एक बुक जर्नल: सूखा पत्ता - अमरकान्त

Friday, July 29, 2016

सूखा पत्ता - अमरकान्त

रेटिंग :4.5/5
उपन्यास 8  जुलाई 2016 से 12 जुलाई 2016 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट:पेपरबैक
पृष्ठ संख्या:184
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

पहला वाक्य:
जब कभी अपने लड़कपन और स्कूली दिनों की बात सोचता हूँ तो सबसे पहले अपने चार दोस्तों और मनमोहन की याद आती है।

सूखा पत्ता कृष्ण नामक व्यक्ति की कहानी है। कृष्ण आज़ादी से पहले के पूर्वी उत्तर प्रदेश के कस्बे बलिया में  रहता है।
उपन्यास की कहानी सन् 1943 के आसपास शुरू होती है जब कृष्ण नववीं कक्षा में गया था और ये कहानी 1946 तक जाती है जब वो इंटरमीडिएट कर रहा होता है। इस अंतराल को तीन हिस्सों में बाँटा गया जिसमें कृष्ण के जीवन में हुए महत्वपूर्ण बदलाव दर्शाये गये हैं।
पहले हिस्से में उसके बचपन के दोस्त और बचपन के किस्से हैं।
दूसरा खण्ड में कृष्ण और उसके दोस्त आज़ादी के लिए लालायित युवक हैं। वो क्रांतिकारी बनना चाहते हैं। उसके लिए वो क्या क्या करते हैं इसका ही उसमे विवरण है।
तीसरा खण्ड कृष्ण के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण खण्ड  है जिसमें उसे प्यार हो जाता है। उसको पाने के लिये वो क्या करता है। और पाने के बाद क्या होता है? इस खण्ड में इसका विवरण है। 

इन तीन खण्डों में कई घटनायें होती हैं जिनको विस्तार में तो आप उपन्यास में ही पढ़ियेगा।
तीसरे खण्ड के बाद उसे ये एहसास होता है कि उसका जीवन एक सूखे पत्ते की तरह था जो केवल हवा के बहाव की तरफ मुड़ जाता था और उसे इसे बदलना होगा।
वो क्या अनुभव थे जिससे उसे इस बात का एहसास हुआ?


उपन्यास मुझे बेहद पसंद आया। अक्सर किसी कृति में आप अपने जीवन की छवि देखते हैं तो वो आपके लिए ज्यादा मायने रखने लगती है। अमरकान्त जी के इस उपन्यास का भी मेरे लिए यही मोल है।
सन् 1959 में छपे इस उपन्यास के कुछ हिस्से पढ़कर तो ऐसा लगा जैसे मैं अपने ही जीवन की कहानी पढ़ रहा हूँ। शायद लड़कों का जीवन के कुछ हिस्सों फिर चाहे वो किसी भी वक्त में जन्मे हो एक जैसा ही रहते है। मैं ऐसा इसलिए भी कह सकता हूँ क्योंकि अमरकान्त जी का उपनयास कोरी कल्पना पे आधारित नहीं हैं। वो शुरुआत में ही बता देते हैं कि ये उनके एक मित्र की डायरी से जन्मा है। खैर, मुझे पढ़कर काफी अच्छा लगा  और मेरे उस वक्त की काफी यादें भी ताज़ा हुई।
जैसे मैं ऊपर बता ही चुका हूँ या उपन्यास तीन खंडों में बंटा है।
पहले खंड में कृष्ण नया नया नववीं कक्षा में गया है। उसके कुछ दोस्त हैं और उसके आदर्श मनोहर नाम का उससे दो साल बड़ा लड़का है। इस खंड को पढ़ने में मुझे बहुत मज़ा आया क्योंकि इसमें कई वाकये है जिनसे मै रिलेट कर सकता हूँ। उदाहरण के लिए लड़कों का समूह बनाकर दूसरे समूह के लड़कों से बैर भाव।

जुलाई में, बरसात प्रारम्भ होते ही, स्कूल कॉलेज खुलते थे;और जिस तरह बरसात में किस्म-किस्म के जंगली घास पौधे , कीड़े मकोड़े और फर पतंगे पैदा हो जाते हैं, उसी तरह स्कूल खुलने पे असंख्य दल बन जाते। पिछले वर्ष के झगडे वैसे ही कम न थे ,स्कूल खुलने पे वे ताजे हो जाते। इसके इलावा बहुत से नए झगड़े आरम्भ हो जाते।

