द स्कैंडल इन लखनऊ - गौरव कुमार निगम

संस्करण विवरण:
 फॉर्मेट: ई-बुक | पृष्ठ संख्या: 135 | ए एस आई एन: B08R95J51R 
किताब लिंक: किंडल

किताब समीक्षा: द स्कैंडल इन लखनऊ

पहला वाक्य:
इतना तो कोई अपनी जान के दुश्मनों से नहीं छुपता फिरता, जितना तुम अजीजों से बचते हो। 


कहानी:
विनय पल्लवी को भुला न सका था। ऐसे में  जब एक दोस्त की शादी में अचानक मिलने के बाद पल्लवी ने उसे अपनी शादी की सालगिरह में आने का न्यौता दिया तो वह इसे ठुकरा न सका। विनय बेमन से उधर गया, पार्टी में शामिल हुआ और फिर वापस अपने घर आ गया। वह सात सालों बाद पल्लवी के घर गया था और पार्टी से आने बाद उसने यह सोच लिया था कि वह आगे उधर नहीं जाने वाला था।

लेकिन उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस चौखट में भविष्य में न जाने का उसने फैसला कर लिया था अगले कुछ दिन उसे वहीं के चक्कर काटने पड़ेंगे।

पल्लवी का पति कुलदीप गायब हो चुका था। वह दिल्ली की एक मीटिंग के लिए निकला तो था लेकिन उधर पहुँचा नहीं था। वहीं पल्लवी के मोबाइल में जो कुलदीप ने आखिरी संदेश भेजा था उसने पल्लवी को डरा दिया था।

पुलिस आ चुकी थी और अब तहकीकात कर रही थी। और पुलिस के शक के दायरे में विनय भी था। विनय को पता था कि अगर उसे अपने आप को बचाना है तो इस गुत्थी को सुलझाने के लिए उसे भी हाथ पैर चलाने होंगे।

आखिर कुलदीप कहाँ गायब हो गया था?  उसके गायब होने के पीछे किसका हाथ था?
पुलिस विनय के ऊपर शक क्यों कर रही थी? 
क्या विनय मामले का पता लगा पाया?

 मुख्य किरदार:
 विनय निगम - कहानी का मुख्य किरदार 
पल्लवी माथुर - विनय की दोस्त 
 कुलदीप माथुर - पल्लवी का पति 
 वत्सल - पल्लवी का बेटा 
 ममता - विनय की बुआ 
नीतू भार्गव - विनय की सहकर्मचारी 
अनूप भटनागर - कुलदीप माथुर का मातहत 
चन्द्रेश मणि त्रिपाठी - पुलिस सब इंस्पेक्टर 
पारिजात शुक्ला - एक व्यक्ति जिसकी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थी 
नरेंद्र कोहली - दिल्ली का एक व्यापारी 

मेरे विचार:
'द  स्कैंडल इन लखनऊ' गौरव कुमार निगम द्वारा लिखी गयी एक रहस्यकथा है। इससे पहले भी मेरी जानकारी में गौरव की दो किताबें आ चुकी हैं जिसमें से एक ब्रांड मैनेजमेंट को लेकर लिखी गयी कथेतर ब्रांडसूत्र है और दूसरा एक कहानी संग्रह 'कहानियों के दस्तखत' था। 

'द स्कैंडल इन लखनऊ उनका लिखा पहला लघु-उपन्यास है। दस अध्यायों में विभाजित और १३४ पृष्ठों में फैले इस कथानक का घटनाक्रम लखनऊ में घटित होता है। गौरव भी लखनऊ में ही रहते हैं तो इस कारण उपन्यास का उधर बसाया जाना सही भी है।
 
कहानी की बात करूँ तो प्रथम पुरुष में लिखा गया यह कथानक विनय कुमार निगम नामक किरदार की जिंदगी के चंद ऐसे दिनों की दास्तान है जिसने कि उसकी जिंदगी का रुख पूरी तरह बदल दिया था। 

विनय की प्रेमिका पल्लवी अपने जीवन में आगे बढ़ गयी थी लेकिन विनय वहीं पर अटका हुआ था। वह पल्लवी के लिए कुछ भी कर सकता था। यहाँ तक कि उसके रकीब को क्या हुआ है इसका पता भी लगा सकता था। 

