कुछ कहानियाँ-4



पहले मैं ऐसा ही कुछ हफ्ते की कहानियाँ नाम से भी करता था। इस में दिक्कत यह थी कि किसी किसी  हफ्ते  मैं केवल एक ही कहानी पढ़ पाता हूँ तो उसे पोस्ट करने का मुझे कोई तुक नहीं दिखता है। फिर हफ्ते की कहानियाँ में मैं पत्रिकाओं में मौजूद कहानियों के विषय में भी लिखता था। ऐसे में उन कहानियों को केवल वही लोग पढ़ सकते थे जिनके पास वो पत्रिका थी।

परन्तु 'कुछ कहानियाँ' में मैं अंतर्जाल में मौजूद कहानियाँ या एप्प में मौजूद कहानियों को शामिल करूँगा।  इससे फायदा यह होगा कि कहानी के विषय में पढ़कर आप चाहे तो उसे उनकी साइट पर जाकर भी पढ़ सकेंगे।

आशा है मेरा यह प्रयास आपको पसंद आएगा।


1. मूर्खिस्तान--मूर्खों का स्वर्ग  -  मोहम्मद अरशद खान 

पहला वाक्य:
एक बार मशहूर लेखक मूरखमल ‘अज्ञानी’ ने एक किताब लिखने की सोची, जिसमें दुनिया भर के मूर्खों के क़िस्से हों।

जब मशहूर लेखक मूरखमल ने मूर्खों के किस्से इकट्ठे करके उन्हें पुस्तकार रूप में छपवाने की सोची तो उसके दादा जड़बुद्धि काफी खुश हुए।

उन्होंने मूरखमल  की सोच की सराहना की और उसे यह सलाह दी कि वो मूर्खिस्तान जाये क्योंकि मूर्खिस्तान में काफी मूर्ख थे और इसलिए मूरखमल को उधर मूर्खों के काफी रोचक किस्से देखने को मिल जायेंगे और किताब जल्द से जल्द पूरी हो जायेगी।

और इस तरह मूरखमल पहुँच गये मूर्खिस्तान।

क्या उन्हें अपनी किताब के लिए सामग्री मिली? उन्हें मूर्खिस्तान पहुँच कर कैसे कैसे अनुभव हुए?

ये सब तो आप इस हास्य बाल कहानियों को पढ़ कर ही जान पाएंगे। 

अरशद खान  जी के ब्लॉग मेरी बाल कहानियाँ पर एक अन्य ब्लॉग ब्लॉग बुलेटिन के माध्यम से पहुँचा। उधर जाकर यह रोचक हास्य बाल कहानी पढ़ी। एक रोचक कल्पना लेखक ने की है जो कि अंत तक गुदगुदाती रहती है। एक बार पढ़ना शुरू किया तो पढ़ता ही चला गया। कहानी मुझे पसंद आई।

रेटिंग: 3/5
कहानी का लिंक: मूर्खिस्तान : मूर्खों का स्वर्ग


2. आवारा कुत्ते - सुमन सारस्वत
पहला वाक्य:
रेवती ने जबरदस्ती आँखें खोली।

रेवती अपनी दोस्त रेशमा के लिए अस्पताल में मौजूद थी। रात भर की जगी वह अस्पताल के बाहर चाय की चुस्कियाँ लेने गयी थी जबकि उसने वह दृश्य देखा। वह ऐसा दृश्य था जिसे देखकर उसका मन खराब सा हो गया और वह वापस अस्पताल न जा सकी।
आखिर रेवती ने उधर ऐसा क्या देख लिया था? वो क्यों वापस अस्पताल न जा सकी? 


