अंधी दुनिया - प्रतापनारायण टंडन

किताब 11 मई 2020 को पढ़ी गयी

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक | पृष्ठ संख्या: 108 | प्रकाशक: हिन्द पॉकेट बुक्स | आईएसबीएन: 9789353493691

अंधी दुनिया - प्रतापनारायण टंडन
अंधी दुनिया - प्रतापनारायण टंडन

पहला वाक्य:
वह संसार में आ गयी है।

कहानी:
रीति का जन्म हुआ तो पूरे परिवार में हर्षोल्लास का माहौल था। सभी घर में लक्ष्मी के आने से खुश थे। परन्तु कुछ ही वक्त में यह खुशी गम में बदल गयी।
रीति की आँखों में कुछ दिक्कत थी।  इस दिक्कत का पता जब तक परिवार वालों को लगता तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जिस रंग रूप और काया की पहले लोग तारीफ़ करते नहीं अघाते थे वह अब कोई मायने नहीं रखता था।
रीति अंधी थी और यही उसकी पहचान थी।
रीति को अपनी इसी पहचान को ढोना था।


मेरे विचार:
अंधी दुनिया प्रताप नारायण टंडन जी का उपन्यास है जो कि हिन्द पॉकेट बुक्स के द्वारा पहली बार 1970 में प्रकाशित हुआ था। यह किताब हिन्द पॉकेट्स बुक्स ने पुनः प्रकाशित की है।  इस बार जब नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले गया था तो इस किताब पर नजर पड़ी थी। किताब के कवर ने ही मुझे आकर्षित किया था। किताब उठाकर उसका बेककवर पढ़ा तो पीछे दर्ज उपन्यास के हिस्से ने भी आकर्षित किया और उस वक्त किताब ले ली। यहाँ ये बात कहने लायक है कि हिन्द पॉकेट बुक्स ने जो उपन्यास इस बार पुनः प्रकाशित किये हैं उनके आवरण चित्र बहुत आकर्षक बनाये हैं। यह ऐसे हैं कि अगर आप एक बार इनके बगल से गुजरो तो किताब को  उलट पलट कर देखने से खुद को रोक नहीं पाते हो। इस किताब के आवरण चित्र के लिए स्वाति चटर्जी जी बधाई की पात्र हैं।

उपन्यास की कहानी पर आऊँ तो उपन्यास की कहानी  रीति के  चारों और घूमती है।  रीति दिव्यांग है जो बचपन से ही देख नहीं सकती है। लेखक ने इस उपन्यास में रीति के मन के  भावों को उकेरा है। उपन्यास रीति के जीवन के शुरूआती वर्षों (लगबग चार छः वर्षों) का ही चित्रण करता है।

उपन्यास की शुरुआत रीति के जन्म से होती है। पैदा होने से बाद से ही वह अपने आस पास की दुनिया को किस तरह समझती है यह चीज लेखक ने इस उपन्यास में उकेरी है। जैसे जैसे वो बड़ी होती है उसका बाल मन को अपनी असमर्थता का अहसास होता जाता है। इस जानने की प्रक्रिया, इससे उपजी खीज, डर और परेशानी का विवरण पढ़ रीति के लिए आपका मन तड़प उठता है। उसकी कोशिशें और उन कोशिशों में होती हार आपके मन को कचोटने लगती है। आपके उसके दर्द को, उसकी बेबसी को महसूस कर पाते हो।

मैं अपनी बात करूँ तो यह खुद के अन्य बच्चों से अलग होने का अहसास या बच्चों द्वारा खुद को किसी चीज के लिए चिढ़ाया जाना ऐसे अनुभव हैं जिनसे मैं गुजर चुका हूँ।  बचपन में मेरा वजन बहुत ज्यादा हुआ करता था। इस कारण बच्चों के ताने सुनना, वजन के कारण आती परेशानियों को अनुभव करके यह सोचना कि मैं वह काम क्यों नहीं कर सकता जो ये करते हैं कुछ ऐसे भाव हैं जिन्हें मैं महसूस कर चुका हूँ। मुझे याद है क्योंकि मैं तेज नहीं भाग पाता था तो क्रिकेट खेलते हुए मेरे लिये रनर लगाया जाता था। टीम में भी चुनने में भी वरीयता नहीं दी जाती थी। मुझे मालूम है रीति की परेशानी के सामने यह कुछ भी नहीं है लेकिन मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि उसने जो भाव महसूस किये होंगे उनमें से एक दो मैंने भी किये हैं। इस कारण रीति के दर्द को काफी हद तक मैं समझ सकता था। लेकिन अगर मैंने यह भाव अनुभव नहीं भी किये होते तो भी प्रतापनारायण टंडन जी की लेखनी इतनी सशक्त है कि आप रीति के सभी मनोभावों को समझ सकते हैं। उन्होंने उनका बेहद जीवंत और मार्मिक चित्रण किया है। रीति के अलावा बाकि लोगों के उसके प्रति व्यवहार, उनके खुद के भावों  का भी बहुत अच्छा चित्रण लेखक ने किया है। रीति और उसके मम्मी पापा के बीच के कई दृश्य दिल को छू जाते हैं। मैं पढ़ते हुए यही सोच रहा था कि इस उपन्यास को लिखने की उनकी प्रेरणा कौन रहा होगा?

