स्वामी - मन्नू भंडारी, शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

रेटिंग : 3.75/5

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : १४४
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन

'स्वामी' मूलतः शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय जी की इसी नाम की कहानी का उपन्यासिकरण  है।

इस किताब में मन्नू जी का लिखा लघु उपन्यास तो है ही, साथ में स्वामी(शरत जी की मूल कहानी ) का हिंदी अनुवाद भी छपा है।

इस पोस्ट में मैं दोनों के विषय में लिखूँगा।


स्वामी - मन्नू भंडारी(अप्रैल २,२०१७ से अप्रैल ६ २०१७ के बीच पढ़ा गया, मई ३० से मई ३१ २०१७ )

पहला वाक्य :
सारे आसमान को सिन्दूरी रंग में रंगता हुआ सूरज धीरे से ढुलक गया। 

मिनी और नरेंद्र पड़ोसी थे। नरेंद्र का मिनी के यहाँ आना जाना था क्योंकि उसके मामा के साथ नरेंद्र की खूब पटती थी। मिनी के मामा मणि बाबू पढने में रूचि रखते थे और अलग अलग विषयों में नरेंद्र के साथ विचार विमर्श करते थे। मिनी, जिसको मामा ने अपने अनुरूप ही ढाला था, इन विमर्शों में जम कर हिस्सा लेती थी।

ऐसे में दोनों को कब प्यार हो गया उनको इसका एहसास ही नहीं हुआ।

वहीं मिनी की माँ गिरी मिनी की बढती उम्र से परेशान थी। वो कई रिश्ते ला चुकी थी लेकिन मामा के सरंक्षण पाकर इन रिश्तों को ठुकरा दिया गया था। अब एक और रिश्ता मिनी के लिए आ रहा था। घनश्याम गीरि को पसंद था। और वो ये नहीं चाहती थी कि यह रिश्ता भी छूट जाऐ।

वही मिनी और नरेंद्र के बीच प्यार का बीज अंकुरित हो गया था। उन्होंने साथ रहने के वादे कर लिए थे।

फिर ऐसा कुछ हुआ कि मिनी को ये रिश्ता अपने मर्जी के खिलाफ स्वीकार करना पड़ा। नरेंद्र जिसने मिनी को अपने साथ ले जाने का वादा किया था उसे ले जा न सका। लेकिन मिनी ने मन बना लिया था कि वो घनश्याम को कभी अपने साथी के रूप में स्वीकार नहीं करेगी। वो ससुराल तो चली गयी थी लेकिन अपने इस हठ में कायम थी। आगे उसके जीवन में क्या हुआ यही इस लघु उपन्यास का विषय है।

स्वामी कहानी को उपन्यास का रूप मन्नू जी ने बासु चटर्जी के कहने पे दिया था। वो उपन्यास के शुरुआत में ही इस बात को बता देती हैं। हुआ यूं कि बासु दा को शरत जी की कहानी पे फिल्म बनानी थी। और इसलिए वो मन्नू जी के पास आये ताकि वो मूल कहानी को दोबारा लिख सकें क्योंकि बासु दा मूल कहानी से पूर्णतः संतुष्ट नहीं थे। मन्नू जी इसके लिए तैयार हो गयीं और इस तरह हमारे पास यह उपन्यास आया।

यह लघु उपन्यास मुझे पसंद आया।  उपन्यास में मूल कहानी को एक जैसा रखा गया है । कुछ पात्रों में बदलाव किया है, कुछ प्रसंग और जोड़े गये हैं।

 इस उपन्यास को पढ़कर मुझे जो पात्र असलियत से काफी दूर लगा वो घनश्याम का था। घनश्याम जैसा मनुष्य मिलना शायद ही संभव हो। चूँकि वो इतना अच्छा है तो नरेंद्र और उसके बीच तुलना करना बैमानी हो जाता है। फिर ऐसे में मिनी के मन की उलझन इतनी मुश्किल नहीं रहती। हाँ, अगर घनश्याम थोड़ा बहुत भी नरेंद्र के बराबर होता तो देखना ज्यादा रुचिकर होता कि मिनी किसे चुनती है?

