एक बुक जर्नल: एक किरदार से मुलाकात - 1

Tuesday, December 3, 2019

एक किरदार से मुलाकात - 1



यूँ तो अक्सर जो उपन्यास मैं पढ़ता हूँ उनके किरदारों में अपनी हल्की फुलकी झलक देख ही देता हूँ। उनकी कुछ परेशानियाँ मेरी भी होती हैं और कई बार जिस तरह से वो उन परेशानियों पर प्रतिक्रिया देते हैं उन्हें देख ऐसा लगता हैं जैसे वो वो नहीं मैं ही हूँ।

शायद किरदारों से यही जुड़ाव आपको साहित्यनुरागी बनाता है। इस प्रकार से अपने पढ़े हर उपन्यास में मैंने अपने मन के किसी न किसी टुकड़े को पाया है। उसके दर्शन किये हैं, उसे महसूसा। न केवल अपने मन को बल्कि कई बार अनेको के मन को। कई बार किसी व्यक्ति को समझ तभी पाया जब उसके जैसे किसी किरदार से रूबरू हुआ और फिर अमुक व्यक्ति को देखने का मेरा नज़रिया एकदम से बदल गया।

पर अगर किसी एक उपन्यास का जिक्र मुझे करना हो तो मैं इधर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी किताब सरस्वती पार्क का नाम लूँगा।

अक्सर किताबें पाठकों को खुद ही खींचती हैं। और पाठक अक्सर वही पढ़ता रहता है जिसमें उसकी रूचि हो लेकिन इसका एक नुक्सान यह होता है आप ऐसी काफी चीजों से महरूम रह जाते हैं जो कि आप पढ़ सकते थे लेकिन नहीं पढ़ पाए क्योंकि आपने उन्हें कभी देखा ही नहीं या देखा तो तवज्जो न दी। मेरे लिए सरस्वती पार्क भी ऐसा ही एक उपन्यास था। अगर मेरी सहकर्मचारी मुझे इस उपन्यास को उपहार स्वरूप नहीं देती तो शायद ही मैं इसे कभी पढ़ पाता और फिर शायद ही मोहन से मिल पाता।

मोहन कौन? तो साहब मोहन सरस्वती पार्क नाम इस  उपन्यास  का नायक है। मोहन चिट्ठी लिखने का काम करता था। अब 58 साल का हो चुका है और रिटायर होने के समान ही है। वह सरस्वती पार्क नामक जगह में रहता है। उसे काम करने की जरूरत नहीं है लेकिन फिर भी चूँकि उसे अपनी दिनचर्या पसंद है तो वह अक्सर अपनी काम करने की जगह पर पहुँच जाता है। उसके बच्चे विदेश में रहते हैं और अच्छे ओहदे पर हैं तो उसे किसी बात की चिंता नहीं होती है।

मोहन एक अंतर्मुखी स्वभाव का व्यक्ति है जिसके मन में लेखक बनने का ख्वाब था लेकिन वह इस ख्वाब को कभी पूरा न कर पाया। परिवार की जिम्मेदारियों से घिरा मोहन कभी खुद के लिए इतना वक्त ही नहीं दे पाया कि इस तरफ कुछ कार्य कर सके। उसे पैसे कमाने में कभी रूचि नहीं रही तो वह उसके पीछे भी कभी नहीं भागा। वहीं उसके अंतर्मुखी स्वभाव के कारण उसकी पत्नी के साथ उसके रिश्ते में वह नज़दीकी नहीं है जो कि होनी चाहिए थी। उसकी पत्नी को लगता था कि वह गृहस्थी से मुँह चुराता है।

ऐसे ही उसकी ज़िंदगी कट रही होती है कि उनके यहाँ उसका भतीजा आशीष रहने आता है। उसके आने से मोहन की ज़िंदगी में क्या बदलाव होते हैं? उसके अपनी पत्नी के साथ जो समीकरण है उसमें क्या बदलाव होते हैं? और उसके अपने उस अधूरे सपने का क्या होता है ? इन्ही सब प्रश्नों के उत्तर यह उपन्यास पाठक को देता है।