जब पल्लवी का पति अचानक से गायब हो जाता है तो विनय इस गुत्थी को सुलझाने का फैसला करता है। जहाँ एक तरफ पुलिस भी इस मामले में लगी हुई है वहीं विनय इस मामले की तह तक जाने के लिए क्या क्या करता है यह कहानी का हिस्सा बनता है। 

किताब का कथानक कसा हुआ है। विनय और पुलिस दोनों की तहकीकात किस तरह होती है यह देखना रोचक रहता है। पुलिस की कार्यशैली कैसी होती है यह भी इसमें दर्शाया गया है। अक्सर आम लोगों के पुलिस वालों को लेकर कुछ पूर्वाग्रह होते हैं। यह पूर्वाग्रह अपने या अपनों के अनुभवों से बने होते हैं लेकिन कई बार यह गलत भी होते हैं। पुलिस वाले भी कई तरह के दबावों के जूझ रहे होंते हैं जिनसे या तो आम लोग वाकिफ नहीं होते हैं या वो उसे नजरंदाज कर देते हैं। इस  बिंदु को भी लेखक ने एक संवाद के माध्यम से दर्शाने की कोशिश की है जो कि अच्छी बात है।

यह एक रहस्यकथा है और एक अच्छी रहस्यकथा वह होती है जिसमें लेखक अंत तक रहस्य बरकरार रख पाए। लेखक इस कथानक में यह कर पाते हैं।

हाँ, इस किताब की कहानी को लेकर मैं इधर यह जरूर कहना चाहूँगा कि यह कहानी पढ़ते हुए मुझे सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यास जीने की सजा की याद बार बार आ रही थी। दोनों कथानको में काफी साम्य नजर आता है।  लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक के प्रशंसक भी हैं तो यह होना कोई बड़ी बात नहीं है।

किताब के किरदारों की बात करूँ तो किरदार कम हैं लेकिन उन पर कार्य किया गया है। इन्वेस्टिगेटिंग अफसर चन्द्रेश मणि त्रिपाठी का किरदार मुझे बहुत पसंद आया। उसे गढ़ने में काफी मेहनत लेखक ने की है। कथानक के दौरान उसके हाव भाव का जिस तरह चित्रण लेखक ने किया है यह देखकर मेरे लिए यह जानना रोचक होगा कि वह किरदार पूर्ण रूप से काल्पनिक है या किसी पर आधारित है। चन्द्रेश मणि त्रिपाठी को लेकर अगर लेखक कुछ कहानियाँ लिखेंगे तो उन्हें मैं पढना चाहूँगा।

कथानक की कमी की बात करूँ तो चूँकि यह कम पृष्ठों में है तो जल्द ही खत्म हो गया लगता है। कहानी शुरुआत में थोड़ी उलझती लगती है लेकिन उस उलझन का ज्यादा देर बनाये नहीं रखा गया है। भटनागर और नरेंद्र कोहली जैसे किरदार जिनका इस्तेमाल कहानी में पेंच डालने के लिए किया गया था उसे और बेहतर तरीके से किया जा सकता था। 

कहानी चूँकि विनय सुना रहा है तो अगर पाठकों को विनय की जान ज्यादा साँसत में लगती दिखाई पडती तो शायद कथानक में रोमांच ज्यादा अधिक होता। अभी ऐसा नहीं है। उस पर शक तो जाता है लेकिन  वह उस तरह से फँसता हुआ नहीं लगता है।  

कहानी में आखिर का घुमाव अच्छा है लेकिन जो फैसला गुनाहगार करता है उसे पचाने में थोड़ी दिक्कत मुझे हुई।  अभी यह थोड़ा फ़िल्मी लगता है। ज्यादा कुछ कहना कहानी के क्लाइमेक्स को उजागर करना होगा तो इधर मैं बस इतना ही कहूँगा।

अंत में यही कहूँगा कि लेखक ने एक पठनीय रहस्यकथा लिखी है। एक बार पढ़ी जा सकती है। उनकी आगे आने वाली किताबों का इन्तजार रहेगा। 

 रेटिंग: 2.5/5

किताब लिंक: किंडल

© विकास नैनवाल 'अंजान'

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