Sunday, November 22, 2020

अनुपमा का प्रेम - शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

किताब 11 नवम्बर 2020 को पढ़ी गयी

फॉर्मेट: ई बुक | प्रकाशक: डेली हंट | सम्पादक: डॉक्टर राजेन्द्र टोकी | आईएसबीएन: 9788186304808

अनुपमा का प्रेम - शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय


अनुपमा का प्रेम शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय की कहानियों का संग्रह है। वैसे तो मेरे पास डेली हंट में प्रकाशित संस्करण मौजूद था लेकिन इसका मूल संस्करण भारत पुस्तक भण्डार द्वारा प्रकाशित किया गया था। इसका प्रथम संस्करण 2011 में प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह में शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय की तीन कहानियाँ मौजूद हैं। यह कहानियाँ निम्न हैं:

देवघर की स्मृतियाँ

पहला वाक्य:
डॉक्टरों के आदेशानुसार वायु परिवर्तन के लिए देवघर जाना पड़ा।

कथावाचक को जब वायुपरिवर्तन के लिए कहीं जाने को कहा गया तो वह देवघर चले गया। देवघर में उसे कौन मिला और उधर क्या हुआ यही इस रचना की विषय वस्तु है।

करुणा किस पर जागृत हो किस पर नहीं यह कहना मुश्किल होता है। यह मन की बात है जिस पर तर्क नहीं चलता है। वहीं कब किससे कैसा रिश्ता बन जाये यह भी नहीं कहा जा सकता है। यह रिश्ता कितना टिके यह भी नहीं कहा जा सकता है। देवघर की स्मृतियाँ इसी भावना के इर्द गिर्द बुनी गयी है। यह कहानी कम संस्मरण अधिक लगती है। 

मुझे पसंद आई।

अनुपमा का प्रेम 

पहला वाक्य:
ग्यारह वर्ष की उम्र से ही उपन्यासों को पढ़-पढ़कर अनुपमा ने अपना दिमाग खराब कर लिया था।

अनुपमा का प्रेम जैसे की शीर्षक से जाहिर होता है एक प्रेम कहानी है। अनुपमा को अपने पड़ोसी सुरेश मजूमदार से प्रेम हो जाता है। इस प्रेम का क्या नतीजा होता है यही इस कहानी में दर्शाया गया है। 

यह एक लम्बी कहानी है जो कि  छः अध्यायों - विरह, प्रेम का परिणाम, विवाह, वैधव्य, चन्द्रनाथ बाबू की गृहस्थी  और आखिरी दिन  नामक अध्यायों में बँटी  हुई है।

अक्सर जब हम युवा होते हैं तो लगता है एक विशेष व्यक्ति का प्रेम ही जीवन में सब कुछ है। हम उस प्रेम जो पाने की जुगत करते हैं। प्रेम के सिवा हमें कुछ दिखलाई नहीं देता। कुछ लोग इसमें सफल होते हैं और कुछ असफल। परन्तु आप असफल हों या सफल जीवन इस प्रेम के चारों और ही नहीं कटता है। सफल होने के पश्चात भी कई लोगों को वह सुख नही मिल पाता है जिसकी उन्हें अपेक्षा थी वहीं असफल होने के बाद भी कई लोगों को कोई ऐसा अन्य व्यक्ति मिल जाता है जिसके आने से उनका जीवन सुखमय हो जाता है। कई बार ऐसा भी होता है जिस व्यक्ति को हमने अपने प्रेम के लायक ही नहीं समझा था वही आखिर में हमें अपने प्रेम से सरोबर कर देता है और हम यही सोचते हैं कि हमने उस वक्त इसे क्यों इतने कष्ट दिए।

यह जीवन चक्र है और चलता रहता है।  अनुपमा का प्रेम अपने छः अध्यायों में इसी चक्र को दर्शाता है। कैसे एक अमीर घर की लड़की के जीवन में पहले प्रेम आता है, फिर दुःख आता है और फिर जब कहीं से कोई उम्मीद नहीं बचती तो प्रेम एक बार फिर सुख के साथ द्वार पर खड़ा दिखलाई पड़ता है। यही इस कहानी का सार है।

