है। आगे क्या होता है, आप जानेगे इस कहानी को पढ़कर।

आकाश के आयने में   3.5/5
दिनेश और लेखा अपने परिवार से दूर कलकत्ते  में रहते हैं। वे माहवारी खर्चा घर भेजते हैं। लेकिन जब लेखा का काफी वक़्त के बाद घर आना होता है तो उसे इस बात का एहसास होता है की अपने ही ससुराल में वो कैसे अनजानी हो गयी है। वो एक अजनबी की तरह महसूस करती है। घर की परेशानी, घर की लोगों के बीच के तनाव से वो कितना अंजान थी। उसे लगता है की वो घर का केवल एक प्रतिबिम्ब ही अपने में समेटी हुई थी और घर आकर उसका आइना टूट चुका है  और घर का जो दृश्य उसे दिख  रहा है वो इससे अनभिज्ञ है।
अकसर आजकल की जिंदगी में हम अपने ही हाल में व्यस्त हैं। काम की तलाश में हम बड़े शहरों में आते हैं और अपनी अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो जाते हैं। कभी कभार घर वालों से बात होती है और हमें लगता है हम सबसे touch में हैं। लेकिन जब हम घर जाते हैं तो इसी तरह का एहसास हमें होता है। मैं इस कहानी को समझ सकता हूँ क्यूंकि आपनी काफी जिंदगी मैंने घर से बाहर  बितायी है और कितनी चीजें मैंने खोयीं है उसका अंदाज़ा नहीं लग सकता है। सबसा कीमती तो अपनापन । कहने को तो हम अपने ही घर जाते हैं लेकिन एक एक तरीके का comfort level उधर नहीं हो पाता है। मैं लेखा की मनोस्थिति को समझ सकता हूँ।

असामयिक मृत्यु 4.5/5
महेश बाबू की जब असामयिक मृत्यु होती है तो, किस तरह उनके पूरे परिवार में परिवर्तन आ जाता है, उसका बहुत ही मार्मिक चित्रण भंडारी जी ने किया है।

त्रिशंकु एक काफी वर्सटाइल संग्रह है। उनकी कहानियां और पात्र काफी विविध हैं और जीवन के कई पहलुओं को छेड़ते हैं। एक  मध्यमवर्गीय  जीवन और परिवार में अाने वाली अनेक घटनाओं बखूबी दिखाया । 

 मुझे ये संग्रह काफी पसंद आया। मैंने अपनी क्षमतानुसार इसे दर्शाने की कोशिश की है , अगर इसमें कोई त्रुटी रह गयो हो तो माफ़ी मांगना चाहूँगा।
अगर आपने भी इसे पढ़ा है, तो आप इसके विषय में आपके ख़यालात मुझे बता सकते हैं।

आप इस  पुस्तक को निम्न लिंकों से प्राप्त कर सकते हैं -

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अपने  विचार इस संग्रह के विषय में ज़रूर बताइएगा । 

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