दुष्कर - महाश्वेता देवी

उपन्यास नवम्बर 16,2018 से नवम्बर 25,2018 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 120
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
अनुवाद : सुशील गुप्ता
मूल भाषा : बांग्ला



दुष्कर - महाश्वेता देवी
दुष्कर - महाश्वेता देवी


पहला वाक्य:
'बनारस से चली हुई ट्रेन, आखिरकार पहुँच ही गई।'

आज पूवाली वापस इस शहर में आ गई थी। यहाँ इस शहर में उसका कोई नहीं था पर फिर भी बनारस में अपने मंझले जीजा के यहाँ से कोलकत्ता वापस जाते हुए वो पिछले दो सालों से इधर रुका करती थी। पर आज का रुकना उन सबसे अलग था। आज वह रुकेगी और फिर रुकने के बाद जब कलकत्ता के लिए निकलेगी तो कभी लौटकर इस शहर में नहीं आएगी।

उसने यह फैसला कर लिया था। वह अपने इस फैसले से दुखी थी। लेकिन यही उसके और सत्येश के लिए ठीक था। दोनों ने मिलकर इस दुष्कर निर्णय को लिया था।

आखिर कौन थी पूवाली? क्यों वो इस अनजान शहर में आती थी? सत्येश कौन था?

इन सब प्रश्नों के उत्तर आपको इस उपन्यास को पढ़कर ही मिलेंगे।


मुख्य किरदार:
पूवाली - एक सत्ताईस अट्ठाईस साल की युवती
सत्येश सेन  - एक बैंक क्लर्क
बजू - शांति बाबू के होटल में रहने वाला लड़का
मीरा - सत्येश की पत्नी
मोहन अरोड़ा - सत्येश का जानकर
सुशील - एक लड़का जो पूवाली को प्यार करता था
आभा और रेवा - सुशील की बहन
मनीषा - पूवाली की बुआ
रवि,कल्पिता - सुशील के दोस्त
रजत दत्त - पूवाली के साथ काम करने वाला लड़का

दुष्कर पूवाली और सत्येश के अधूरे प्रेम की कहानी है। पूवाली और सत्येश अकस्मात ही मिले थे और फिर जान पहचान ऐसे बढ़ी की यह प्यार में तब्दील हो गया। जहाँ सत्येश शादीशुदा था वहीं पूवाली के जीवन में भी सुशील नाम का लड़का था। परन्तु दोनों के हालात ऐसे थे कि दोनों नज़दीक आ गये।

यह नजदीकी रूहानी तौर पर ज्यादा थी। उन्हें पता था कि जिस्मानी तौर पर वह कभी पास नहीं आ पायेंगे। कुछ पल उन्होंने साथ जरूर बिताये थे परन्तु यही पल उनके प्रेम की धरोहर रहेंगे।

पूवाली और सत्येश किस शहर मिलते हैं यह बात पूरे उपन्यास में कहीं बताई नहीं जाती है। बस यह बताया जाता है  कि यह शहर बडंगी के अस्पताल के निकट है। पूरा उपन्यास एक रात की कहानी  है।  शहर के बाहर दंगा हुआ है और ऐसे ही उथल पुथल की स्थिति दोनों किरदारों के भीतर है। दोनों किरदार एक ही कमरे में बंद हैं और एक दूसरे को अपने विषय में वो सब बताना चाहते हैं जो इन दो सालों में नहीं बता पाये।

पाठक पूवाली और सत्येश की बात चीत से उनकी ज़िन्दगी के विषय में जानता है। आखिर क्यों वो दोनों इधर आते हैं? आखिर क्यों वो एक दूसरे के नजदीक आये और आखिर क्यों वो अब एक दूसरे से अलग हो रहे हैं? इन्ही सब प्रश्नों का उत्तर उसे मिलता है।

कई बार ख्वाहिशों के बीच में ज़िन्दगी आ जाती है। हमे पता होता है कि भले ही यह ख्वाहिश हम पूरी कर लें लेकिन इसके परिणाम बुरे होंगे और इसलिए हम ऐसी ख्वाहिशों को जब्त कर लेते हैं। ऐसी ही ख्वाहिशों की कहानी यह उपन्यास है।

