एक बुक जर्नल: देवों की घाटी - भोलाभाई पटेल

Saturday, March 17, 2018

देवों की घाटी - भोलाभाई पटेल

रेटिंग : 3.5/5
यात्रा वृत्तान्त दिसंबर 7, 2017  से फरवरी 3 2018 के बीच पढ़ा गया


संस्करण विवरण:
फ़ॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 164
प्रकाशक : साहित्य अकादमी
अनुवादक : मृदुला पारीक
पुरस्कार : साहित्य अकादमी
मूल किताब: देवोनी घाटी
आई एस बी एन: 9788126005130
मूल भाषा - गुजराती

देवों की घाटी - भोलाभाई पटेल
देवों की घाटी - भोलाभाई पटेल


पहला वाक्य:
शिमला में हूँ।

मुझे याद है जब मैं 2017 के विश्व पुस्तक मेले में साहित्य अकादमी के स्टॉल में घूम रहा था तो इस शीर्षक ने बरबस ही मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। 'देवो की घाटी'... मैं ठिठक गया.... आखिर क्या होगा इस किताब में? मैंने सोचा.... और इस किताब को उठाया। जब मुझे पता चला कि ये एक यात्रा वृत्तांत है तो मैंने इसे लेना का मन बना ही लिया। और ऐसा होता भी क्यों न? आखिर कौन 'देवो की घाटी' नहीं जाना चाहेगा।

(और किस्मत देखिये इस किताब को मैंने पढ़ना भी चालू तभी किया जब मैं गुजरात घुमक्क्ड़ी के लिए गया था। यात्रा वृत्तांत को यात्रा के दौरान पढ़ने का अलग ही अनुभव था।)

किताब के प्रास्ताविक में लेखक रविंद्र नाथ ठाकुर जी को कोट करते हुए कहते हैं : 

कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक स्थान पर 'घर' और 'पथ' इन दो शब्दों की चर्चा करते हुए कहा है कि 'घर' का मतलब है 'पयेछि' अर्थात जो लोग घर में रहना चाहते हैं, उनका मनोभाव ऐसा होता है मानो मुझे सब कुछ मिल गया है, मैंने सब कुछ 'पा' लिया है। जबकि 'पथ' का मतलब होता है 'पाइनि' यानी 'नहीं पाया' अर्थात जो लोग राह पर निकल पड़ते हैं उनका मनोभाव ऐसा होता है मानो बहुत कुछ ऐसा है जो अभी नहीं पाया है।

रवीन्द्रनाथ कहते हैं न तो अकेले 'घर' से काम चलता है और न अकेले 'पथ' से। हरेक मनुष्य में थोड़ा 'घर' होता है थोड़ा 'पथ' होता है।

मुझमें शायद पथ की मात्रा अधिक है,जो बार बार घर से पथ पर ला देती है। 

इसको पढ़ने के बाद ही मुझे लग गया था कि किताब मुझे पसंद आने वाली है क्योंकि ऊपर लिखे वाक्य मेरे ऊपर पूरी तरह फिट बैठते हैं। अगर आप घुमक्क्ड़ी के कीड़े के काटे हुए है तो ऊपर लिखे वाक्य आपके ऊपर भी फिट बैठते होंगे।   

किताब पर बात करने से पहले मैं अनुवाद की बात करना चाहूँगा। अनुवाद मृदुला जी ने बहुत अच्छा किया है। ऐसा लगता ही नहीं कि मैं किसी अनुवाद को पढ़ रहा हूँ। कहीं भी कुछ अटपटा नहीं लगता। कहीं भी अप्राकृतिक शब्दावली या वाक्य विन्यास देखने को नहीं मिलता है। ऐसे में पाठक पूरी तरह से यात्रा वृत्तांत में खो सा जाता है। एक अच्छे अनुवाद की शायद यही एक पहचान है कि वो अपने होने का एहसास न दे।



अब किताब पर आते हैं। देवों की घाटी यात्रा वृत्तांतों का संग्रह है जिसको मुख्यतः निम्न चार भागों में बाँटा गया है:

क) शिमला डायरी
इधर 21 जून 1987  से 26 जून 1987 के बीच की यात्रा का ब्यौरा है। लेखक को  'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडी' में होने वाले एक सेमिनार के लिए आमंत्रित किया गया था। ये सेमिनार तुलनात्मक साहित्य के ऊपर होना था। इसी दौरान शिमला की घुमक्कड़ी भी उन्होने कर ली।मालरोड, स्कैंडल पॉइंट,कुफरी इत्यादि वो घूमने गये साथ ही शिमला में होने वाले सेमिनार और उसमें शामिल लोगों की झलकियां भी इस वृत्तांत में हैं। जहाँ जहाँ वे गये उनके विषय में काफी रोचक जानकारी दी है। जैसे स्कैंडल पॉइंट का नाम स्कैंडल पॉइंट क्यों पड़ा। छैल किस तरह बसाया गया इत्यादि।

ख) देवों की घाटी

देवों की घाटी शीर्षक वाले हिस्से में 27 जून 1987 से 3 जुलाई 1987 के दौरान की गयी यात्रा का वृत्तान्त हैं। इस वक्त लेखक जिस सेमिनार में हिस्सा लेने आये थे वो खत्म हो चुका था तो उन्होंने पाँच दिन घूमने-फिरने में बिताने की सोची। इस वक्फे में लेखक ने मनाली,कुल्लू और चंडीगढ़ घूमा। उधर के प्रमुख पर्यटक स्थलों का सजीव विवरण इधर मिलता है। पंजाब उस दौरान आतंकवादी गतिविधियों से जूझ रहा था तो किस तरह चंडीगढ़ में उन्हें सुरक्षा को लेकर संशय था इसका पता भी चलता है। वे लिखते हैं:

इस पर से कोई भय न होने का अनुमान मैंने लगाया।(मगर ये अनुमान गलत था। उसे तो अगले बुधवार को ही चंडीगढ़ ज़ें हरिद्वार के लिए जाने वाली बस के हत्याकांड ने सिद्ध कर दिया था। उस वक्त तो मैं अहमदाबाद में था,लेकिन मेरे रौंगटे खड़े हो गए थे।)

ये पढ़कर लगता है यात्रा वृत्तांत केवल यात्राओं का ब्यौरा ही नहीं अपितु उस वक्त के माहौल का ब्यौरा भी होना चाहिए। कई बार हम जब घूमने जाते हैं तो सतही रूप से घूम कर आ जाते हैं। चूंकि हम कुछ दिन के लिए उधर होते हैं तो हमे हर चीज खूबसूरत लगती है। हम केवल खूबसूरती ही देखते हैं लेकिन इसके आलावा भी काफी कुछ होता है। वह भी कोई देस है महाराज ने मुझे इससे परिचित करवाया था। इस हिस्से में भी वो  दिखता है। 

ग) केरलपत्रम्

इस हिस्से में यात्रा वृत्तांत पत्रों की शैली में लिखे गए हैं। केरल के बार्टनहिल में एक अनुवाद की वर्कशॉप के लिए लेखक को जब बुलाया गया तो उसी यात्रा का इसमें वृत्तांत है। ये पत्र लेखक अपनी पत्नी को लिख रहे हैं।  इस भाग में कुल दस पत्र हैं। पत्रों के माध्यम से लेखक केरल का इतिहास, उसके विषय में प्रचलित लोक कथाएं, स्थानों के नामों को लेकर कुछ गलतियाँ जो लोग अक्सर करते हैं, वर्क शॉप में होने वाली गतिविधि और आस पास के पर्यटक स्थलों के विषय में जानकारी प्राप्त करता है। 


घ) कुडलसंगमदेव

संग्रह के चौथा हिस्सा कुडल संगमदेव है। ये शीर्षक एक प्रसिद्ध शैव कवि बसवेश्वर की कविता से लिया गया है। एक पत्र में उन्होंने शैव कवियों के विषय में जानकारी दी है। अगर आप कविता में रूचि रखते हैं तो आपको ये जानकारी पसंद आएगी। किताब के इस हिस्से में भोलाभाई पटेल जी केरल से वापस लौटते हुए किये गए अपने कर्नाटक के ब्योरे के विषय में लिखते हैं। उन्होंने मैसूर में मौजूद महल, आर्ट गैलरी और चामुंडी हिल में चामुंडेश्वरी देवी के दर्शन के विषय में लिखा है। इसके बाद श्रीरंगपट्टनम में टीपू सुल्तान और हैदर अली का समाधिस्थल का विवरण है। उसके बाद शैव कवियों वाला पत्र आता है। उसी पत्र में मैसूर यूनिवर्सिटी जाने का जिक्र है। फिर गोमटेश्वर,हेलेबीड और बेलूर के मंदिर और हम्पी के यात्रा वृत्तांत है। सभी पत्र न केवल जगह का सजीव चित्रण करते हैं बल्कि उसके इतिहास और उनसे जुड़ी लोक कथाओं  से भी पाठक को अवगत करवाते हैं।

