अंधविश्वास उन्मूलन : आचार - डॉ नरेंद्र दाभोलकर

रेटिंग : 4/5
किताब  मार्च 2,2017 से अप्रैल 27,2017 के बीच पढ़ी गयी

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 152
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
आईएसबीएन : 978-81-267-2793-3
श्रृंखला : अंधविश्वास उन्मूलन #2
अनुवाद :  प्रा प्रकाश काम्बले
सम्पादन : डॉ सुनीलकुमार लवटे


पहला वाक्य :
सतारा में मेरे घर के सामने वाली गली में साहबजादी नामक एक अशिक्षित और गूँगी मुस्लिम महिला रहती थी। 

नरेन्द्र दाभोलकर जी ने अपना जीवन अंधविश्वास उन्मूलन के लिए समर्पित किया था। उन्होंने इस विषय में कई लेख और पुस्तकें लिखीं। उन्होंने महाराष्ट्र अंधविश्वास उन्मूलन समिति की संस्थापना की।

यह पुस्तक भी उनके मूलतः मराठी में लिखे गए ग्रन्थ:'तिमिरातुनी तेजाकड़े' के हिंदी अनुवाद का दूसरा  भाग है।  जहाँ पहले भाग: अन्धविश्वास उम्मूलन- विचार  में  उन्होंने  प्रचलित अंधविश्वासों के विषय में बताया था, वहीं इस भाग में वो अनिस (अंधविश्वास निर्मूलन समिति) के द्वारा विभिन्न अंधविश्वासों के ऊपर से पर्दा उठाने के लिए किये कार्यों को उन्होंने पाठकों के साथ साझा किया है।

इस पुस्तक में निम्न अध्याय हैं :


  1. साहबजादी की करनी 
    साहबजादी सतारा में रहने वाली एक गूँगी मुस्लिम महिला थी। लोग उसके पास इसलिए आते ताकि अपने घरों  में हुई करनी दूर करा सकें। इस करनी को दूर करने के लिए वो उन्हें अपने घरों से मिट्टी,बर्तन,पानी और नीम्बू लाने के लिए कहती।  फिर  मिट्टी को पानी में मिलाती और फिर नीम्बू काटकर उसमे कुछ बुदबुदाते हुए डालती।  फिर वो याचक को नीम्बू निचोड़ने  को कहती। याचक  की आश्चर्य की तब सीमा नहीं रहती जब उसके नीचोड़े गये नीम्बू से कील या पिन के साथ उसके हाथ में ताबीज भी आ जाते जो इस बात का प्रमाण था कि उसके घर की करनी दूर हो चुकी है।

    क्या ये सचमुच का चमत्कार था जैसे लोग समझते थे ? समिति ने इस का पर्दाफाश कैसे किया ?
  2. कमरअली दरवेश की पुकार!

    महाराष्ट्र के पूना से तीस किलोमीटर दूर पूना सतारा रोड के नज़दीक खेड शिवपुर नामक गाँव के नज़दीक बाबा कमरअली की दरगाह थी। दरगाह के बाहर दो भारी पत्थर थे। एक पत्थर नब्बे और एक साठ किलो का बताया जाता था। ऐसा भी कहा जाता था कि पहले वाले को ग्यारह और दूसरे वाले को नौ लोग अपनी ऊँगली की नोंक  लगाकर और उठाने से पहले बाबा कमरअली दरवेश की जय का नारा लगाकर उठाने के कोशिश करें तो पत्थर पंख के समान हल्के हो जाते थे। हाँ, अगर कोई महिला इन लोगों में शामिल हो तो ऐसा चमत्कार नहीं होता था।

    क्या ये सच में चमत्कार था ? समिति ने इसके लिए क्या किया?
  3. लंगर का चमत्कार

    गैबी बाबा का पीर नामक जगह में एक चक्की के आकार का पत्थर रखा हुआ था जिसके बीच में सुराख था। इसे हरा रंग दिया गया था और इसे लंगर कहा जाता था। ऐसी मान्यता थी कि लंगर याचक के सवाल का जवाब हल्का या भारी होकर देता था। जवाब सकारात्मक तो, तो पत्थर भारी और नकारात्मक तो पत्थर फूल सा हल्का।

    क्या महज लोगों का अंधविश्वास था ? अगर हाँ, तो समिति ने इसका निवारण कैसे किया ? और उनके शोध का क्या निर्णय निकला?