उपन्यास का अनुवाद अच्छा है। उपन्यास पठनीय है और दोनों किरदारों की मनोस्थिति को लेखिका ने बहुत खूबसूरती से उकेरा है। उपन्यास चूँकि एक रात की कहानी है तो कई चीजें पाठको को टुकड़ों में पता चलती है। मैं व्यक्तिगत रूप से दोनों के रिश्ते के विषय में विस्तार से जानना चाहता था। इससे मुझे थोड़ा अधूरेपन का एहसास हुआ। उनके रिश्ते के ऊपर तीस चालीस पृष्ठ और खर्च किये होते तो भी मुझे कोई दिक्कत नहीं होती।

जहाँ उपन्यास में सत्येश, पूवाली जैसे सीधे किरदार भी हैं वहीं सुशील जैसा धूर्त किरदार भी है। उसके दोस्त भी ऐसे ही हैं जो बस दिखावा करना जानते हैं और अपना उल्लू सीधा करना जानते हैं। मुझे व्यक्तिगत तौर पर ऐसे लोगों से कोफ़्त होती है लेकिन ऐसे लोग गाहे बगाहे टकरा ही जाते हैं। ऐसे कई धूर्त किरदारों को मैंने पूवाली जैसी लड़कियों  को साथ देखा है। उस वक्त मैं कई बार सोचता था कि आखिर यह लड़की क्यों ऐसे व्यक्ति के साथ है। सत्येश भी उससे यह जानना चाहता है और कुछ हद तक इस बात का जवाब देती है।

जीवन में पति पत्नी के रिश्ते कई लोगों के लिए सुविधा के रिश्ते हो गये हैं। यह भी उपन्यास में दिखता है। उपन्यास में सत्येश के माध्यम से कई लोग ऐसे मिलते हैं जो अपनी बीवियों को इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि वो या तो बीमार हो जाती हैं या बच्चे नहीं दे पाती है। ऐसे किस्से हमारे अस पास ही होते रहते हैं। अक्सर इन लोगों के पास इस चीज के लिए तर्क भी रहता है और ये ग्लानि भी महसूस नहीं करते हैं। शायद शादी का अर्थ ही इनके लिए सुख में साथ दुःख में बाय बाय होता होगा।

उपन्यास में पूवाली जी की बुआ मनीषा जी हैं। मुझे उनका किरदार विशेष रूप से पंसद आया। वह एक स्वालम्बी महिला हैं, जो नौकरी करती हैं, जिन्होंने शादी नहीं की और भाई के बच्चों का लालन पालन किया। ऐसी एक महिला हमारे परिवार में भी हैं। अगर आज की भाषा में बोलूँ तो मुझे मनीषा जी बहुत कूल लगीं और उनके विषय में पढ़कर अपने परिवार की उन महिला का ख्याल आ गया। मनीषा जी के अन्दर एक तरह का झक्कीपन सा है जो उनके किरदार को और आकर्षण देता है। मैं उनके विषय में और ज्यादा पढ़ना चाहता था।

उपन्यास में मुझे कमी तो कहीं नहीं लगी लेकिन उपन्यास में वर्तनी की काफी गलतियाँ हैं। कई जगह शब्द गलत लिखे हैं, कई जगह बीच के शब्द गायब हैं  जो कि पढ़ने के अनुभव खराब करते हैं।

यह जुमला सुनते ही पूवाली को लगा, कि उसने कनखजूरों कै बिल में पैर डाल छिया है।
'सुनो, बस, तुम सुनते रहो-' पूवाली ने गुनगुनाह के लहजे से आहिस्ते से कहा 
(पृष्ठ 85)

उसने मैंने कहा, मां को लेकर बस्ती में पड़ा हूँ। (पृष्ठ 92 )

बस पूवाली को बार-बार यह अहसास होता रहा है कि यहाँ से कहीं दूर चली जाए। कहीं दूर जाकर शायद उसका मन थिर हो। (पृष्ठ 100 )

उनकी जफबान से यह आश्वासन पाकर, सुशील ने अब उन्हीं से पूरी उम्मीद बाँध दी थी। 
(पृष्ठ 104)

हम उसे गपशप में उझाकर, उसे किसी तरह जिंदा रखे हुए हैं। 
(पृष्ठ 113 )

इसके आलावा चन्द्र बिंदु की जगह खाली बिंदु लगे हैं - माँ मां बन गया है, हँस हंस बन गया है। ऐसी त्रुटियों से बचना चाहिए था। वाणी एक नामचीन प्रकाशन है। उससे ऐसी कोताही की उम्मीद तो नहीं थी। पर हुई है। महाश्वेता देवी जी जानी मानी साहित्यकार रही हैं। उनके साथ ऐसा हो रहा है तो बाकियों का न जाने क्या हाल होगा।