कई बार हमारे समाज में ऐसी ऐसी घटनाएं हो जाती हैं जो यह सोचने को मजबूर कर देते हैं कि हम एक समाज के तौर पर कहाँ जा रहे हैं। कैसे कैसे लोग इनसान का शरीर लेकर घूम रहे हैं। ये लोग किसी आवारा पशु से बदत्तर हैं। ऐसी ही एक घटना को यह कहानी दर्शाती है।

इसके अलावा यह कहानी एक और बिंदु को उठाती है। कई बार हम दूसरों के कदम उठाने का इन्तजार करते रह जाते हैं और कोई कुछ नहीं करता है। परन्तु अगर हम खुद कदम उठाएं तो काफी सम्भव रहता है कि दूसरे लोग  मदद के लिए खुद ब खुद आ जाते है।बस जरूरत होती है तो किसी ऐसे व्यक्ति की जो पहल करे।

 इस चीज को भी रेवती के माध्यम से  सुमन जी ने बखूबी दर्शाया है। एक पठनीय और मर्मस्पर्शी कहानी जिसे पढ़ा जाना चाहिए।

कहानी में एक ही बात थी जो मुझे थोड़ी सी अटपटी लगी। रेशमा रेवती की दोस्त थी जिसके लिए रेवती अस्पताल गयी थी।सारी रात वो उधर रुकी थी। कहानी खत्म हुई तो मेरे में ख्याल आया कि रेवती उधर अकेली क्यों थी? रेशमा का परिवार किधर था? कहानी में उसका जिक्र नही है। यह थोड़ा अटपटा लगा। परिवार के न होने का कारण भी दिया होता तो बेहतर होता।
रेटिंग: 4/5
लिंक : आवारा कुत्ते 



3. चाभी - निवेदिता श्रीवास्तव 

पहला वाक्य:
आंटी के पास बैठी मैं उनको देखते ही रह गई।

आंटी को देखकर कथा वाचिका हैरान थीं। जिस बेतकल्लुफी से वो सभी से बातें करती थी यह कथावाचिका को अचरज में डाल रहा था। हैरत की बात यह भी थी कोई भी आंटी की बात का बुरा नहीं मान रहा था। ऐसा क्यों था?

अक्सर हमे अपने जीवन में ऐसे लोग चाहिए होते हैं जिनसे हम बिना झिझके अपनी दिल की बात कह सके और हल्का महसूस कर सकें। पहले परिवार का कोई सदस्य ऐसा होता था जिससे हम कुछ भी साझा कर पाते थे लेकिन अब छोटे परिवार में ऐसा मुमकिन नहीं हो पाता है। विदेशों में  थेरापिस्ट यह काम करते हैं। भारत में गुरु भी यही काम करते हैं। चाभी इसी चीज को दर्शाती है। सुन्दर लघु-कथा।


रेटिंग: 3.5/5
लिंक: चाभी

4. ढाबा 
पहला वाक्य:
वो इस मैदानी शहर की सर्द रात थी।

वह बहुत दिनों बाद  शहर आया था। लगभग बीस वर्ष पहले वो इधर मौजूद कोलोनी में रहता था परन्तु अब तो उधर सब कुछ बदल गया था। बस बचा था तो वो भोजनालय। तभी वह उस ढाबे के अंदर गया था। वह जानना चाहता था कि कैसे वह ढाबा इस बदलाव की आंधी को झेल गया था।

संजय व्यास जी की यह लघु-कथा लगता है जैसे मेरी ही कहानी है। काम के सिलसिले में हम लोग अपने अपने शहरों से काफी दूर निकल आयें हैं और जब कई वर्षों बाद कुछ दिनों के अपने घर जाना होता है तो उधर दिख रहे बदलाव को देखकर हैरानी होती है। यह बदलाव हमारे लिए सहूलियतें तो लाते हैं लेकिन इनके चक्कर में कई अच्छी चीजें भी पीछे छूट जाती हैं। इसी छूटने को बेहद खूबसूरती से संजय जी ने इस लघु कथा के माध्यम से दर्शाया है।



रेटिंग : 3.5/5
लिंक: ढाबा


5. मुर्दे की आवाज़ - ज़ीशान हैदर ज़ैदी 

पहला वाक्य:
एक पूरी तरह सुनसान सड़क थी यह।

मजीद उस दिन रात को एक कब्र खोदने गया था। उसने कब्र खोदी और उधर मौजूद कंकाल से एक हड्डी अलग निकाल कर अपने पास रख दी।  फिर उसने कंकाल को वैसे ही कब्र में दफन कर दिया और वापस लौट आया।
मजीद को जो चाहिए था वह मिल चुका था।
आखिर मजीद किसकी हड्डी निकाल कर ले जा रहा था? उसे हड्डी की जरूरत क्यों पड़ी थी?
इस हरकत के पीछे उसका मकसद क्या था?