  4. मीठे बाबा 

    महाराष्ट्र के बारामती गाँव का युवक  भानुदास अपने खेत में गुलर के पेड़ के नीचे सो रहा था। तभी अचानक उसे अपने शरीर में कुछ संचार सा महसूस हुआ और फिर उसके अन्दर एक मीठापन आ गया। अब वो जिस भी चीज को छूता वो मीठी हो जाती। क्या था भानुदास के मीठे पन का राज?
  5. गुरव बन्धु का नेत्रोपचार

    गुरव बंधुओं को सपने में देवता ने उनके बैल के नेत्रों के लिए उपचार बताया था।  ये उपचार सार्थक होने के बाद इंसानों पे भी किया जाने लगा।  इसके शिविर लगने लगे। क्या सचमुच उनके पास लोगों को ठीक करने की औषधि थी? समिति ने इसके लिए क्या किया और  आखिर ये कैसे रुका?
     
  6. भूत से साक्षात्कार

    भूत क्या हैं ?  क्या वो होते हैं ? ये सदियों से मनुष्यों  के लिए कोतुहल का विषय रहा है। सांगली जिले में जयसिंगपुर से चार पांच किलोमीटर दूर एक बस्ती थी। उस बस्ती के महादेव चव्हाण नामक एक मान्त्रिक   ने भूत दिखाने के समिति की  चुनौती को स्वीकार किया।  आगे क्या हुआ? क्या आखिरकार भूत के दर्शन हुए ?

  7. दैवी प्रकोप से दो दो हाथ 

    कुड़ाल में वाद संवाद कार्यक्रम के दौरान एक व्यक्ति द्वारा चुनौती दी गयी। उनका कहना था कि अनिस द्वारा प्रचालित चमत्कारों के खिलाफ  प्रचार उधर लागू नहीं होता था। चुनौती कुछ इस प्रकार थी:

    अ)श्री डुंगेश्वर (श्रीरामवाडी) कोयरे
    पहली चुनौती के अनुसार श्री डुंगेश्वर (श्रीरामवाडी) कोयरे से 10 कार्यकर्ता एक एक घंटी उठाकर अपने घर ले जायेंगे। इससे उनपर दैवी प्रकोप   टूटेगा उन्हें तीन महीनों के अन्दर घंटा वापिस करने के लिए विवश होना पड़ेगा।

    ब)श्री देवभीम आन्दुर्ले 

    दूसरी चुनौती के अनुसार समिति के  कार्यकर्ता लोगों को एक ढोल को दस मिनट   तक जाना था और उससे होने वाली पीड़ा से निजाद पाने के लिए ईश्वर के शरण में वो नहीं जा सकते थे।

    क्या समिति इन चुनौतियों को स्वीकार कर दैवी प्रकोप का शिकार बनी ? चुनौती के दौरान उनके सामने क्या क्या मुश्किलें आयीं ?

     
  8. बाबा की करतूत

    कोंकण, गोवा और पश्चिम महाराष्ट्र में नरेंद्र महाराज की ख्याति बढ़ रही थी। उनके ट्रस्ट द्वारा और प्रकाशक के तौर पर उनकी पत्नी का नामवाली 'श्री नरेंद्र लीलामृत' किताब र्यकर्ताओं में चर्चा का केंद्र थी। इसमें नरेंद्र महाराज के नाम से कई चमत्कारों का उल्लेख था। समिति यही चाहती थी कि वो नरेंद्र महाराज से इस किताब के विषय में सात सवाल करेगी जिसका कि जवाब वो दें तो चमत्कारों की सत्यता का प्रमाण मिले। ये सब एक कार्यक्रम के दौरान होना था। नरेंद्र महाराज भी इसके लिए तैयार हो गये। वो सवाल क्या थे और उन्होंने इसका क्या जवाब दिया?
  9. भगवान गणेश का दुग्धप्राशन

    21 सितम्बर 1995 को ये बात प्रचलित हुई कि भगवान की मूर्ती दूध पी रही थी। भक्त चम्मच से दूध मूर्ती के होठों पर लगा रहे थे और दूध कम होता जाता था। क्या ये सच था? समिति ने इसके लिए क्या किया? क्या कारण था चम्मच में मौजूद दूध के कम होने का?
  10. पुरस्कार से इनकार 