मिनी का किरदार मुझे काफी पसंद आया। उसकी स्पष्टवादिता, अन्याय को न सहने का स्वभाव, और दूसरे को मत को न मानते हुए भी उसकी इज्जत करने के स्वभाव ने मुझसे प्रभावित किया। जैसे मिनी का भले ही भगवान् में इतना विश्वास नहीं था लेकिन फिर भी अपनी माँ के लिए वो फूलों की माला बनाती है और उनके  विश्वास का सम्मान करती है। ऐसा करना काफी मुश्किल है। उपन्यास में एक प्रसंग है जिसमे मिनी नरेंद्र से बहस करके हिप्पोक्रेसी के मायने उसे समझाती है। वो प्रंसग मुझे बहुत महत्वपूर्ण लगता है।

उपन्यास में नरेंद्र के किरदार के साथ मन्नू जी ने ये अच्छा किया कि वो घनश्याम के विषय में कुछ उल्टा सीधा नहीं कहता है जैसा कि कहानी में हुआ था।  ये बात मुझे अच्छी लगी।

इसके इलावा घनश्याम और मिनी का रिश्ता जिस तरीके से विकसित होता है उसे पढ़कर मुझे बहुत अच्छा लगा। दया से शुरू होकर किस तरह वो श्रद्धा तक पहुँचता है इसका सफ़र पठनीय और रोचक है।

उपन्यास में दर्शाए गये पारिवारिक तू तू मैं मैं यथार्थ के काफी नजदीक है और कई परिवारों की झलक इसमें दिख जाती है। कई परिवारों में ऐसा होता है कि सीधे को सीधा समझकर नज़रअंदाज किया जाता है। फिर कोई उसकी परवाह करने वाला आ जाये तो परिवार को ये अजीब लगता है। इधर तो फिर भी घनश्याम सौतेला बेटा था मैंने तो असल बेटों में भी ये फर्क होते हुए देखा है।

अंत में इतना ही कहूँगा उपन्यास मुझे पसंद आया। मुझे काफी पठनीय लगा। अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है तो एक बार जरूर पढ़िए।




स्वामी - शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय (अप्रैल ६ २०१७ से अप्रैल 8 २०१७ के बीच पहली बार पढ़ा गया ,15 मई २०१७ को दूसरी बार पढ़ा) 
रेटिंग : 3/5
अनुवादक : विमल मिश्र 

पहला वाक्य :
मेरा नाम सौदामिनी मेरे पिता ने रखा था। 

पिछले पाँच सालों में सौदामिनी के जीवन में काफी कुछ हुआ है। आज की सौदामिनी उस भूतकाल की सौदामिनी से काफी अलग हो चुकी है। इन पाँच सालों में उसे प्रेम हुआ और फिर उसकी शादी हुई। जहाँ उसे प्रेम अपने पड़ोसी नरेन से हुआ वहीं उसकी शादी घनश्याम से हुई।  इनके बीच में फंसी उसने क्या निर्णय लिए और इनका इनके जीवन में क्या असर पड़ा ये ही कहानी है। ये कहानी सौदामिनी की है जिसको वो खुद सुना रही है।


 जब मैंने मन्नू जी द्वारा लिखा लघु उपन्यास पढ़ना शुरू किया तो उसकी शुरुआत में ही पता लग गया था कि वो लघु उपन्यास शरत जी की कहानी के ऊपर आधारित है। उस वक्त मन में उस कहानी को पढने की इच्छा थी। फिर जब मैं लघु उपन्यास के अंत पर पहुँचा तो मेरी हैरत की सीमा नहीं रही जब मैंने देखा कि इस किताब में ही इस कहानी को भी संकलित किया गया है। आप लोगों को ये बात अजीब लग सकती है लेकिन मैं किताब को जब पढता हूँ तो उसके आखिरी के पन्ने नहीं देखता हूँ। शायद इस बात का डर है कि कुछ ऐसा पता चल जाएगा जिससे कहानी का मज़ा बिगड़ जाए। और फिर इस किताब की शुरुआत में कोई इंडेक्स भी नहीं था कि जिससे पता चलता कि कहानी को भी इसमें शामिल किया गया है।

