पुस्तक अंश: गुण्डागर्दी - अनिल मोहन

 गुण्डागर्दी देवराज चौहान श्रृंखला का उपन्यास है। यह उपन्यास रवि पॉकेट बुक्स द्वारा हाल ही में पुनः प्रकाशित किया गया है। आप हम इसी उपन्यास का एक छोटा सा रोचक हिस्सा आपके लिए लेकर आये हैं। उम्मीद है यह हिस्सा आपको पसंद आएगा।

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पुस्तक अंश: गुण्डागर्दी - अनिल मोहन


देवराज चौहान पैदल ही आगे बढ़ गया। कार उन्होंने कुछ ही दूरी पर खड़ी कर रखी थी। दोनों सतर्क थे- परन्तु किसी प्रकार का खतरा सामने नहीं आया। किसी की निगाह इस हादसे पर नहीं पड़ी थी, अगर पड़ी भी होगी तो उसने अनदेखा कर दिया था।

सामने ही चौराहा था। चौराहे के पास उनकी कार खड़ी थी। दोनों उस तरफ बढ़ रहे थे की एकाएक वातावरण में मौत की घड़ी की 'टिक...टिक' गूँज उठी। देवराज चौहान और जगमोहन की निगाहें आपस में मिलीं। सड़क पर चलते लोगों में एकाएक अफरा-तफरी फ़ैल गयी थी। आतंक से जड़े लोग सड़क छोड़कर एक तरफ हटने लगे थे।

सड़क पर जाते वाहन भी साइड में रुकने लगे थे।

देवराज चौहान और जगमोहन की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया।

तभी चौराहे पर जीप कार प्रकट हुई। मोड़ मुड़ते ही जीप के ब्रेक दबते चले गये। क्योंकि जीप के सामने देवराज चौहान और जगमोहन आ खड़े हुए थे। गुण्डागर्दी  डिपार्टमेंट की लाल सुर्ख जीप थी। एक स्टेयरिंग सीट पर था और अन्य चार खतरनाक चेहरे खुली जीप में खड़े थे। वह सब इन दोनों को घूरने लगे। 

"या तो यह दोनों शहर में नये हैं जो कि हमें नहीं जानते, या फिर पागल हैं और मौत ही इन्हें हमारे सामने खींच लाई है।" एक ने दरिंदगी भरे स्वर में कहा।

"मारकर इनकी लाशों पर से जीप निकाल ले चलो।" दूसरा गुर्राया।

इसके पहले कि कोई कुछ करता-

पलक झपकते ही देवराज चौहान के हाथों में रिवॉल्वर प्रकट हुई और 'पिट' की हल्की-सी आवाज के साथ जीप-ड्राईवर की खोपड़ी के चिथड़े उड़ गये। स्टार्ट जीप पर वह क्लच पर पाँव रखे थे कि गोली लगते ही जीप ने तीव्र झटका खाया और इंजन बंद हो गया।

किसी की समझ में कुछ नहीं आया। उसी पल देवराज चौहान ने दो बार एक साथ ट्रेगर दबाया। जीप में खड़े चार में से दो के शरीर को झटका लगा और वह उछलकर जीप से नीचे जा गिरे। चौथे ने फौरन रिवॉल्वर सीधी करके देवराज चौहान पर फायर किया। तभी जगमोहन उस पर फायर कर चुका था। गोली उसकी छाती में लगी। वह जीप में ही लुढ़क गया। देवराज चौहान अपने जगह छोड़ चुका था, इसलिए गोली उसे नहीं लगी।

यह सब कुछ इतनी जल्दी घटित हुआ कि पाँचवा स्तब्ध-सा हाथ में रिवॉल्वर थामे जीप में गधों की तरह खड़ा रह गया। वह समझ ही नहीं पाया कि क्या करे और क्या न करे। अंत में सिर्फ इतना ही समझा कि एक बेआवाज अंगारा उसकी छाती में जा धँसा। वह भी जीप में औंधे मुँह जा गिरा।

देवराज चौहान और जगमोहन ने गहरी साँस ली।

गुण्डागर्दी डिपार्टमेंट की जीप कार लावारिस खड़ी थी और पाँच लाशें उसमें पड़ी हुई थी।

यह नजारा पचासों ने देखा। सबके चेहरे पर हैरानी और खौफ था। 

देवराज चौहान और जगमोहन तेज-तेज क़दमों से आगे बढ़ गये। खाली चैम्बर उन्होंने पुनः भर लिए। चौराहा पार करके कार में बैठे और कार आगे बढ़ा दी।

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"यह खूनी सिलसिला रुकना इतना आसान नहीं है।" जगमोहन बोला। 

"जानता हूँ।" देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाकर कश लिया - "नीचे वालों की जानें लेने से कोई फायदा नहीं होने वाला। डिपार्टमेंट के ओहदेदारों को मारने से ही बात बनेगी।"

"यह भी तो मालूम नहीं कि इस खतरनाक डिपार्टमेंट को कौन चला रहा है।" जगमोहन ने गहरी साँस लेकर कहा - "मालूम हो जाए तो उसका कोई इंतजाम किया जाए।"

"देर-सवेर में यह बात तो हमें मालूम होकर ही रहेगी।" देवराज चौहान सख्त स्वर में कह उठा - "तब फैसला होगा।"

चंद पलों तक दोनों के बीच खामोशी छाई रही। 

"गुण्डागर्दी डिपार्टमेंट के लोगों में अब तक दहशत फ़ैल ही चुकी होगी।"

"हाँ, कुछ हद तक तुम्हारी बात सही है। इसके साथ ही हमारी जान को खतरा और भी बढ़ गया है। वह लोग हर हाल में हमें तलाश करके मार डालना चाहते होंगे?"

"हमारे कारण इन लोगों का धंधा चौपट हो रहा होगा?"

जवाब में देवराज चौहान ने सिर हिलाया।

"हमें हद से ज्यादा सावधान रहना होगा। गुण्डागर्दी डिपार्टमेंट का हर आदमी इस समय हमारे खून का प्यासा होगा। उन लोगों ने कई खतरनाक हत्यारों को अब तक मैदान में छोड़ दिया होगा कि हमें जल्द से जल्द खत्म करा जाए।"

"सही कह रहे हो।" जगमोहन बोला -"अब कहाँ चल रहे हो?"

"चौरंगी लेन पर हरे रंग की इमारत है। वहाँ पर शिवकुमार राना है। गुण्डागर्दी डिपार्टमेंट का ख़ास ओहदेदार। पिशोरीलाल के बाद उसका ही नम्बर आता है। अब उससे निपटेंगे।"देवराज चौहान के दाँत भिंच गये।

"अब तक तो इस राना ने अपनी सुरक्षा के लिए सारे प्रबंध कर लिए होंगे?"

"हमारे लिए यह मामूली बातें हैं। हमें हर हाल में अपना काम पूरा करना है।"

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किताब की समीक्षा निम्न लिंक पर जाकर पढ़ी जा सकती है:
गुण्डागर्दी

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रवि पॉकेट बुक्स

©विकास नैनवाल 'अंजान'

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