Sunday, January 4, 2015

एक म्यान दो तलवारें - नानक सिंह

रेटिंग : ३/५
उपन्यास ख़त्म करने की तिथि : दिसम्बर १७, २०१४

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट :पेपरबैक
पृष्ठ संख्या :३२६
प्रकाशक :यात्रा बुक्स ,पेंगुइन बुक्स
अनुवादक :कुलवंत सिंह सूरी
पुरस्कार : साहित्य अकादमी अवार्ड ,१९६१ (पंजाबी)



पहला वाक्य :
सामान भी तो नाममात्र को ही था उसके पास।

नानक सिंह जी को पंजाबी उपन्यास का जनक माना जाता है। उन्हें पढ़ने कि इच्छा मन में थी। उनका उपन्यास 'एक म्यान दो तलवार' के विषय में पता चला तो इसको झट से मैंने इसे खरीद लिया। नानक सिंह जी के इस उपन्यास की पृष्ठभूमि १९१३-१९१४ का भारत है।

यह उपन्यास कहानी है एक घर कि जिसमे दो परस्पर विरोधी विचार उत्पन्न हो रहे हैं और ये दोनों तलवार रुपी विचार उस म्यान रुपी घर में एक साथ नहीं रह सकते हैं। बाबा सुखदेव सिंह सोढीयों के खानदान के आखरी वंशज हैं। वे हिरणपुर सोढीयाँ में रहते हैं। माली हालत उनकी कुछ ख़ास नहीं है। उनके पास जायदाद के नाम पर बची है तो सिर्फ एक हवेली। ऐसे में गुरु जी को अपनी पुरानी साख वापस लाने का एक मौका दिखता है वो है अंग्रेजों की चमचागिरी। विश्वयुद्ध चल रहा है और अंग्रेजी सरकार को रंगरूट और दौलत चाहिए। सुखदेव सिंह दौलत में भले ही मदद न कर सके लेकिन रंगरूट भर्ती कराने में वे अव्वल रहना चाहते हैं। उन्हें याकीन है कि अगर वो अंग्रेजों को खुश करने में सफल हुए तो अंग्रेजी सरकार खुश हो कर उन्हें जमीन और दौलत से नवाजे गी। लेकिन वो एक बात से अनभिज्ञ हैं। उनके घर में उनके सिवा उनकी एक बेटी रघुबीर 'बीरी'  और एक लड़का सुदर्शन है। उन दोनों  के सिध्दान्त अपने पिता के सिद्धांतों से एक दम अलग हैं। वे अंग्रेजो की गुलामी पसंद नहीं करते हैं और देश को अंग्रेजी हुकूमत से आज़ादी दिलाने का सपना देखते हैं। लेकिन वो इस काम को अपने पिता को दुःख दिए बिना करना चाहते हैं। अब इन दो परस्पर विरोधी विचारों के मनुष्यों का आपसी टकराव निश्चिन्त है। क्या होगा इनके टकराव का नतीजा ? क्या उनका घर इस टकराव में बिखर जाएगा? क्या सुखदेव सिंह अपने बच्चों के विचारों को समझ पायेंगे या वे उन्हें दूसरों की तरह गद्दार करार दे देंगे?ये जानने के लिए तो आपको इस पुस्तक को पढ़ना पड़ेगा।




'एक म्यान दो तलवारें (Ek myan do Talwarein)' एक ऐतिहासिक उपन्यास है। उपन्यास का मकसद एक ऐसे दल के विषय में लोगो को बताना है जिसे आज़ादी के इतिहास में वो जगह नहीं मिली जो मिलनी चाहिए थी। उपन्यास १९१४-१९१५ की पृष्ठभूमि में रचा गया है तो उपन्यास इस समय के समाज का चित्रण भी बखूबी करता है। उपन्यास की कहानी पंजाब (आज़ादी पूर्व) और उसके आस पास के इलाकों में मूलतः घटित होती है। इस उपन्यास को पढ़कर पाठक को उस वक़्त के माहोल के विषय में पता चलता है।

जैसा की मैंने पहले भी कहा था लेखक ने इस उपन्यास की रचना को ग़दर पार्टी के द्वारा रचे गयी क्रांति और उस क्रांति का क्या परिणाम हुआ ये अवगत कराने के लिए किया गया है। इस पूरी क्रांति के  सूत्रधार करतार सिंह साराभा जी थे जिनको ये उपन्यास समर्पित किया गया है। उपन्यास को पढ़कर पाठक को उनके संघर्ष के विषय में पता चलता है जो कि देश सेवा के लिए उन्होंने और ग़दर पार्टी ने किया।

उपन्यास का विषय तो बहुत अच्छा लगा। ऐसा भी नहीं है कि कहानी में कुछ कमी है। लेकिन एक चीज़ थी जो मुझे खली। कहानी की शुरुआत में पाठक की मुलाकात दयाला नाम के किरदार से होती है। दयाला के विषय में काफी विस्तृत तरीके से बताया गया तो मुझे लगा उसका कहानी में एक महत्वपूर्ण किरदार होगा। लेकिन ऐसा कुछ न निकला। कहानी फिर सुखदेव सिंह के परिवार की तरफ चली गयी। इससे आधी कहानी तक तो मैं ये सोचता रहा कि दयाला का क्या हुआ और मुख्य कहानी में वो कब आएगा। दूसरा क्यूंकि ये ऐतिहासिक उपन्यास है तो नानक सिंह जी ने इसमें पंजाब में गुरुडम के हाल, ग़दर पार्टी और अन्य चीज़ों के विषय में  बताया है। इन चीज़ों ने उस वक़्त के माहोल को जानने में मेरी मदद तो की लेकिन कभी कभी मुझे लगा मुख्य कहानी के प्रवाह को इन्होने थोडा धीमा कर दिया। बस यही दो चीजें थी जो मुझे थोड़ा खटकी।

बाकि, उपन्यास मुझे पसंद आया। क्या आपको ये उपन्यास पढ़ना चाहिए? हमारी आज़ादी की लड़ाई में कई लोगों ने बलिदान दिया और वो इतिहास के पन्नो में दर्ज भी न हो पाए। मैं मानता हूँ की हर देश वासी को अपने देश के इतिहास के विषय में पता होना चाहिए ताकि वो इस बात से अवगत रहे कि जिन चीजों का वो इस्तेमाल कर रहा है उसको हासिल करने के लिए हमारे पुरखों ने कितना त्याग किया। ऐसे में हमारे इतिहास में कुछ गिने चुने लोगों का ही नाम आया है।  और कई लोगों के नाम गुमनामी के अँधेरे में डूब गये। मैंने अपने इतिहास की पढाई में ग़दर पार्टी या करतार सिंह सराभा के विषय में शायद ही पढ़ा था। लेकिन अब मुझे करतार सिंह साराभा और ग़दर पार्टी के विषय में पता है जिन्होंने ऐसे वक़्त में आज़ादी की लड़ाई शुरू की थी जब देश गुलामी को एक सुखद शासन मानकर सो रहा था। तो अगर आप भी ऐसा साहित्य पढने का रुझान रखते हैं तो आपको इसे ज़रूर पढ़ना चाहिए।

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