जहाँ कहानी का मुख्य केंद्र अनुपमा और उसका प्रेम है वहीं इस कहानी के माध्यम से लेखक ने उस वक्त के समाज की कई कुरीतियों और अन्धिविश्वास को भी दर्शाया है। कहानी में कई दफा जात जाने की बात कही जाती है। लड़की का बाप लड़की की शादी तय दिन पर न करा पाया तो उसकी जात चली जाएगी। फिर चाहे इसमें वधु पक्ष का कोई दोष हो या न हो। लड़का पढ़ने विदेश चले गया तो जात चली जाएगी। अब यह बातें तो नहीं होती हैं। इन्हें हमने वक्त के साथ तोड़ दिया है। मैं जब ऐसी कहानियाँ पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ कि कैसे इन लोगों ने जीवन उस वक्त अपना जीवन जिया होगा। कितने लोगों के जीवन इन अमानुष परम्पराओं के कारण बर्बाद हुए होंगे। 

यह कहानी आपको विचार करने पर मजबूर करती है कि अगर समाज में कोई परम्परा ऐसी है जिससे शोषण होता है तो उसका निर्वाहन करना कहाँ तक सही है। आज भी कई परम्पराएं ऐसी हैं जिनका तोड़ा जाना जरूरी है।

कहानी पठनीय है और आप इसे अंत तक पढ़ते चले जाते हो। यह कहानी आपको सोचने के लिए भी काफी कुछ दे जाती है।

नोट: मैंने कई ऑनलाइन साईट पर यह कहानी देखी है लेकिन उधर आधी अधूरी ही मौजूद है।

अंधकार में आलोक

पहला वाक्य:
बहुत दिनों की बात है।

सत्येन्द्र जब बी ए पास करके अपने गाँव आया तो उसकी माँ ने उससे शादी की बात की। सत्येन्द्र विवाह नहीं करना चाहता था तो वह कलकत्ते लौट आया और फिर उसे वह अजनबी युवती दिखी। और सत्येन्द्र उससे प्रेम कर बैठा।

वह अजनबी युवती कौन थी? इस प्रेम का क्या परिणाम हुआ?

अँधकार में आलोक एक प्रेम कहानी है। प्रेम कई दफा आपको बर्बाद करता है और कई दफा यह आपको उठा भी देता है। कई बार एक प्रेम में असफलता आपके जीवन में ऐसे प्रेमी को ले आती है जिसकी की असल में आपको जरूरत थी। इस कहानी के मुख्य पात्रों सत्येन्द्र, राधा-रानी और बिजली के जीवन में प्रेम आने से यही सब कुछ होता है। 

छः अध्यायों में विभाजित यह भी एक लम्बी कहानी है जो मुझे पसंद आई।

****

अंत में यही कहूँगा कि शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय का यह कहानी संग्रह मुझे तो पसंद आया। संग्रह में मौजूद तीनों ही कहानियाँ पठनीय हैं। इन कहानियों के केंद्र में प्रेम ही है और उसके अलग अलग स्वरूप आपको देखने को मिलते हैं। यह संग्रह एक बार पढ़ा जा सकता है।   

रेटिंग: 3/5


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शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

बांग्ला से हिन्दी में अनूदित उपन्यासों के प्रति मेरी राय:
बांग्ला से हिन्दी

© विकास नैनवाल 'अंजान'

2 comments:

  1. आपने बहुत अच्छी समीक्षा प्रस्तुत की है विकास जी । मैं शरतचंद्र का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ । इस पुस्तक की तीन कहानियों में से 'देवघर की स्मृतियाँ' को छोड़कर शेष दोनों कहानियाँ मैंने (बहुत पहले) पढ़ी थीं और दोनों ने ही मेरे हृदय को जीत लिया था । शुक्रिया आपका पुरानी यादों को ताज़ा करने के लिए ।

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    1. जी आभार। शरत बाबू को पढ़ना सुखद रहता है। लेख आपको पसंद आया यह जानकर अच्छा लगा।
      आभार।

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