तो ऊपर दिये चार भागो को मिलाकर ये पुस्तक बनी हुयी है।जहाँ पहले के दो वृत्तांन्त डायरी शैली में लिखे गये हैं। वहीं आखिर के दो वृत्तान्तों को पत्रों की शैली में लिखा गया है।

डायरी शैली के यात्रा वृत्तान्त तो मैं भी लिखता रहा हूँ लेकिन पत्र शैली के यात्रा वृत्तान्त मैंने पहली बार पढ़े और मुझे ये काफी पसंद आये। इन पत्रों को पढ़ते हुए मैं यही सोच रहा था कि पत्र लिखने की आदत खोकर हमने एक साहित्यिक विधा ही नहीं बल्कि संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम भी खो दिया है।

कई चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें न हम बोल पाते हैं और न ही इंस्टेंट मैसेज में भेज सकते हैं। पत्रों में ये विचार आसानी से प्रेषित किये जा सकते थे। फिर वो एक याद भी होती थीं। हाथ से लिखे पत्रों को पढ़कर हम उस व्यक्ति के ज्यादा नज़दीक खुद को पाते थे। और व्यक्ति के चले जाने के दिनों बाद भी उनकी याद लिए वो पत्र हमे याद रहते थे। लेकिन क्या चैट ऐसा कर पायेंगे? क्या आने वाली पीढ़ी के पास अपने से बड़ों की ऐसी कोई धरोहर होगी जिसमें लिखने वाले की सोच उस तक पहुँचे। वीडियो में वो बात नहीं होती क्योंकि कैमरा सामने आते ही लोग एक चेहरा या व्यक्तित्व ओढ़ लेते हैं। खैर, ये लेख यात्रा वृत्तांन्त के ऊपर है न कि पत्र के ऊपर। लेकिन सोचने वाली बात तो फिर भी है। 

वृत्तान्त के विषय में इतना ही कहूँगा कि यह पठनीय है। लेखक जिधर भी गया उसका उन्होंने सजीव वर्णन किया है। इसे पढ़ते हुए कभी कभी मेरे मन में लेखक की किस्मत से जलन भी हो उठती थी। ऐसा इसलिए कि इस संग्रह में जितनी भी यात्रा उन्होंने की हैं वो खालिस घुमक्कड़ी नहीं है। लेखक को काम के सिलसिले में उधर जाना होता था। साथ में घुमक्कड़ी भी हो जाती थी। ऐसी किस्मत हर किसी की नहीं होती। वैसे मैं उनके वो वृत्तान्त जरूर पढ़ना चाहूँगा जहाँ वो खाली घूमने गये हों।

किताब मुझे पसन्द आयी। लिखने की नयी शैली के विषय में भी मुझे पता चला। हाँ, किताब  में चित्रों का आभाव है। वृत्तांत में कई जगह लिखा भी है कि उन्होंने चित्र लिखे थे। हर वृत्तांत के साथ एक आध चित्र भी होता और अच्छा होता। खैर, अब तो इस वृत्तांत में वर्णित जगहों को देखने की अभिलाषा मन में उठ रही हैं। देखें कब तक पूरी होती है।

अगर आप यात्रा वृत्तान्त पढ़ने के शौकीन हैं तो आपको इस किताब को पढ़ना चाहिए।

अगर आपने इस किताब को पढ़ा है तो आपको ये कैसी लगी? आप अपने विचारों से मुझे ज़रूर अवगत करवाईयेगा।अगर 
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इसके अलावा भी मैंने कुछ और यात्रा वृत्तांत पढ़े हैं। उनके विषय में मेरी राय आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:


मैं भी छोटे मोटे यात्रा वृत्तांत लिखता हूँ। अगर आप उन्हें पढ़ना चाहते हैं तो निम्न लिंक पर जाकर उन्हें पढ़ सकते हैं:


मैं देवों की घाटी के साथ गुजरात के अंदरूनी भाग में (pic credit: राकेश शर्मा भाई )

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