Monday, November 18, 2013

चित्रलेखा - भगवती चरण वर्मा

ratings : 3/5
finished on: October 24, 2013


चित्रलेखा भगवतीचरण वर्मा  जी  का 1934 में प्रकाशित उपन्यास है। अक्सर मनुष्य के मन  में कई बार प्रश्न उत्पन होता है की आखिर पाप क्या है और इसकी उत्पत्ति कैसे होती है। हमारे बीच यह धारणा है की सांसारिक जीवन ही पाप की उत्पत्ति का एक केन्द्र होता है और अगर किसी ने इस सांसारिक जीवन से सन्यास ले लिया है तो हम ये मान लेते हैं की उसका जीवन से पाप का नामोनिशान मिट चुका होगा।

यह उपन्यास भी इसी सोच के ऊपर एक प्रश्न चिन्ह उठाता है। क्या हमारा जीवन सन्यास लेने से पाप मुक्त हो जाता है,क्या जब तक सांसारिक जीवन के फेर में रहेंगे तब तक हम पापमुक्त नहीं हो सकते है?इन्ही प्रश्नों का उत्तर  यह उपन्यास अपने प्रमुख पात्रों के माध्यम से जानने की चेष्टा करता है।

इस उपन्यास का सारा घनाक्रम पाटलिपुत्र में चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में ही होता है।

महाप्रभु रत्नाम्बर के शिष्य श्वेतांक ने जब उनसे पुछा की पाप क्या है तो रत्नाम्बर का उत्तर था
 
'पाप? बड़ा कठिन प्रश्न है वत्स ! पर साथ ही बड़ा स्वाभाविक ! तुम पूछते हो पाप क्या है ?'
'हाँ पाप की परिभाषा करने की मैंने भी कई बार चेष्टा की है, पर सदा असफल रहा हूँ । पाप क्या है और उसका  निवास कहाँ है;यह एक बड़ी कठिन समस्या है ,जिसको आज तक नहीं सुलझा सका हूँ। अविकल परिश्रम के बाद,अनुभव के सागर में उतरने के बाद भी जिस समस्या को नहीं हल कर सका हूँ, उसे किस प्रकार तुमको समझा दूँ?'



तो इसी पाप को ढूँढने के लिए रत्नाम्बर उसे ये सुझाव देते हैं
 
'पर श्वेतांक यद् तुम पाप को जानना चाहते हो, तो तुम्हे संसार में ढूँढना पड़ेगा। '


और चूँकि उनके अन्य शिष्य विशालदेव के मन में भी यही प्रश्न था तो वो उसे भी यही सलाह देते हैं।

वे अपने शिष्यों को पाटलिपुत्र के दो निवासी कुमारगिरी और बीजगुप्त,जो की रत्नाम्बर के शिष्य रह चुके हैं ,  के पास रहने की सलाह देते हैं।
 
'इस नगर के दो महानुभावों से में यथेष्ट परिचित हूँ और इस कार्य को पूरा करने के लिए तुम दोनों को इन दोनों की सहायता की आवश्यकता होगी । एक योगी है और दूसरा भोगी- योगी का नाम कुमारगिरी है और भोगी का नाम है बीजगुप्त । तुम दोनों के जीवन को इनके जीवन-स्रोत के साथ साथ ही बहना होगा।'

'कुमारगिरी योगी है,उसका दावा है कि उसने संसार की समस्त वासनाओं पर विजय पा ली है। संसार से उसे विरक्ति है,और अपने मतानुसार उसने सुख को भी जान लिया है; उसमे तेज और प्रताप है; उसमें शारीरिक बल है और आत्मिक बल है । जैसा की लोगों का कहना है, उसनें ममत्व को वशीभूत कर लिया है। कुमारगिरी युवा है; पर यौवन और विराग ने मिलकर उसमें एक अलौकिक शक्ति उत्पन्न कर दी  है। संसार उसका साधन है और स्वर्ग  उसका लक्ष्य'

'बीजगुप्त भोगी है, उसके हृदय में यौवन की उमंग है और आँखों में मादकता की लाली। उसकी विशाल अट्टालिकाओ में भोग-विलास नाचा करते हैं;  रत्नजड़ित  मदिरा के पात्रों  में ही उसके जीवन का सार सुख है। वैभव और उल्लास की तरंगों में वह केली करता है,ऐशवर्य की उसके पास कमी नहीं है। उसमें सौन्दर्य है और उसके हृदय  में संसार की समस्त वासनाओं का निवास। उसके द्वार पर मातंग झूमा करते हैं; उसके भवन में सौंदर्य के मद में मतवाली नर्तकियों  का  नृत्य हुआ करता है। ईश्वर पे उसे विश्वास नहीं, शायद उसने कभी ईश्वर  के विषय में सोचा तक नहीं है। और स्वर्ग तथा नरक की उसे कोई चिंता नहीं। आमोद और प्रमोद ही उसके जीवन का साधन हैं तथा लक्ष्य भी है। '