इस उपन्यास के कथानक को पढ़ते हुए मैंने महसूस किया कि मोहन और मुझ में बहुत समानताएं हैं। फिर चाहे वह अंतर्मुखी स्वभाव हो या जीवन और पैसे के प्रति नज़रिया सभी कुछ मेरे जैसे था। लेखन के प्रति विचार भी मेरे उससे मिलते जुलते थे। उसकी जो गलतियाँ थी वो शायद मैंने भी आगे जाकर करनी थी। शायद अभी भी करूँ। लेकिन काफी गलतियों से मैं सीखा था। मैंने यह सीखा था कि मुझे लेखन करने के लिए कोई अलग से वक्त नहीं देगा। मुझे उसके लिए वक्त निकालना पड़ेगा। मैंने यह भी सीखा था कई अगर मैं कभी शादी करूँगा तो अपनी पत्नी से अपने मन की बात मोहन से ज्यादा साझा करूँगा और उसे जब जरूरत होगी तो उसके पास खड़ा होऊँगा। यह तो वो चीजे हैं तो मेरे चेतन मन ने सीखी लेकिन मुझे यकीन है मोहन से मिलकर मेरे अवचेतन मन में भी काफी बदलाव हुए होंगे।

ऐसे किरदार से मैं पहली बार मिल रहा था जो मेरा भविष्य हो सकता था। यह मेरे लिए अलग सा अहसास था।

और मज़े की बात ये है यह सब मैं एक ऐसे उपन्यास को पढ़ते हुए पा रहा था जिस शैली के उपन्यास मुझे आकर्षित नहीं करते थे। मुझे तेज रफ्तार उपन्यास पसंद है वहीं इस उपन्यास का कथानक बहुत धीमा था। लेकिन वही इसकी खूबी भी है। इसका धीमा कथानक आपको किरदारों के साथ वक्त गुजारने के लिए काफी वक्त देता है। आपको सोचने के लिए काफी वक्त देता है।

मोहन से मेरी यह मुलाक़ात 2013 के नवंबर में हुई थी और देखिये आज छः साल बाद भी मैं उसके विषय में लिख रहा हूँ। इस लेख को लिखते हुए मोहन से दोबारा मिलने का मन करने लगा है। या शायद खुद से।

उपन्यास के विषय में मेरे विचार आप मेरे विस्तृत विचार आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
सरस्वती पार्क

क्या आप भी किसी ऐसे किरदार से वाकिफ हैं जिससे मिलकर आपको लगा हो कि यार ये तो मैं ही हूँ?

और उस किरदार से मिलकर आपने क्या सीखा? 

क्या आपने अपने विषय में कुछ नया जाना? क्या अपने विषय में जो मुगालते आपको थे वो दूर हुए? 

मुझे टिप्पणी के माध्यम से जरूर बताइयेगा।

नोट: मूलतः मैंने यह लेख एक उत्तर के रूप में हिन्दी क्वोरा के लिए लिखा था लेकिन इससे एक नया विचार जन्मा कि मैं अक्सर आप लोगों को किताबों से मिलवाता हूँ तो क्यों न अब अपने पसंदीदा किरदारों से भी आपकी मुलाकात करवाई जाये।

उम्मीद है यह कोशिश आपको पसंद आएगी।

कोरा में लिखा जवाब आप इधर जाकर पढ़ सकते हैं:


कोरा

अगर आप कोरा में मौजूद हैं तो मुझे फॉलो भी कर सकते हैं ताकि मेरे दूसरे जवाब भी आप पढ़ सकें। 

© विकास नैनवाल 'अंजान'

4 comments:

  1. बहुत बार ऐसा होता है कि कहानी या उपन्यास पढ़ते या फिल्म देखते हुए हम किरदार से जुड़ाव महसूस करते है । गद्य लेखन में आपके अभिनव प्रयोग सराहनीय है ।

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    1. जी, इधर उधर से प्रेरणा मिल जाती है। आपका उत्साहवर्धन इन प्रयोगों को करने की प्रेरणा देता है। आभार।

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