शीश महल का अंत - कनिष्क कुमार साहू

रेटिंग: 2/5
किताब 2 अक्टूबर 2018 को पढ़ी गई

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 74
प्रकाशक: एडूक्रिएशन 
आईएसबीएन: 9781545703236

शीश महल का अंत

पहला वाक्य:
रात का समय था, सारी दुनिया रात के आगोश में सो रही थी। 

सभी देशों की सहमति से भारत में युरेनियम का एक संग्रह रखा गया था। इसी संग्रह के ऊपर कई अन्तर्राष्ट्रीय अपराधियों की निगाहें भी थी। फिर एक बार सावधानी में थोड़ी चूक क्या हुई, एक अपराधी युरेनियम की पूरी खेप लेकर चम्पत हो गया।

सभी जानते थे कि इसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय अपराधी विलियम रोबर्ट का हाथ था। पर सबूत न होने के चलते उसका कुछ नहीं किया जा सकता था।

अब एक गुप्त मिशन से ही कुछ होना सम्भव था और इसलिए इंस्पेक्टर विजय ने बाल सीक्रेट  एजेंट राम और सलीम को इस मिशन पर भेजने की युक्ति सोची।

विलियम रोबर्ट अफ्रीका में था। शीश महल नाम का उसका गढ़ था जहाँ उसका राज चलता था। राम और सलीम को उसके गढ़ से भारत से लूटा हुआ युरेनियम लाना था।

क्या वो अपने मिशन में कामयाब हो पाए? इस मिशन की सफलता के लिए उन्हें किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा? उन्होंने इन मुसीबतों पर कैसे विजय पाई?

इन सब सवालों के जवाब तो आपको इस उपन्यास को पढ़कर ही पता चलेंगे। फ़िलहाल, उपन्यास के प्रति मेरे विचार आप  नीचे पढ़ सकते हैं।


मुख्य किरदार:
राम,सलीम - बाल सीक्रेट एजेंट
इंस्पेक्टर विजय - एक पुलिस इंस्पेक्टर जो युरेनियम की चोरी से सम्बन्धित केस के ऊपर काम कर रहे थे
डॉ विनोद - डॉक्टर जो कि राम-सलीम के साथ मिशन पर गये थे
ऐन्ड्रीव - अमेरिका का बाल सीक्रेट एजेंट
रायना - ब्रिटिश बाल सीक्रेट एजेंट
रोजर - एक अफ्रीकन गाइड
विक्टर - रोजर का भाई
विलियम रोबर्ट - एक अन्तर्राष्ट्रीय अपराधी
जैक - विलियम का साथी 

कनिष्क कुमार साहू जी का यह पहला उपन्यास है। वह उपन्यास की शुरुआत में ही लिखते हैं कि एस सी बेदी जी और रायजादा जी के उपन्यासों को पढ़कर और उनसे प्रेरणा लेकर उन्होंने इस कृति की रचना की है। और उपन्यास पढ़ते हुए यह बात साफ दिखती भी है। राम और सलीम की जोड़ी और उनके बीच का समीकरण बरबस ही राजन-इकबाल की जोड़ी की याद दिलाता है। मैंने रायजादा जी को नहीं पढ़ा है तो उनके विषय में कुछ  नहीं कह सकता हूँ।

राम और सलीम बाल सीक्रेट एजेंट हैं जो कि एक मिशन के तहत अफ्रीका पहुँचते हैं और फिर आगे इस मिशन में क्या होता है यही इस उपन्यास का कथानक बनता है। अगर आपने राजन-इकबाल को पढ़ा है और उनके उपन्यासों का मज़ा लेते हैं तो यह उपन्यास आपको अच्छा लगेगा। सलीम मजाकिया शायरी भी करता है तो इन्हें पढ़कर भी पाठकों को आनन्द आएगा। राम और सलीम के अलावा दो विदेशी एजेंट्स रायना और एंड्रीव भी इस उपन्यास में है। चूँकि उपन्यास का कथानक विदेश की धरती पर घटित होता है तो विदेशी किरदारों का होना लाजमी था और यह दोनों भी कहानी के जरूरत के अनुसार फिट बैठते हैं।

उपन्यास के विषय में कुछ बिंदु हैं जिनका ध्यान रखा होता तो शायद उपन्यास की कहानी और अच्छी बन सकती थी। अब मैं उन्ही बिन्दुओं के ऊपर बात करना चाहूँगा।

कहानी में राम-सलीम जब अफ्रीका जाते हैं उनका मकसद होता है कि सारा काम गुप्त रूप से किया जाये। ऐसे कि किसी को भनक भी न लगे।

हाँ सोचा तो यही है, पर यह इतना आसान नहीं है। यदि उसे भनक लग गई की तुम दोनों सीक्रेट एजेंट हो तो वहाँ तुम्हारी जान को खतरा हो जाएगा।
(पृष्ठ 7)