दशहरा और दिवाली की छुट्टी में ऐसा हमारे साथ भी होता था। मैं उत्तराखण्ड के पौड़ी शहर से आता हूँ तो उधर शरदोत्सव मनाया जाता है। ये उत्त्सव एक आध हफ्ते चलता है और रंगारंग कार्यक्रम अक्सर रात में ही होते हैं। बचपन में ऐसी जगह हम दोस्त लोग मिलकर जाते थे और दूसरे समूह के साथ अक्सर कुछ न कुछ हो जाया करता था। इसी चीज को 1959 में छपे उपन्यास में पढ़कर हैरत तो हुई ही लेकिन मज़ा भी आया।
इसके इलावा कृष्ण कुमार ने पहले खंड में अपने चार दोस्तों का भी नाम लिया है।मनोहर, दिनेश्वर, कृपाशंकर और दीनानाथ। इनके ब्यौरे भी बड़े दिलचस्प हैं। ज्यादा बेहतर यही रहेगा कि आप इन्हें उपन्यास में ही पढ़े। लेकिन यकीन जानिए उनके विषय में पढ़कर आपको लगेगा कि आपके आस पास आपने इन लड़कों की प्रतिलिपियों को जरूर देखा होगा।
फिर पहले खण्ड में समलैंगिकता को भी दर्शाया गया है। एक छात्र को दूसरे से मोहब्बत हो जाती है और वो बाकायदा उसे प्रेमपत्र तक देता है। भले से उसे दूसरा लड़का झिड़कता है लेकिन समलैंगिकता को इतनी साधारण तरीके से दर्शाना मुझे अच्छा लगा। उस लड़के के साथ आगे  क्या हुआ ये इसमें दर्शाया गया है। शायद दर्शाना चाहिए था।  
हाँ, बाकि किरदारों के समलैंगिकों के विषय में कुछ विचार मुझे कुछ पसन्द नहीं आये।जैसे कृपाशंकर एक बार ये कहता है:

छोटे और कमजोर लोगों को पा गए हो तो तंग कर रहे हो। जानते हो, कृष्णकुमार तुमको अपने बड़े भाई की तरह मानता था और अब भी मानता है। तुमको उसके साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए था? बहुत जोर फट रहा है तो मजबूत लड़कों से क्यों नहीं लड़ते? प्रेम-व्रेम ही करना है तो किसी लड़की से करो। तुममें सचमुच मर्दानगी है तो जाकर किसी की लड़की भगाओ।

अब यहाँ ये बात समझने योग्य है कि भले ही कृपाशंकर कृष्ण के पक्ष में बोल रहा था लेकिन मर्दानगी का लड़की भगाने से सम्बन्ध स्थापित करना ठीक नहीं था। खैर, चूंकि ये चौधह पंद्रह साल के लड़के थे तो ये अपने समाज में जो देख रहे थे उसी का अनुकरण कर रहे थे तो ये उस समाज  के प्रति टिपण्णी  है। वैसे  उस वक्त क्या आज भी कई जगह मर्दानगी की परिभाषा शायद यही होगी।
अगर दूसरे खण्ड की बात करें तो ये खण्ड काफी रोचक  था। उपन्यास का घटनाक्रम ऐसे वक्त में हो रहा है जब देश में आज़ादी की लड़ाई चल रही थी तो इससे कृष्ण और उसके दोस्त कैसे अछूते रह सकते  थे। वो बहुत संजीदगी से क्रांतिकारी बनना चाहते हैं लेकिन अपनी बालक बुद्धि से जो कार्य करते हैं वो पाठकों को गुदगुदाएंगे जरूर और उनके भोलेपन को  भी दर्शाएंगे। जरा इसे पढ़िए:

स्कूल खुल गया था। संभवतः रविवार का दिन था। आसमान में सुरमई रंग के बादल एकत्रित होकर स्याह हो रहे थे। किसी समय भी पानी बरस सकता था। लगभग दस बजे थे और मैं बाहर अपनी कोठरी में बैठा पढ़ रहा था कि मनोहर ने तेजी से आकर मुझको बाहर आने का संकेत दिया। उसकी गर्दन टेढ़ी थी, उसके सुअर- बाल हवा में उड़ रहे थे और उसके मुख पर अनोखी वीरता, विश्वास, रहस्यात्मकता तथा मूर्खता के भाव थे। मैंने फ़ौरन समझ लिया कि 'देश की स्वतंत्रता' के लिए किये जाने वाले हमारे ' आंदोलन' के हित में कोई अत्यंत ही महत्वपूर्ण घटना घटित हुई है।
ऐसे ही कई रोचक वर्णन और घटनायें इस खंड में हैं।
उपन्यास का तीसरा खण्ड उर्मिला के नाम है। उर्मिला कृष्णकुमार के पिताजी कि मित्र की बेटी है। किसी कारणवश वो उनके घर में रहने लगती हैं और कृष्ण को उनसे मोहब्बत हो जाती है। ये वाला खण्ड बाकियों से बहुत मार्मिक है। आपने कभी प्यार किया है तो आप इसे समझ पाएंगे। वो दुविधा की क्या वो हमारे तरफ भी वही  भावना रखती है जो हम उसके प्रति रखते हैं। उससे मिलने के लिये बहाने खोजना। वो सब इसमें मुझे इसमें मिला। 

उस रविवार को रात-भर मुझे ठीक से नींद नहीं आई। मैं अजीब अजीब सपने देखता रहा। दूसरे दिन सवेरे जब नींद खुली तो मेरा मन एक मीठी अकुलाहट से भरा था। पहले तो मेरी समझ में ही नहीं आया कि आखिर ऐसा क्यों है? किन्तु बाद में, जब कल की सारी बातें शुरू से आखिर तक याद पड़ने लगीं, तो सब कुछ स्पष्ट हो गया। 
मेरे घर में न मालूम मेरे किस भाग्य से परियों के देश से एक जादूगरनी आ गई थी और उसने अपनी जादू-भरी दृष्टि से मेरे मन को बाँध लिया था। क्या मैं उर्मिला को प्यार करता हूँ ? इस विचार के आते ही मेरे हृदय की गति तेज हो गई।  

लेकिन प्यार की राह कभी भी आसान नहीं रही है। जाती अक्सर हमारे बीच आ ही जाती है। इस खण्ड में मुझे कभी ख़ुशी भी मिली और दुःख भी महसूस हुआ। कई प्रेमी युगलों को कृष्ण और उर्मिला जैसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है।कई भाग जाते हैं, कुछ को मार दिया जाता है और कुछ अपने घुटने टेक देते हैं। अभी भी कुछ बदला नहीं है। आज भी परिस्थिति ऐसी ही है जैसी तब थी जब यह उपन्यास लिखा गया था। सोचने वाली बात है लगभग ६० सालों में हमारे समाज ने विकास किया है तो क्या विकास किया है ?

तीसरे खंड के बाद हम उपसंहार की तरफ जाते हैं जहाँ उपन्यास में आए हुए मुख्य किरदारों के जीवन किस दिशा में जाता है ये दर्शाया गया है। कृष्ण को भी अपने बारे में एक एहसास होता है और कहानी वहीं रोक दी जाती है। ये मुझे और आप छोड़ दिया गया है कि कृष्ण के आगे का जीवन उस एहसास के बाद कैसे बीता होगा। तो अगर आपने उपन्यास पढा तो बताना न भूलियेगा कि क्या आपके विचार से क्या हुआ होगा कृष्ण के साथ।

अंत में मैं केवल यही कहूँगा कि यह उपन्यास मुझे बहुत  पसन्द आया। मैंने इसे पढ़ा नहीं जिया है।  और शायद इसलिए ये मेरे मन के  काफी नज़दीक अपनी जगह बना पाया। पहले खण्ड को पढ़ते हुए मैंने विषाद (नास्टैल्जिया), दूसरे खण्ड को पढ़ते हुए रोमांच और बचपने की मासूमियत  और तीसरे खण्ड को पढ़ते हुए पहले प्यार होने का आनंद और उसको खोने का दुःख मैंने अनुभव किया। ऐसे कम ही उपन्यास होते हैं जो इतनी भावनायें एक साथ आपके मन में  जगाते हैं। मेरे लिये ये उनमे से एक उपन्यास था।
अगले वर्ष भी इस उपन्यास को जरूर पढूँगा। उसके इलावा अमरकान्त जी कि अन्य रचनाओं को तो पढ़ना ही है।
अगर आप हिन्दी के साहित्य में रूचि रखते हैं और  आपने इसे नहीं पढ़ा है तो जरूर पढियेगा। अगर पढ़ा है तो अपनी राय इधर दीजियेगा।
आप उपन्यास को निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं:

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