खैर उस वक्त तो मैंने कहानी पढ़ ली लेकिन फिर चूँकि मैं लघु उपन्यास पढ़ चुका था तो उसका असर मेरे ऊपर था। इसलिए मैंने ये सोचा था कि इस किताब को इस वर्ष दोबारा पढूँगा। जो कि आज यानी 15 मई को मैंने किया।

कहानी की बात करूँ तो कहानी प्रथम पुरुष में लिखी गयी है। सारी घटनायें हो चुकी हैं और मुख्य पात्र अब उस कहानी को सुना रहा है। घटनायें के विषय में जैसे जैसे वो लिखती जाती है वैसे वैसे उनके ऊपर टिपण्णी भी करती जाती है। अपने पहले आकर्षण को प्यार समझना और फिर ये सोचना कि हम उनके बिना नहीं जी सकते हम सभी के साथ हुआ है। लेकिन जैसे जिन्दगी चलती है वैसे वैसे हम ये भी समझते जाते हैं कि न केवल हम अपने पहले प्यार के बिना जी सकते हैं लेकिन  सुखी भी रह सकते हैं। हाँ, कई बार जिद के कारण ये बात महसूस करने में हमे ज्यादा वक्त लगता है। फिर आकर्षण और प्यार दो अलग अलग चीजें हैं।

कहानी में सौदामिनी के इलावा नरेन और घनश्याम  मुख्य पात्र हैं।

जहाँ नरेन एक पढ़ा लिखा आज का युवक है। वो तर्क पर विश्वास रखता है। वो धार्मिक रूढ़ियों को नहीं मानता है।  और न ही शादी ब्याह के रिश्ते उसके लिए मायने रखते हैं। ऐसा नहीं है कि वो सौदामिनी से प्यार नहीं करता है। उसका आकर्षण केवल शारीरिक नहीं है। उसे लगता है कि वो अपने ससुराल में सुखी नहीं है और इस कारण वो वही करता है जो उसे ठीक लगता है।

नरेन चौंक उठा और बोला,'अच्छा रहने दो। लेकिन अगर मैं यह जानता कि तुम सुख से हो, तुम सुखी हुई हो, तो फिर हो सकता है एक दिन मैं अपने मन को सान्त्वना दे सकता! मगर कोई सम्बल ही तो मेरे हाथ में नहीं है, मैं जिंदा रहूँगा कैसे?'
(पृष्ठ 131)

वहीं  घनश्याम  एक धार्मिक इंसान है। वो उम्र में भी नरेन से काफी बढ़ा है इसलिए उसके अन्दर परिपक्वता ज्यादा है। लेकिन यहाँ ये बात कहना जरूरी है कि घनश्याम एक साधारण इंसान नहीं है। उसके जैसा इंसान मिलना बहुत ज्यादा मुश्किल है। मुझे ज्यादा अच्छा लगता अगर घनश्याम के अन्दर कुछ इंसानी कमियाँ दिखाते। अगर ऐसा होता तो सौदामिनी को चुनाव में ज्यादा मुश्किल होती। सौदामिनी खुद एक समझदार युवती थी इसलिए घनश्याम के चरित्र से वो प्रभावित न होती ये नहीं हो सकता था। अगर मेरी किसी प्रेमिका की शादी घनश्याम जैसे इंसान से हुई होती और वो उसे छोड़ती तो मुझे उस प्रेमिका पे हैरत होती। ये कहना अजीब हो सकता है लेकिन घनश्याम ऐसा आदमी है जिसे आप खुद दुःख नहीं देना चाहते हैं। इसलिए घनश्याम मुझे यथार्थ से थोड़ा दूर लगता है।