विशादेव को कुमारगिरि  के साथ और श्वेतांक को बीज्गुप्त के साथ रहने का बंदोबस्त कराकर, रत्नाम्बर  उन दोनों से एक वर्ष पश्चात मिलने को कहते हैं ताकि वे दोनों अपने अनुभवों को बाँट सके और आगे की निर्धारित शिक्षा ले सकें।

इस उपन्यास का एक मुख्य  किरदार चित्रलेखा है। वह एक नर्तकी है और पाटलिपुत्र कि सबसे सुंदर स्त्री है ।   
 वह एक विदूषी है और अपने तर्कों से कई बार ज्ञानी पुरुषों जैसे कुमागिरी  तक को चुप करा देती है। बीजगुप्त उसका प्रेमी है और उसे अपनी पत्नी मानता है।

जब चित्रलेखा योगी कुमारगिरी से प्रथम बार मिलती है तो उसके व्यकतित्व  और सुन्दरता पर आकर्षित हो जाती है।
 
'योगी की आँखें नर्तकी  की आँखों से एक बार मिल गयी।  वासना तपस्या के सामने काँप उठी।'


बीजगुप्त भी इस बात को समझ लेता है, जब वह अपनी शंका जाहिर करता है तो चित्रलेखा बीजगुप्त को यकीन दिलाती है की ऐसा कुछ नहीं है।
 
" चित्रलेखा ने बीजगुप्त को धोखा दे दिया; पर वह अपने को धोखा न दे सकी, उसने मन ही मन कहा -' पर कुमारगिरी सुन्दर अवश्य है।' "


इस आकर्षण से इन तीनों-बीजगुप्त,कुमारगिरी और चित्रलेखा के जीवन में जो घटनाक्रम होता है वही इस उपन्यास की  बाकी कि कहानी बनता है ।

इसी उपन्यास कि कुछ पंक्तियाँ जो मुझे पसंद आयी । 


'मेरे नीतिशास्त्र में कही-कहीं निर्धारित धर्म की रूड़ीयों  के विरोधी सिधांत मिलते हैं,यह स्पष्ट है और यह में मानता हूँ;पर साथ ही यह बतला देना चाहता हूँ की धर्मं समाज द्वारा निर्मित है। धर्मं ने नीतिशास्त्र को जन्म नहीं दिया है,वरन् इसके विपरीत नीतिशास्त्र ने धर्म को जन्म दिया है। समाज को जीवित रखने के लिए ही समाज द्वारा निर्धारित नियमों को ही नीतिशास्त्र कहते हैं, उर इस नीतिशास्त्र का आधार तर्क है। धर्म का आधार विश्वास है और विश्वास के बंधन से प्रत्येक मनुष्य को बाँधकर उससे अपने नियमों का पालन कराना ही समाज के लिए हितकर है। इसलिए ऐसी भी परिस्थितियाँ आ सकती हैं, जब धर्मं के विरुद्ध चलना समाज के लिए कल्याणकारक हो जाता है और धीरे धीरे धर्म का रूप बदल जाता है।'

मुझे ये उपन्यास काफी पसंद आया । इसका विषय ऐसा था जिसके बारे में हम कभी न कभी सोचते हैं। अंत में लेखक कि इस बात से में पूरी तरह सहमत हूँ कि पाप केवल सोचने वाले कि सोच पर निर्भर करता  है । लेखक ने इसे बड़ी खूबसूरती के साथ दर्शाया है।  कुमारगिरी ने भले ही संसार छोड़ दिया था पर फिर भी वो अपने गुरूर और वासना पे काबू नहीं पा  पाया था । दूसरी  तरफ बीजगुप्त  है , जिसने कभी ईश्वर कि पूजा नहीं कि पर वह अपने गुरु भाई के लिए अपनी सारी  संपत्ति त्यागने को तत्पर हो जाता है।  मैं  चाहूँगा कि एक बार तो लोग इसे अवश्य पढें ।

लिंक्स  जहाँ से आप इसे माँगा सकते हैं :
अमेज़न
किंडल


5 comments:

  1. I read Chitralekha in 1970s. With two of my friends. Had a lot of discussion. You have excerpted some good pieces. . Thanks. Bhagwaticharan verma was master of historical fiction and unparalleled so far.

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  2. I want to ask some questions vai email. Can u provide me ur email address

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  3. जब मैंने यह उपन्यास पढ़ने के लिए उठाई तो मुझे कोई विशेष अपेक्षा नहीं थी इस उपन्यास से।परंतु इसके पहले पृष्ठ को पढ़ते ही मैं इसमें बहुत रम गया।मुझे यह उपन्यास बहुत ज्यादा पसंद आयी।

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