    नरेंद्र दाभोलकर जी की किताब लढे अन्धश्रद्धेचे (लड़ाई अन्धविश्वास से) के लिए उन्हें 'सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थ निर्मिति' का पुरस्कार दिया जाना था। ये पुरस्कार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख द्वारा दिया जाना था। इसलिए नरेंद्र जी ने पुरस्कार लेने से मना कर दिया। इसके पीछे का कारण उन्होंने माननीय मुख्यमंत्री जी को एक पत्र से लिखकर दिया। इसी पत्र को यहाँ प्रकाशित किया गया है।
  11. मदर टेरेस्सा का सन्तपद

    ईसाई धर्म के अनुसार किसी भी व्यक्ति को सन्त का पद तभी दिया जाता है जब उसके द्वारा कुछ चमत्कार किये गये हो और उन्हें निर्विवाद रूप से साबित कर दिया गया हो। जब मदर टेरेसा को संत की उपाधि देने के विषय में सोचा तो पोप जॉन पॉल द्वितीय ने भारत में एक पथक भेजा जो इन चमत्कारों की पुष्टि कर सके। इसी को ध्यान में रखते हुए अनिस ने पोप को एक ईमेल और एक चिट्ठी भेजी। उसी का मजमू इधर दिया गया है।
  12. झाँसी की रानी का पुनर्जन्म 

    सांगली की सौ सरयू सहस्त्रबुद्धे एक आम गृहणी थी। उसका जीवन उसके बच्चों और पति के इर्द गिर्द घूमता था। 1985 के आसपास उसे ऐसे लगने लगा कि कोई उसके पीछे घूमता था। फिर इसी चीज ने उसे स्पष्ट दर्शन दिए और उसे बताया कि वो झांसी संस्थान की कुलदेवी महालक्ष्मी है। उसने कहा वो सरयू को बताने आई थी कि वो पिछले जन्म में झांसी की रानी थी। पिछले जन्म में जो धार्मिक कार्य अधूरे रह गये थे उसे उन्हें अब पूरा करना था। 'झाँसी की रानी का पुनर्जन्म हुआ, सहस्त्रबुद्धे बाई के अनुभव कथन' का सार्वजानिक आयोजन जब 21 अगस्त 1986 को सतारा नगरवाचनालय द्वारा आयोजित किया गया तो उसमें समिति के सदस्य भी आये। उन्होंने कुछ सवाल जवाब भी किये। फिर आगे क्या हुआ? क्या सरयू सचमुच रानी का पुनर्जन्म थी?
  13. लड़कियों की भानमती

    कडेगाव जिला परिषद की कन्या पाठशाला में एक विस्मयकारी घटना घट रही थी। उधर मौजूद कुछ लड़कियों की आँखों से कंकड़ पत्थर निकल रहे थे। इस बात ने सबको हैरत में डाल दिया था। डॉक्टरों के पास भी इसका कोई जवाब नहीं था। इसके कारण पाठशाला का स्थानांतरण करने की भी योजना बन गयी थी क्योंकि सभी का मानना था कि इस घटना के पीछे किसी अलौकिक ताकत का हाथ था। वहाँ रह रहे एक डॉक्टर ने समिति को इस बात की जाँच के  लिए एक पत्र भेजा। समिति गयी और कारण का पता लगाया। जो सामने आया वो इस संस्मरण में है।
  14.  दैववाद की होलीसतारा में अखिल भारतीय ज्योतिष सम्मलेन का आयोजन हुआ था। इस सम्मलेन में ज्योतिष विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा भी की गयी। समिति ने इसका विरोध किया था और 'ज्योतिष शास्त्र कैसे नहीं है?' को लेकर 21 प्रश्न सभी के लिए दिए थे। लेकिन किसी भी ज्योतिष ने इनका उत्तर नहीं दिया।

    इसी सम्मलेन के विरोध में 'दैववाद की होली' नामक आन्दोलन शुरू हुआ। इस आन्दोलन में लोग अपनी जन्म कुंडलियाँ दैववाद का प्रतीक समझकर जला रहे थे। इसके इलावा पंचांग के शुभ मुहूर्त को अलग पन्नों में लिखकर जलाने की योजना थी ताकि लोगों के दिलो दिमाग में ये बात बैठाई जा सके कि कोई भी समय शुभ-अशुभ नहीं होता।

    इस आन्दोलन को करने में समिति को क्या दिक्कतें आई और उन्होंने कैसे इस अंजाम दिया?
  15. कुलपतियों के नाम खुली चिट्ठी