जीशान हैदर जैदी साहब यह कहानी विज्ञान कथा तो है ही लेकिन इसके भी ऊपर वह आदमी के स्वभाव को दर्शाती है। विज्ञान कितना भी उन्नत हो जाये वो उसके अंदर मौजूद लालच,द्वेष,घृणा को नहीं धो सकता है। यह चीजें पुरातन काल से ही इनसान के अन्दर रही है और आगे भी रहेंगी। यही कारण है कि जीशान जी की यह कहानी भले ही भविष्य में उन्नत तकनीकों के बीच में बुनी है लेकिन ऐसी कहानियाँ आपने कई बार सुनी होंगी। कहानी में ट्विस्ट तो है लेकिन आपको अंदाजा हो जाता है कि ट्विस्ट क्या होगा जिससे कहानी का असर थोड़ा कम हो जाता है।

कहानी एक बार पढ़ी जा सकती है। इसे और बेहतर तरीके से लिखा जा सकता था।

रेटिंग: 2.5/5
लिंक : मुर्दे की आवाज़

6. चाचा छग्गन ने तस्वीर टाँगी - इम्तियाज अली
पहला वाक्य :
चचा छक्कन कभी-कभार कोई काम अपने जिम्मे क्या ले लेते हैं, घर भर को तिगनी का नाच नचा देते हैं। 

घर में एक कोने में पड़ी तस्वीर को देखकर जब चची ने तस्वीर के टांगने के बात छेड़ी तो चचा छग्गन ने उस तस्वीर को टांगने का जिम्मा अपने ऊपर लिया।

अब इसके आगे क्या हुआ, यही इस छोटी सी हास्य कथा में पाठक पढता है। 

अक्सर जब भी घर में कोई काम करना होता है तो कई बार काम तो होता नहीं है लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी हो जाती हैं कि उन पर हँसने के सिवा और कुछ नहीं किया जा सकता है। ऐसा ही परिस्थितियाँ इस कहानी में उत्पन्न होती हैं जो भरपूर हास्य पैदा करती हैं।

एक मनोरंजक कहानी। हास्यकथा के शौक़ीन हैं तो आपको भी यह कहानी पसंद आएगी।
रेटिंग: 3/5
लिंक: चाचा छग्गन ने तस्वीर टाँगी

7. मीनामाटा - हरीश गोयल

पहला वाक्य:
वह कोमा में पड़ी हुई थी।

उसकी बीवी कोमा में थी। वह पहले ही अपने एक लौते बेटे को खो चुका था। वह डॉक्टर था लेकिन वो अपने बेटे को बचाने में नाकामयाब हो गया था।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा था?

मीनामाटा प्रदूषण का विकृत रूप दर्शाती एक रोचक कहानी है। सच में अगर हमने प्रदूषण पर काबू नहीं पाया तो यह पूरी मनुष्य जाति को लील लेगी। इस चीज को यह कहानी दर्शाती है। विचारोतेज्जक कहानी।


रेटिंग: 3/5 
लिंक:मीनामाटा


8. जीतू बगडवाल - पंकज चौहान

पहला वाक्य:
वही जीतू , जिसे आज भी पांडवों के समकक्ष पूजा जाता है गढ़वाल में, कुलदेवता के रूप में। 

जीतू बगडवाल का नाम उत्तराखंड की लोककथाओं में बड़े आदर के साथ लिया जाता है। ऐसा क्यों है? यह आपको इस कहानी को पढ़कर पता चलेगा।

