खूनी कब्रिस्तान | तुलसी कॉमिक्स | मनोज प्रिय

संस्करण विवरण:

 फॉर्मैट: ई बुक | प्रकाशक: तुलसी कॉमिक्स | प्लैटफॉर्म: प्रतिलिपि | लेखक: मनोज प्रिय | संपादक: प्रमिला जैन 

कॉमिक बुक लिंक: प्रतिलिपि



कहानी 

विशालगढ़ के कब्रिस्तान में भूतों का बसेरा था। इन भूतों का उधर इतना आतंक था कि कोई भी व्यक्ति कब्रिस्तान के नजदीक जाने से भी घबराता था। कहते थे कब्रिस्तान के भूतों ने कब्रिस्तान के चौकीदार को भी जान से मार डाला था। और अब गाँव वालों ने इन भूतों से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझ ली थी। 

राकेश और मनोज इसी विशालगढ़ में अपनी छुट्टी मनाने आये हुए थे। मनोज के मामाजी यहाँ रहते थे और उसने गर्मियों की छुट्टियों को यहाँ बिताने का फैसला कर लिया था। 

वह कहाँ जानता था कि विशालगढ़ के भूत उसकी ताक में बैठे थे और फिर परिस्थितियाँ ऐसी हो गयी कि उसे और उसके दोस्त को ना चाहते हुए भी इन भूतों से लड़ना पड़ा।

आखिर विशालगढ़ में रहने वाले भूत क्यों लोगों की जान ले रहे थे? 
मनोज और राकेश को क्यों इन भूतों से भिड़ना पड़ा? 
क्या वह दोनों इस खूनी कब्रिस्तान से बच सके?

किरदार

मनोज - एक किशोर जिसके मामाँ विशालगढ़ रहते थे 
राकेश - मनोज का दोस्त जो कि काफी हंसोड़ था 
पीटर - विशालगढ़ के कब्रिस्तान का नया चौकीदार 
मार्था - पीटर की पत्नी 

मेरे विचार

अपने बचपन में मुझे तुलसी कॉमिक्स पढ़ने का कम ही मौका लगा। अब प्रतिलिपि पर तुलसी कॉमिक्स दिख रहे हैं तो उन्हे एक एक करके पढ़ रहा हूँ। वैसे भी थ्रिल हॉरर सस्पेंस श्रेणी की कहानियाँ पढ़नी मुझे पसंद हैं। फिर चाहे वो उपन्यास हों या कॉमिक्स। इसलिए तुलसी कॉमिक्स द्वारा प्रतिलिपि में प्रकाशित इस श्रेणी की कॉमिक बुक पढ़ रहा हूँ। प्रस्तुत कॉमिक्स खूनी कब्रिस्तान भी इसी हॉरर थ्रिल सस्पेंस  श्रेणी का कॉमिक बुक है। 

अगर आप कस्बे में रहे हैं तो वहाँ एक न एक जगह ऐसी रहती ही है जहाँ के विषय में ये प्रसिद्ध रहता है कि उधर भूत प्रेत का बसेरा है। उधर भूत प्रेत हो या न हो लेकिन उस जगह के विषय में अनेक कहानियाँ प्रचलित हो जाती हैं और कालांतर में ऐसे कई लोग भी दिख जाते हैं जिन्होंने उधर भूत प्रेतों को देखा होता है। यह कहानियाँ अक्सर किसी की कल्पना मात्र ही होती है लेकिन किशोरों के लिए यह रोमांच का एक जरिया बन जाती है। कई बार भूत प्रेतों की कहानियाँ लोगों द्वारा किसी स्वार्थवश भी फैलाई जाती हैं ताकि लोग उससे दूर रहे और वहाँ वो अपने कार्य को निर्बाध तरीके से करते रहें। प्रस्तुत कॉमिक बुक भी इसी विचार के इर्द गिर्द बुना गया है। खूनी कब्रिस्तान की कहानी विशालगढ़ में घटित होती है। जैसे कि शीर्षक से ही साफ है विशालगढ़ का कब्रिस्तान ही ऐसी जगह है जो भूतों का डेरा होने के लिए बदनाम है और इसिलिये खूनी कब्रिस्तान कहलाता है।