    जब वैदिक ज्योतिष विषय का विभाग ज्योतिर्विज्ञान नाम से विश्विद्यालय में शुरू करने का विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्णय लिया गया तो नरेंद्र दाभोलकर जी ने सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के नाम चिट्ठी लिखी। उसी चिट्ठी को इधर प्रकाशित किया गया है।

    इस पत्र में बताया गया है कि कैसे ज्योतिष न विज्ञान की श्रेणी में आता है और न शिक्षा की मानविकी शाखा में ही आता है। दाभोलकर जी ने इसमें अपने तर्क रखे हैं कि ऐसा क्यों है?
  16. भ्रामक वास्तुशास्त्र संबंधी घोषणापत्र

  17. महाराष्ट्र के पुणे में समिति द्वारा भ्रामक वास्तुशास्त्र से सम्बंधित घोषणापत्र जारी करने के लिए एक समिति का निर्माण किया गया था। इस घोषणापत्र में क्या था?

  18. दत्ता नवरणे अपने आप को वास्तुशास्त्र विशेषज्ञ कहते थे। उन्होंने समिति के समक्ष एक चुनौती रखी। ये चुनौती क्या थी और इसका कैसे समिति के कार्यकर्ताओं ने सामना किया?

  19. इसके इलावा भ्रामक वस्तुशात्र के ऊपर किये वाद विवाद के कार्यक्रमों का इस अध्याय में उल्लेख है। एक और घटना का उल्लेख है जिसमे दाभोलकर जी ने पिंपरी-चिंचवड महानगर निगम के आयुक्त के ऊपर आरोप लगाया कि उन्होंने सरकारी पैसों से सरकारी मकान में वास्तुशास्त्र के हिसाब से बदलाव किये। इस आरोप का क्या असर हुआ? और इस विवाद का निवारण कैसे हुआ ये सब भी इस अध्याय में है।


  20. शनि-शिंगणापुर

    महाराष्ट्र के नगर जिले के नेवासे तहसील  में मौजूद शनि-शिंगणापुर बहुत प्रसिद्द है। ऐसा माना जाता है उधर चोरियाँ नहीं होती है। लेकिन ये कितनी भ्रामक बात है इसी के विषय में इस अध्याय में लिखा है। उधर की पुलिस के रजिस्टर में दर्ज चोरी की घटनाओं को इधर बताया है जो कि साफ दर्शाता है कि चोरी न होने वाली बात कितनी गलत है।

    इसके इलावा इधर एक और परम्परा है कि औरतों को यहाँ शनि देव का जो चबूतरा है उस पर चढ़ने तक की भी औरतों को मनाही है। समिति का इस मामले में क्या विचार है? और इस असमानता को हटाने के विषय में क्या किया गया और इसका क्या परिणाम हुआ? ये भी इस अध्याय का हिस्सा है।  
  21. विवेक जागरण : वाद संवाद

    डॉक्टर श्रीलाम लागू एक जाने माने अभिनेता तो थे ही लेकिन अंधविश्वास निर्मूलन में भी उनकी रुचि थी। जब दाभोलकर जी ने 'मैं बुद्धिप्रमाण्यवादी कैसे बना' विषय पर  उनका साक्षात्कार लिया तो उन्होंने अपने विचारों को पूरे महाराष्ट्र के सामने रखने की इच्छा जगाई। इसी के अनुरूप इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गयी। विवेक जागरण : वाद-संवाद नाम से ये कार्यक्रम होता था जिसमे लोगों के भेजे प्रश्न के ऊपर दाभोलकर जी और डॉक्टर लागू का साक्षात्कार होता था। इस कार्यक्रम के दौरान कई विवाद भी हुए, कई आरोप भी लगाए गये और इन दोनों के ऊपर हमले भी हुए। इस सब का विस्तृत विवरण इस अध्याय में है।
  22. यह रास्ता अटल है

    अंधविश्वास निर्मूलन के अपने लक्ष्य को पाने के लिए दाभोलकर जी को कई हिन्दुत्वादी संगठन और धर्म के पैरोकारों का विरोध भी झेलना पड़ा है। उनके ऊपर कई केस भी किये गये। वो इस सब से कैसे जूझते हैं और इनसे निपटने के लिए उनकी क्या मानसिकता रहती है इसी को विस्तृत रूप में इधर बताया गया है।
  23. अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति और ब्राह्मणी कर्मकाण्ड

    अंधविश्वास निर्मूलन समिति पर समय समय पर कई आरोप भी लगते रहे हैं। ये आरोप क्या है? इनके विषय में समिति का जो स्पष्टीकरण है वो इस अध्याय में लिखा गया है।
  24. यह सब आता कहाँ से है?

