आज का उद्धरण



"बादल घिर आए थे, सागर का पानी एक दीवानी खुशी से उछल रहा था, जैसे उसे भी मालूम हो कि बारिश आने वाली है। यह सोचना गलत है कि केवल मनुष्य को ही मालूम देता है, कुछ बातें सागर की भी सूझबूझ में हैं। कुछ बातें बादल भी जानते हैं, कुछ बातें हवा भी सूँघ लेती हैं। केवल लहरों पर तैरती झाग कुछ नहीं जानती, क्योंकि उसने केवल खुशी देखी हैं। कुछ जानने के लिए दुख उठाना आवश्यक है।"

- कृश्न चन्दर के उपन्यास 'एक करोड़ की बोतल' से

किताब निम्न लिंक पर जाकर खरीदी जा सकती है:
पेपरबैक


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4 Comments
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  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (07-10-2020) को   "जीवन है बस पाना-खोना "    (चर्चा अंक - 3847)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री

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    1. जी चर्चा में मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए दिल से आभार।

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  2. खूबसूरत पंक्तियाँ। ये किताब तो मैंने नहीं पढ़ी है, पर कृश्न चन्दर जी की एक बहुत ही दिलचस्प किताब बचपन में पढ़ी थी। मेरी पहली लम्बी किताब: सितारों से आगे।

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    1. जी आभार। कृश्न चन्दर जी कुछ किताबें मेरे पास हैं। यह नहीं है। मिलती है तो एक बार जरूर पढूँगा।

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