मैं इस लोककथा से परिचित नहीं था। तो लेखक का शुक्रिया जो उन्होंने इतनी खूबसूरती से अपना परिचय करवाया। कहानी जितनी खूबसूरत है उसका प्रस्तुतिकरण भी उतना ही खूबसूरत है। कई बार लगता है जैसे आप कोई कविता पढ़ रहे हो।  अगर नहीं पढ़ा है तो एक बार पढ़िये।


रेटिंग: 4.5/5
लिंक: जीतू बगडवाल

9. शक की चिंगारी - संतोष पाठक 

पहला वाक्य:
जिसने भी सुना हैरान रह गया। 

नेमान, तारिक और खावर जमाल तीनो बचपन के दोस्त थे। लेकिन फिर वक्त के साथ नेमान और तारिक के रिश्तों में दरार पड़ चुकी थी। नेमान ने तारिक के कुछ पैसे देने थे जो  कि वह दे नहीं पाया था और इस कारण दोनों के बीच बात जान लेने की धमकी तक पहुँच गयी थी। 

और अब तारिक के ऊपर नेमान को मार देना का इल्जाम था। तारिक का कहना था कि नेमान उसकी गाड़ी से टकराया जरूर था लेकिन वह केवल दुर्घटना थी। खावर की पत्नी साइमा, जो कि तारिक की ममेरी बहन थी, को भी लगता था कि तारिक ने यह कत्ल नहीं किया था। वह उसका मुकदद्मा लड़ तो रही थी लेकिन केस कितना कमजोर था यह जानती थी।

क्या सच में नेमान की मौत एक दुर्घटना थी? या तारिक ने उसका कत्ल किया था?

शक का दीमक जब रिश्ते को लग जाता है तो वह उस रिश्ते को खत्म करके ही छोड़ता है। यह कहानी भी इसी विचार के इर्द गिर्द लिखी गयी है। कहानी को हम खावर के दृष्टिकोण से देखते हैं। खावर पुलिस में अफसर है। उसके दोस्त तारिक पर उनके ही एक और दोस्त की हत्या का इल्जाम लग जाता है। इस मामले के चलते उसके और उसकी पत्नी के रिश्ते में क्या बदलाव आते हैं यह हम कहानी पढ़ते हुए देखते हैं।

शक के मामले में अक्सर देखा जाता है कि शक करने वाले अपनी बात अपने साथी के ऊपर जाहिर नहीं करते हैं और अंदर ही अंदर कुढ़ते रहते हैं। इस कारण उनके रिश्ते धीरे धीरे कमजोर होते जाते हैं। कई बार यह शक बेबुनियाद भी होता है और शक करने वाले को जब इसका अहसास होता है तब तक काफी देर हो चुकी होती है। इस कहानी में क्या होता है यह तो आप इस कहानी को पढ़कर जान पाएंगे।

कहानी  शुरू से लेकर अंत तक पठनीय है। संतोष जी ने भाषा में उर्दू का अनुपात ज्यादा रखा है। शायद यह इसलिए भी है क्योंकि पात्र मुस्लिम हैं परंतु फिर भी उन्होंने इस बात का ध्यान रखा है कि एक दो कठिन शब्दों का अर्थ दे दिया है ताकि पाठक को परेशानी न हो।

किरदार यथार्थ के निकट लगते हैं। किस तरह शादी में मुख्य किरदार मिलते हैं और उनके बीच रिश्ता पनपता है उसका चित्रण भी बखूबी किया है। हाँ, साइमा जैसे किरदार इतनी आसानी से शादी के मान गयी यह देखकर हैरानी जरूर होती है लेकिन फिर कई बार ऐसी चीजें घट जाती हैं।

मुझे कहानी पसंद आयी। उनकी साइट पर और भी कई कहानियाँ हैं जो आप पढ़ सकते हैं।  

रेटिंग :3/5
लिंक: शक की चिंगारी

तो ये थी इस बार की कहानियाँ। कहानियाँ आपको कैसी लगी यह उनके लेखकों को टिप्पणियों के माध्यमस से जरूर बताइयेगा।

© विकास नैनवाल 'अंजान'

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