हाँ, उपन्यास की जो एक कमी है वह यह है कि यह आधे में खत्म हुआ सा लगता है। उपन्यास का अंत तब होता है जब रीती को आखिरकार अपनी परेशानी का पूर्ण अहसास होता है। वह इतनी बड़ी हो चुकी होती है कि वह अब समझ सकती है कि उसके साथ क्या दिक्कत है। और इस कारण वह एक तरह नैराश्य का अनुभव करने लगती है।

आपके समक्ष जब भी कोई बड़ी समस्या होती है, जिसे लेकर आपको पता है कि आप उसे ठीक तो नहीं कर सकते हैं, तो पहले पहल आप उससे परेशान हो उठते हैं। आपको सबसे पहले निराशा ही महसूस होती है। लेकिन फिर इस निराशा के बाद एक ऐसी अवस्था भी आती है जब आपको इस बात का अहसास हो जाता है कि इस परेशानी के आगे घुटने टेकने से कोई फायदा नहीं है। आपको आगे बढ़ना है और आप अगला अदम बढाते हो। परेशानी से जूझते हो। मैं यह जूझना रीति के मामले में भी देखना चाहता था। रीति उपन्यास के दौरान जो जिजीविषा दिखलाती है उससे यह तो पता लग गया था कि वह आसानी से हार नही  मानेगी लेकिन आखिरी का अध्याय जहाँ पर अंत होता है वहाँ सब कुछ अन्धकारमय सा दिखता है। मुझे नहीं पता लेखक ने यह कहानी कब और क्यों लिखी थी? हो सकता है उनका इरादा ही इस अन्धकार को ही दर्शाना रहा हो पर एक पाठक के नाते मैं  रीति के इस अन्धकार के बाद के जीवन के विषय में जानने के लिए ज्यादा इच्छुक था। मैं चाहता था लेखक इस कहानी को पूरा करे।


अंत में यही कहूँगा कि अंधी दुनिया रीति के मनोभावों को दर्शाने में पूरी तरह कामयाब हुआ है। उपन्यास मुझे पसंद आया। यह मन को छू जाता है। उपन्यास यह भी दर्शाने में कामयाब हुआ है कि भले ही रीति देख न पाती हो लेकिन उसके आस पास की दुनिया भी यह देखने में असमर्थ है कि रीति भले ही दृष्टि विहीन है लेकिन उसके पास दृष्टि के अलावा भी कई गुण है। उसके घर वाले भी उसके इन गुणों को बढ़ाने की कोशिश नहीं करते हैं। एक तरह से यह दुनिया भी उसके बाकि गुणों के प्रति अंधी हो जाती है।

हाँ, उपन्यास का जिस बिंदु पर अंत हुआ है वह एक अधूरेपन का अहसास पाठक के मन में जगाता है। मुझे यकीन है रीति के भविष्य में इस अँधेरे के अलावा भी बहुत कुछ रहा होगा। अच्छा होता लेखक रीति की कहानी को आधे रास्ते में न छोड़कर अंत तक ले जाते।

प्रतापनारायण टंडन जी का यब पहला उपन्यास था जो कि मैंने पढ़ा है। अगर आपने इनके दूसरे उपन्यास पढ़े हैं तो मुझसे उनके नाम साझा जरूर करियेगा। मैं उनके द्वारा लिखे गये दूसरे उपन्यास जरूर पढ़ना चाहूँगा।

रेटिंग: 3.5/5 

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? अपने विचारो से आप मुझे टिप्पणियों के माध्यम से अवगत करवा सकते हैं।

अगर आप यह किताब पढ़ना चाहते तो इस किताब को आप निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं:
पेपरबैक

© विकास नैनवाल 'अंजान'

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4 Comments
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  1. उपन्यास की कथानक बहुत अच्छा लगा और उतनी ही अच्छी इसकी समीक्षा । प्रयास रहेगा इस उपन्यास को पढ़ने का ।

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    1. जी आभार मैम। जरूर पढ़ियेगा। हिन्द पॉकेट बुक्स ने कई पुरानी किताबें इस बार पुनः प्रकाशित की हैं। कई ऐसी हैं जो काफी वक्त से आउट ऑफ़ प्रिंट चल रही थीं। किताब के प्रति आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी।

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