कहानी के केंद्र में मनोज और राकेश नाम के दो किशोर हैं।  यह दोनों अलग अलग स्वभाव केर होते हुए भी पक्के दोस्त हैं। जहाँ राकेश खुशमिजाज मजाकिया लड़का है वहीं मनोज गंभीर है। दोनों ही साहसी हैं और मौका मिलने पर अच्छे खासे लोगों के दाँत खट्टे कर सकते हैं। अगर आप हिंदी कॉमिक बुक या उपन्यास या बाल उपन्यास पढ़ते आए हैं तो जानते होंगे कि ऐसी जोड़ी युनीक नहीं है। हिंदी लोकप्रिय साहित्य में एक वक्त ऐसा था जब ऐसी जोड़ी लेखकों के बीच में काफी प्रसिद्ध थी। कई लेखकों ने ऐसी जोड़ियाँ बनाकर काफी रचनाओं को रचा था। राजन-इकबाल, विजय रघुनाथ,राम रहीम, विनोद हमीद जैसे न जाने कितने ऐसे किरदार हैं जो इस तर्ज पर लिखे गए हैं जहाँ एक व्यक्ति कहानी में हास्य लाता है और दूसरा लीडर की तरह कहानी को आगे बढ़ाता है। वहीं ऐसी कहानियों की एक खास बात यह भी होती है कि अक्सर लीडर यानि गंभीर व्यक्ति को मामले के विषय में ऐसी जानकारी होती है जो कि दूसरे को नहीं होती है। प्रस्तुत कॉमिक बुक के मुख्य पात्रों में भी ऐसा ही समीकरण देखा जा सकता है। राकेश और मनोज के बीच की चुहलबाजी मनोरजंक है और मैं इन किरदारों को लेकर लिखे गए अन्य कॉमिक बुक जरूर पढ़ना चाहूँगा। 

कॉमिक बुक के कथानक की बात करूँ तो कॉमिक बुक का कथानक ऐसा है जिसके जैसा कथानक आपने काफी बार पढ़ा होगा। हो सकता है नब्बे के दशक में जब यह कहानी आयी हो तब यह कथानक नवीन रहा हो लेकिन आज के वक्त में जिस विचार के इर्द गिर्द यह कहानी बुनी गयी है वह काफी पुराना हो चुका है। लेकिन यह बात भी है कि यह एक एवर्ग्रीन टॉपिक है जिस पर लेखक आज भी लिखते आ रहे हैं। ऐसे में कथानक के तौर पर अगर आप हमेशा कुछ नया तलाश करते हैं तो आपको शायद यह उतना पसंद नहीं ना आए। लेकिन मुझे चूँकि इस चीज से इतना फर्क नहीं पड़ता है तो मैं इसका लुत्फ ले पाया था। मुझे पता था कि अंत किस तरह से होगा लेकिन मैं देखना चाहता था कि इन सबके पीछे कौन निकलता है। वहीं यह किशोर किस तरह से रहस्य का पता लगाते हैं और इस दौरान किन किन परेशानियों से होकर गुजरते हैं यह देखने के लिए भी आप कॉमिक बुक के पृष्ठ पलटते चले जाते हैं। हाँ, चूँकि यह कॉमिक बुक है तो किशोरों का खलनायकों से टकराव काफी जल्दी हो जाता है। अगर उनके बीच आँखमिचौली का खेल थोड़ा चलता तो कथानक में रोमांच और बढ़ सकता था। कई बार मुझे लगता है कुछ कुछ कॉमिक बुक को उपन्यास या लघु उपन्यास के रूप में भी लाना चाहिए। तभी वह कथानक के साथ न्याय कर सकती हैं। वरना निश्चित पृष्ठ संख्या के कारण कहानी को जल्द ही निपटा दिया जाता है और वह उतनी प्रभावी नहीं रह पाती है जितना कि तब रहती जब इसे विस्तृत तौर पर उपन्यास या लघु उपन्यास के तरह लिखा होता।

वैसे इसी कान्सेप्ट पर मैंने काफी पहले राजनारायण बोहरे का लघु-उपन्यास गढ़ी के खंडहर  पढ़ा था। इस उपन्यास केंद्र में भी कुछ किशोर हैं जो कि एक खंडहर में मौजूद प्रेत, जिसने गाँव वालों में दहशत फैलाई होती है, से दो दो हाथ करते हैं। वह उपन्यास भी रोचक था। अगर आपने नहीं पढ़ा है तो एक बार पढ़ सकते हैं और घर में मौजूद किसी बच्चे को भी दे सकते हैं। 


अंत में यही कहूँगा कि खूनी कब्रिस्तान एक बार पढ़ा जा सकता है। अगर आप कथानक की नवीनता चाहते हैं तो शायद यह आपको निराश करे लेकिन उसे दरकिनार करके कथानक का लुत्फ आप लेते हैं तो एक बार इसे पढ़ सकते हैं। राकेश मनोज की जोड़ी आपका मनोरंजन करती है और कथानक में घटने वाले एक्शन कहानी में रोमांच बनाए रखते हैं।  राकेश मनोज की जोड़ी मुझे पसंद आई और ऐसी जोड़ी के दूसरे कारनामें मैं जरूर पढ़ना चाहूँगा। 

कॉमिक बुक लिंक: प्रतिलिपि


आज का प्रश्न

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