खैर, यह प्रकाशक की गलती है कि ऐसी प्रतियाँ उन्होंने मार्किट में रखी हैं और पाठको  को बेच भी रहे हैं।

अंत में यही कहूँगा यह मुझे यह उपन्यास पसंद आया। मनुष्यों के मनोभावों को टटोलते कथानक  पढ़ने मुझे पसंद है। दुष्कर एक ऐसा ही उपन्यास है जो इस काम को बखूबी करता है। यह एक अधूरे प्रेम की पूरी कहानी है। पाठक के तौर पर आप सोचते हो कि उन्होंने सही किया या नहीं। मेरे पास सच में कोई जवाब नहीं था। मैं दिल से चाहता था कि दोनों साथ में रहे लेकिन फिर उनके तर्क ऐसे थी कि पता था कि जो वो निर्णय वो ले रहे हैं वो दुष्कर तो है परन्तु सही है। दोनों के लिए सही है।

उपन्यास के कुछ अंश जो मुझे पसंद आये:

अच्छा, दर्द और प्यार क्या एक ही जैसा होता है या अलग-अलग?

किसी-किसी के जीवन में एक ही जैसा होता है, किसी-किसी के जीवन में यह अलग-अलग होता है।  ऐसे भी तो कितने-कितने लोग हैं, जिनकी ज़िन्दगी में दुःख आता है,चला जाता है। उसके बाद ज़िन्दगी में प्यार दाखिल होता है, जो तमाम दुःख और मन की पीर धो-पोंछ देता है। लेकिन पूवाली की ज़िन्दगी में जो सबसे बड़ा सुख है, वही सबसे बड़े दुःख का कारण बना रहा। (पृष्ठ 6)

जैसे बाघ को बीच-बीच में शिकार चाहिए, उसी तरह बजू जैसे लड़कों को बीच-बीच में एकाध 'ह-हल्ला चाहिए'। जाहिर है कि हर जगह माहौल ऐसा बन चुका है, मानो चौपट बेटे को, उसकी मूर्खा माँ, और चौपट करने के लिए,उसके हाथों में पैसे ठूँस दे और अपने ही सर्वनाश की राह साफ़ करे, ये तमाम शहर भी उसी तरह बजू जैसे लड़कों के लिए 'हो-हल्ला' जुटाता रहता है। 

होटल के शान्ति बाबू अक्सर कहा करते हैं, 'इनसान जैसे डगमग पाँवों से चलते हुए, कदम-कदम चलना सीखता है, हम भी उसी तरह ताबड़तोड़ 'हल्ला' बनाना सीख गए हैं।'  (पृष्ठ 11)

सत्येश  को जितना दुःख होता है, वह इतना ही हँस देता है। उसे काफी कुछ बर्दाश्त करना पड़ा है,शायद इसलिए वह ईषत् हँसकर बातें करना,नहीं भूलता। (पृष्ठ 17)

मनीषा ईषत् हँसकर खामोश हो गई। उनकी बुद्धि अतिशय धारधार थी। वे समझ चुकी थीं कि पूवाली अब धीरे-धीरे सुशील की सिखाई-पढ़ाई रट्ट तोता बनी जा रही थी। बिलकुल ही कोई व्यक्तित्व न हो या पति परमेश्वर जो-जो कहेगा, उसे ही मानकर, मुमकिन है, और एक किस्म का सुख महसूस करे।
गुलामी का सुख! दासीत्व का सुख! बिलकुल अहंकार मुक्त होकर, किसी और की इच्छा में अपनी इच्छा को मिला देने का सुख! मनीषा की माँ कहा करती थीं, इसमें भी बड़ा सुख होता है। 
(पृष्ठ 95)

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको यह कैसी लगी? अपने विचारों से आप मुझे कमेंट्स के माध्यम से भी अवगत करवा सकते हैं।

मेरी रेटिंग: 4/5


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दुष्कर - पेपरबैक

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महाश्वेता देवी 
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बांग्ला से हिन्दी

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© विकास नैनवाल 'अंजान'

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2 Comments
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  1. समीक्षा पसन्द आई । आपके लेखन कौशल में निपुणता
    झलकती है ।

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