आज का उद्धरण

निर्मल वर्मा | आदि अंत और आरम्भ | हिन्दी कोट्स

खण्डहरों के बीच जो बचा रह गया था, वह 'ईश्वर' था, जिसे हमने उपनिषद के उपयुक्त उद्धरण में देखा था? खुद अगोचर होता हुआ भी सृष्टि  को गोचर होता हुआ, समूची सृष्टि के आकार को अपने अनाकर से चमकाता हुआ- दोनों के बीच भेद गिराता हुआ। मुझे डर है, वह 'ईश्वर' भी अब उतना ही अपने घर से निर्वासित था, जितना मनुष्य।

- निर्मल वर्मा, आदि, अंत और आरम्भ

किताब लिंक: पेपरबैक | हार्डकवर

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4 Comments
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  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (10-02-2021) को "बढ़ो प्रणय की राह"  (चर्चा अंक- 3973)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    Replies
    1. चर्चाअंक में मेरी प्रविष्टि को शामिल करने के लिए आभार, सर...

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