जहरीली गैस - एस सी बेदी

रेटिंग: 2.75/5
किताब 10 सितम्बर 2018 से 11 सितम्बर 2018 के बीच पढ़ी गई

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 40
प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स
श्रृंखला : राजन-इकबाल #224

ज़हरीली गैस
ज़हरीली गैस


पहला वाक्य:
शोभा व राजन नाश्ते के लिए बैठ चुके थे।

कुछ ही दिनों में पुच्छलतारा पृथ्वी के निकट से गुजरने वाला था। इस  बार  वह भारत के ऊपर से गुजरने वाला था। इससे इस बात की सम्भावना थी कि तारे से निकलने वाली ज़हरीली गैस का दुष्प्रभाव भारत और भारतवासियों पर पड़ना था।

प्रोफेसर रंगास्वामी एक वैज्ञानिक थे  जो इस पुच्छलतारे और उसके गुजरने से होने वाले दुष्प्रभावों पर अनुसन्धान कर रहे थे।

फिर अचानक किन्ही अज्ञात लोगों ने  रंगास्वामी का अपहरण कर दिया था। हैरानी की बात थी कि यह अपहरण राजन-इकबाल की नाक के नीचे से हुआ था।

आखिर कौन थे अपहरण करने वाले? उन्हें क्या चाहिए था? क्या राजन इकबाल प्रोफेसर रंगास्वामी को छुड़ा पाए?

इन सब प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए आपको इस बाल उपन्यास को पढ़ना होगा।

,मुख्य किरदार :
राजन,इकबाल -  बाल सीक्रेट एजेंट
शोभा - राजन की प्रेमिका और एक और सीक्रेट एजेंट
प्रोफेसर रंगास्वामी - एक  भारतीय वैज्ञानिक
इंस्पेक्टर बलबीर - चन्दननगर का  पुलिस इंस्पेक्टर
दयाल और हरिसिंह - दो हवलदार
अफजल, कजमल - दो अपराधी
रोमेल सांचेज - एक अन्तर्राष्ट्रीय अपराधी

'जहरीली गैस' राजन-इकबाल का लघु-उपन्यास है। उपन्यास की शुरुआत में भारत के ऊपर एक खतरा मंडराता दिखता है। यह खतरा लोगों से नहीं अपितु प्राकृतिक होता है। इसके विषय में जब राजन इकबाल प्रोफेसर रंगास्वामी से बातचीत करते हैं तो कहानी में विज्ञान गल्प के तत्व दिखते हैं। शुरुआत में मुझे लगा था कि इसी लाइन पर कहानी जायेगी लेकिन ऐसा होता नहीं है।

कहानी में साजिश है,अपराध है और कुछ ट्विस्ट्स हैं। कहानी इनसे रोचक बनती है। अपराधी राजन इक़बाल पर  भारी पड़ते दिखते हैं जिससे उपन्यास अधिक रोमांचक हो जाता है। राजन इक़बाल उपन्यासों के सारे नहीं तो कुछ तत्व इसमें हैं। इक़बाल की झख है, उसकी कॉमेडी है जो गुदगुदाती है और मनोरंजन करती है।

राजन इकबाल और शोभा एक  ही घर में रहते हुए दिखाई देते हैं। हाँ,सलमा उधर नहीं दिखी तो उसकी कमी खली थी। राजन और शोभा के बीच मज़ेदार संवाद होता है लेकिन सलमा और इक़बाल के बीच के संवाद पढ़ने में मुझे ज्यादा मज़ा आता है।

एक बात मुझे व्यक्तिगत तौर पर खली थी।  कहानी में एक बार शोभा राजन से केस पर आने के लिए कहती है तो राजन उसे घर में रहने को कहता है।

"राजी! मैं भी चलूँ?" शोभा ने पूछा। 
"नहीं! तुम घर पर रहो।"(पृष्ठ 6 )

 शोभा खुद एक एजेंट है तो राजन का उसे ऐसा रोकना मुझे कुछ जंचा नहीं। फिर शोभा चूँकि एजेंट है तो उसके पास भी कुछ केस होने चाहिए थे। कभी कभी ऐसा लगता है कि राजन की कोई व्यक्तगत फर्म है जिसमे बाकि तीनों मातहत हैं। शोभा का एक्शन में कोई रोल होता तो मुझे अच्छा लगता।

कहानी का मुख्य खलनायक आखिरी में आता है। उसके साथ राजन इक़बाल की लड़ाई होती दिखती है। यह रोचक है लेकिन इसे थोड़ा और ज्यादा मज़ेदार बनाया जा सकता था। 

उपन्यास के कवर की बात करूँ तो मुझे यह पसंद नहीं आया। पता नहीं क्या सोचकर यह आवरण बनाया गया था। यह एक बाल उपन्यास है तो इसमें अंगडाई लेती युवती की तस्वीर का तुक मुझे नहीं दिखता। राजन इकबाल के राजा से प्रकाशित होने वाले ज्यादातर उपन्यासों में कवर कहानी से सम्बन्धित नहीं होता है। पता नहीं क्या सोचकर आवरण का निर्धारण किया जाता है। कवर कहानी के अनुरूप होता तो उपन्यास और पाठको के लिए अच्छा होता। राजन-इकबाल के मामले में यह जरूरी इसलिए भी होता है क्योंकि उपन्यास में कहीं कहानी का संक्षिप्त विवरण नहीं दिया होता है। ऐसे में अगर पाठक को पता करना पड़े कि उपन्यास की कहानी क्या होगी तो वह कवर देखकर ही अनुमान लगाएगा। अगर वो ऐसा करता है तो इधर इस मामले में खुद को ठगा हुआ ही पायेगा। यह सब बातें प्रकाशकों को सोचनी चाहिए।  

इसके अलावा जहरीली गैस का क्या हुआ? इस बात पर आगे कोई बात नहीं होती है। कहानी के इस हिस्से में मुझे ज्यादा रुचि थी। अगर राजन इक़बाल को ऐसे मिशन पर भेजा जाता जिसमें उन्हें इन गैस से जूझना होता तो एक अच्छा विज्ञान गल्प उपन्यास बन सकता था। इससे  उपन्यास की पृष्ठ संख्या भी बढ़ जाती,उपन्यास और अधिक रोमांचक हो जाता और पाठक को दोगुना मज़ा आता।

होने को तो बहुत कुछ हो सकता था। अभी के लिए तो यही कहूँगा उपन्यास रोचक है और एक बार पढ़ा जा सकता है। राजन-इक़बाल के प्रसंशको को उपन्यास पसंद आएगा। मुझे तो आया था।

अगर अपने इसे पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।



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