एक और बात मुझे अटपटी लगती है अंत तक आते आते नरेन और सौदामिनी एक दूसरे को भाई बहन बुलाने लगते हैं। जिस व्यक्ति से आप प्यार करते हो और उसकी तरफ आकर्षित भी हो उसे बाद में भाई या बहन कैसे कह सकते हो? मुझसे तो ये नहीं होता। हो सकता है उस समय के समाज में ये आम बात हो।

'यह क्या है ?'
'तुम्हारा साड़ी-ब्लाउज सब मैं खरीद लाया। '
'तुमने ये सब क्यों खरीदा?'
नरेन ने मुस्कुराकर कहा,'मेरे सिवा कौन खरीदेगा?'
मैं और कभी इतना नहीं रोई थी। 
नरेन ने कहा,'तू पाँव फैलाकर उठकर बैठ बहन। मैं कसम खाता हूँ कि हम सगे भाई-बहन हैं। तुझे मैं चाहे जितना भी प्यार क्यों न करूँ, मैं अपने से तेरी हमेशा रक्षा करूँगा। '
(पृष्ठ १३९)

कहानी का अंत मुझे अच्छा लगा। घनश्याम के कुछ गुण मैं अपने अन्दर लाना चाहूँगा। बाकी नरेन का क्या हुआ ये जानने की मन में इच्छा है।  सौदामिनी और घनश्याम का जीवन कैसे बीता होगा इसका तो मैं अंदाजा लगा ही सकता हूँ।


मन्नू  जी ने कहानी को उपन्यास में रूपांतरित करने में कई बदलाव किये हैं। ये बदलाव किरदारों में और घटनाओं में हैं। अगर मैं बात करूँ तो मन्नू जी के किये गये बदलाव मुझे पसंद आये। जैसे शरत जी की सौदामिनी ग्लानि से भरी पड़ी है लेकिन अपने प्यार को लेकर ये ग्लानि मन्नू जी कि मिनी में नही दिखती। मामा के किरदार को उन्होंने बेहतर किया। शरत जी की कहानी के मणि बाबू अपने में ही रमे रहते हैं लेकिन मन्नू जी के मणि बाबू मिनी के मन के भाव को आसानी से समझ जाते हैं।  ननद का किरदार जहाँ शरत जी की कहानी में कुछ भी नहीं था उसे उन्होंने विस्तार दिया। मिनी की माँ के किरदार को भी शसक्त बनाया। जहाँ सौदामिनी की माँ कमजोर लगती है वहीं मिनी की माँ एक स्ट्रोंग किरदार है। ऐसे ही छोटे छोटे फर्क उन्होंने किये जिससे कहानी लम्बी भी हुई और ज्यादा रोचक भी। साथ में एक कहानी होते हुए पाठक के रूप में मुझे दोनों को पढने में मज़ा आया। मुझे ऐसा नहीं लगा कि कहीं भी दोहराव हुआ हो।

अगर आपने किताब पढ़ी है तो इसके विषय में अपनी राय कमेंट में जरूर दीजियेगा। अगर आपने किताब नहीं पढ़ी है तो आप इसे निम्न लिंक से भी मंगवा सकते हैं:
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2 Comments
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  1. Oh, I am so glad I found this post! I have so many things to say that I don't know what to say. I read it many years ago and it remains my favourite. I haven't read the short story though. Mini is my favourite female character. That hypocrisy conversation ―I felt the same. It was so powerful that can leave people speechless.

    About brother-sister thing ― I think it's the problem of translation. Begali people sometimes say 'da', which is just a respectful way to address to the men (not necessarily brother). In Mannu Bhandari's Swami, she says, 'नरेन दा' (in the first scene).

    It's a wonderful post!

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    1. Glad you liked it. I had enjoyed reading it too. I guess I'll have to read it again now.

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