    विजय तेंदुलकर की एक किताब है यह सब आता कहाँ से है? दाभोलकर जी के अनुसार ये उनकी पसंदीदा किताब है। जब भी लोग समिति के विषय में उनसे प्रश्न करते हैं कि वो इतने कम समय में इतना प्रसिद्द कैसे हो गयी और इसमें अनुशासन क्यों है तो वो उनके मन के भाव इस किताब के शीर्षक के तरह होते हैं। वो सोचने पर विवश हो जाते हैं कि ऐसा क्यों है। उन्हें इसका कारण लगता है यही इस अध्याय में बताया गया है।

सरल भाषा में लिखे अध्याय पाठकों को उनके कार्यों से परिचित करवाता है। चूँकि अधिक्तर जिन घटनाओं को इसमें बताया गया है उनमे से सभी महाराष्ट्र में घटी हैं तो उधर के लोगों को इसके विषय में काफी अनुभव होगा। मुझे खाली एक दो घटनाओं के विषय में पता था। इस समिति के कार्य की सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अंधविश्वासों से पर्दा उठाते हुए भी वो धर्म के खिलाफ नहीं है। वो लोगों की श्रद्धा का सम्मान करते हैं बस जो लोग धर्म का नाम लेकर और अंधश्रद्धा को इस्तेमाल कर लोगों से पैसे ऐठ रहे हैं या उनकी भावनाओं के साथ खेल रहे हैं वो उनका पर्दा वो फाश करते हैं।

एक नास्तिक होने के नाते ये श्रद्धा मुझे समझ नहीं आती है। हाँ, लेकिन मेरा मानना है कि जब तक आप अपनी श्रद्धा को किसी के ऊपर थोपते नहीं है या इसके कारण किसी का नुक्सान नहीं करते हैं तो आपको अपने हिसाब से जीने का पूरा हक है। लेकिन अगर कोई लोगों की श्रद्धा को आर्थिक, भावनात्मक  या शारीरिक शोषण के लिए इस्तेमाल करता है तो उसका पर्दाफ़ाश करके उसकी सच्चाई सबके सामने लानी ही चाहिए।

किताब मुझे बहुत पसंद आई है। अगर आपने इस श्रृंखला की पहली पुस्तक अन्धविश्वास उन्मूलन: विचार नहीं पढ़ी है तो आप इस इसे जरूर एक बार पढ़िए। उसके बाद आप इसे पढेंगे तो आपको पता लगेगा कि इसमें मौजूद संस्मरण कितने जरूरी है। मुझे लगता है इस किताब को हर किसी को पढना चाहिए। अगर आप आस्तिक हैं तो भी और नास्तिक हैं तो भी।

किताब आप निम्न लिंक से प्राप्त कर सकते हैं :
अमेज़न

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4 Comments
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  1. राजीव भाई दिक्षित के अनुसार यह ईसाई धर्म के प्रचारक थै। नरेन्द्र भाई

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    1. मैंने इस श्रृंखला की दो किताबें पढ़ी हैं और उन्हें पढ़कर मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगा। आप किताब पढ़िये और खुद अपने विचार बनाईये। फिर आखिर में यह हमारा फैसला होता है कि हमे क्या मानना है और क्या नहीं? राजीव जी ने यह इसलिए कहा होगा क्योंकि वो हिन्दू धर्म में प्रचलित अन्धिविश्वास के विषय में ज्यादा बोलते थे। पर यह हिन्दू बहुल देश है तो ऐसा होना लाजमी ही था।

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  2. तो आपकी क्या राय है

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    1. मेरी राय कुछ भी नहीं है। मेरा मानना है सुनो सबकी, वो जो अच्छा कह रहे हैं उसे लो और जो गलत कह रहे हैं उसे नकार दो। यह जरूरी नहीं है कि किसी की सौ प्रतिशत बातें मानी जाए या किसी को सौ फीसदी ही नकार दिया जाए। इनके मामले में भी मेरा विचार यह है कि अंधविश्वास के ऊपर इन्होने काफी काम किया है जो कि किया जाना जरूरी था। धर्म मेरे लिए बहुत गैरजरुरी चीज है मुझे व्यक्तिगत रूप से उसकी आवश्यकता महसूस नहीं होती है।

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