अब उन्हें भारत से अफ्रीका इस तरह से जाना था जिससे उनके ऊपर लोगों का ध्यान नहीं जाए लेकिन फिर भी वो पर्सनल हेलीकाप्टर का इस्तेमाल करके भारत से अफ्रीका तक तक सफर करते हैं । हेलीकाप्टर से भारत से अफ्रीका जाना मुझे एक नामुमकिन सी बात लगती है। एक तो हेलीकाप्टर को इतनी लम्बी दूरी तक ले जाना मुश्किल की बात है क्योंकि आपको हेलीकाप्टर पर ईंधन भरना होगा और उसे काफी जगह उतारना होगा। कितने देशों के साथ इसके लिए समन्वय(co-ordinate) बैठना होगा। इससे राम और सलीम का यह मिशन गुप्त कहाँ रह जायेगा।

 फिर हेलीकाप्टर की गति भी कम होती है। इसलिए भारत से हेलीकाप्टर पर अफ्रीका में वक्त कितना ज्यादा लगेगा। इससे बढ़िया लेखक यह कर सकते थे कि राम-सलीम को डायरेक्ट भारत से अफ्रीका तक आम फ्लाइट से भेजते और फिर उधर ऐसे हेलीकाप्टर का इंतजाम करवा देते। यह कई तरीके से किया जा सकता था। इस मिशन में ब्रिटेन और अमेरिकी एजेंट भी थे तो उन देशों की मदद से ऐसा दिखा सकते थे कि हेलीकाप्टर उधर उपलब्ध करवाए गये। यह कहानी को थोड़ा यथार्थ के नजदीक लाता।

कहानी में रोजर और विक्टर का किरदार है। यह अफ्रीका में मौजूद गाइड रहते हैं। इन गाइड से राम-सलीम  बिल्कुल भी परिचित नहीं रहते हैं पर फिर भी वो अपना पूरा प्लान उन्हें बता देते हैं।

जब वे गाईड की तलाश में घूम रहे थे, तब उन्हें एक राहगीर से पूछने पर पता चला कि पास ही में एक आदमी रहता है जो गाईड का काम करता है।
(पृष्ठ 19 )

इस पर सभी ने एक दूसरे की तरफ देखा। फिर राम ने उसे यूरेनियम की चोरी से लेकर अभी तक की सारी घटना व अपने मिशन के बारे में बता दिया।
 (पृष्ठ 20)

अब मुझे यह आश्चर्य करने वाली बात लगी। एक सीक्रेट एजेंट का किसी भी आदमी को अपने मकसद को इतनी आसानी से बता देना मुझे नहीं जंचा।

हर गुप्तचर संस्था के कुछ स्थानीय एजेंट हर जगह होते हैं। इधर ऐसे ही स्थानीय एजेंट का उपयोग लेखक करा सकते थे। वही लोकल एजेंट उन्हें सारी सुविधा मुहैया करवा सकते थे। इधर रोजर और विक्टर को गाइड की जगह ऐसे ही एजेंट  के रूप में दर्शा सकते थे। ऐसे में कहानी में राम जैसे एजेंट का अपना मकसद बताना जंच सकता था।

राम सलीम जब अमरीका के एजेंट्स से बात करते हैं तो वो शुरुआत अंग्रेजी से करते हैं। और फिर उनसे पूछकर हिन्दी में बातचीत करते हैं।

"यू नो हिन्दी?" सलीम ने पूछा 
"हाँ हम दोनों को हिन्दी अच्छी तरह आती है।" रायना ने मुस्कराते हुए कहा।
"तो हम सभी हिन्दी में बात करेंगे।" सलीम ने कहा, सभी ने हाँ में सिर हिला दिया।
(पृष्ठ 15)

पर जब आगे जाकर वो अफ़्रीकी गाईड के बात की तो सीधा हिन्दी में बात की। उधर यह उल्लेख नहीं किया गया कि किस भाषा में बातचीत थी?

"जी कहिये।" उस आदमी ने कहा।
"हमें एक गाईड की तलाश है। हमे पता चला है कि उसका घर यह ही है।" सलीम ने कहा।
(पृष्ठ 19)

यहाँ पर एक और बात है जो कमी तो नहीं है फिर भी कहना चाहूँगा। अंग्रेजी के सारे डायलॉग देवनागरी में लिखे हैं जो कि अच्छी बात है लेकिन उसका अर्थ भी कोष्टकों में रहता तो बेहतर होता।


एक और बात इधर कहनी जरूरी है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि एस सी बेदी जी के उपन्यासों में भी मैंने यह कमी देखी है।  उपन्यास में खाने का जिक्र है। अफ्रीका में जितना खाना नायक खाते हैं वो सब भारतीय था। यह बात इसलिए भी अटपटी लगी क्योंकि इस बार टीम में विदेशी एजेंट्स भी थे। वह भी भारतीय खाना आर्डर करते हैं। अब अफ्रीका में भारतीय खाना खाना मुझे थोड़ा सा अटपटा लगा। यहाँ  खाना  अगर जगह के हिसाब से होता तो मेरे ख्याल से बेहतर होता।

कहानी के अंत में काफी चीजें थी जिनमे सुधार किया जा सकता था। हमारे नायक हेलीकाप्टर लेकर शीश महल तक जाते हैं। वो गाड़ियों को भी उसमें फँसाकर ले जाते हैं। अब यह चीज तो खलनायक को इतेल्ला करना था कि  कोई  नज़दीक आ रहा है। हेलीकाप्टर जैसी चीज आसानी से देखी जा सकती है। और एक अंतर्राष्ट्रीय अपराधी इतना चौकन्ना तो रहेगा ही। मैं  होता तो रहता। उन्हें चाहिए था कुछ ऐसा सोचा जाता जिससे इस कमजोर पक्ष पर काम किया जाता। नायकों की आवाजाही गुप्त तरीके से होती।

शीश महल में आखिर में हमारे नायकों को  केवल दो ही गार्ड मिलते हैं।  यह बात मुझे जमी नहीं। मैं अगर इतना बड़ा अपराधिक संगठन चलाता तो महल के द्वार पर मौजूद गार्ड के अलावा भी लोग रखता। वहीं विडियो फीड कहानी में दिखाई लेकिन वो केवल मुख्य खलनायक के कमरे में थी। यह भी नहीं जंचा। एक व्यक्ति तो ऐसा होना था जो हमेशा विडियो फीड पर नज़र रखें। पर ऐसा नहीं था जो कि नहीं होना चाहिए था।

लेखक को चाहिए था कि इन बिन्दुओं को दरकिनार न करके इनका तोड़ निकालते और उन्हें कहानियों में डालते। आखिर की लड़ाई में भी नायक खलनायक पर जैसे काबू पाते हैं वह थोड़ा कम रोमांचक लगी। उस पर काम होना चाहिए था। इसके अलावा आखिर में खलनायक नायक पर गोली चलाने में कामयाब हो जाता है। यह भी मुझे नहीं ठीक लगा। जब राम सलीम के पास वक्त था और उन्होंने खलनायक पर काबू पा लिया था तो उसे बाँधा जा सकता था। मैं अगर सीक्रेट एजेंट होता तो सबसे पहले अपने दुश्मन का यह बंदोबस्त करता कि वह मेरे लिए खतरा न बने।

उपन्यास के यह कुछ बिंदु हैं जिन पर काम होना चाहिए था। यह कमियाँ मेरी नज़र में छोटी ही हैं।  छोटी इसलिए क्योंकि लेखक को इनको दूर करने के लिए कुछ ही पंक्तियाँ लिखनी थी।थोड़ी सी मेहनत से यह दूर हो सकती थी।

इधर मैं लेखक को इसका जिम्मेवार नहीं मानूंगा। वो नये लेखक थे और उनकी यह पहली रचना थी। यह सब  सम्पादक का काम था या किसी ऐसे बड़े का जिनको उन्होंने अपनी रचना दिखाई होगी। ऐसे व्यक्ति को किताब पढ़कर यह प्रश्न लेखक से पूछने चाहिए थे। उन्हें इन बिन्दुओं के ऊपर लेखक को काम करने को कहना चाहिए था। अगर ऐसा होता तो कहानी अपनी मौजूदा स्थिति से कहीं अच्छी बन सकती थी। क्योंकि इसमें ज्यादा बड़ी कमजोरियाँ नहीं है। छोटी छोटी बातें हैं जिन्हें ठीक किया जा सकता था।

अंत में यही कहूँगा कि कनिष्क जी का यह काफी अच्छा प्रयास है। हाँ, अगली बार वे एक अच्छे सम्पादक की मदद लेंगे तो मेरे ख्याल से उनके लिए अच्छा रहेगा। उनके अंदर संभावना दिखती है बस एक मार्गदर्शक की जरूरत है।  उम्मीद है वह राम-सलीम के दूसरे कारनामों पर काम कर रहे होंगे और वह ऐसा कुछ जल्द ही लेकर आयेंगे। उनके उज्जवल भविष्य की कामना है।

अगर उपन्यास आपने पढ़ा है तो आपको यह कैसे लगा? अपने विचारों से मुझे टिप्पणी के माध्यम से बता  दीजियेगा। अगर आप यह उपन्यास पढ़ना चाहते हैं तो इसे निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं:


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2 Comments
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  1. कनिष्ठ कुमार साहू का नाम सुना है पर प्रस्तुत उपन्यास पढा नहीं है।
    अधिकांश लेखन कथा तो लिख देते हैं,‌पर कथा पर रिसर्च नहीं करते, जिस से अच्छा कथानक भी नीरस हो जाता है।।

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    1. जी यह तो है। लेखन में रिसर्च काफी चाहिए रहती है लेकिन अक्सर हिंदी में विशेषकर लोकप्रिय लेखन में लेखक इससे बचते हैं जिस कारण कथानक कमजोर बन पड़ता है।

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