मित्रो मरजानी - कृष्णा सोबती

रेटिंग: ३/५
उपन्यास ख़त्म करने की तारीक: ११ दिसंबर,२०१४

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : ९९
प्रकाशक : राजकमल पेपरबैक्स

मित्रो मरजानी ( Mitro Marjani) कृष्णा सोबती (Krishna Sobti) जी की लिखी हुई एक दीर्घ कहानी है। कहानी एक निम्न मध्यम वर्गीय संयुक्त पंजाबी परिवार में घटित होती है । गुरुदास लाल के तीन बेटें हैं बनवारी लाल. सरदारी लाल और गुलजारी लाल। इन तीनो भाइयों की शादी हो चुकी है और गुरुदास लाल की तीनो बहुओं के नाम निम्न हैं : सुहागवन्ती  , समित्रावन्ती और फूलवन्ती। तीनों बहुओं में समित्रा यानी मित्रो एक बेबाक स्त्री है। वो कुछ भी कहने में शर्माती नहीं है। सरदारी लाल उसको दाम्पत्य सुख देने में असमर्थ है। ऐसा नहीं है कि उसमे कुछ खराबी है लेकिन जितना मित्रो को चाहिए उतना वो नहीं दे पाता है। इसी कारण मित्रो उसपे फब्तियाँ कसती है। सरदारी लाल को जब पता लगता है कि मित्रो उसके दोस्तों के साथ ज्यादा उठती बैठती है तो उस उस पर शक हो जाता है और वो उसे मारने लगता है। इस समय सरदारी की माँ आकार सरदारी से बहु को छुड़ा लेती है। आगे क्या होता है ? ये जानने के लिए आपको ये कहानी ही पढ़नी पड़ेगी।



मित्रो एक तेज तर्रार औरत है। ऐसा नहीं है कि वो खराब है । वो एक संयुक्त परिवार में रहती है और जब उसे लगता है कि उसकी देवरानी उसकी सास और जेठानी से बेतरतीब पेश आ रही है तो वो उसे आड़े हाथों लेती है।

फूलाँ ने मँझली को परखा-तोला, फिर मिन्नत मोहताजी से कहा - बहना, जब लौटाने वाली  लौटाती है तो बीच में कूदने वाली तुम कौन?
मँझली  ने हाथ फैलाया - मैं तेरी जमदूती बस! तूने सास से टक्कर ली मैंने माना, पर जिसकी तू जूती बराबर भी नहीं अब उसकी इज्जत उतारने चली है? अरी, चुपचाप यह गहने अन्दर डाल ले, नहीं तो उनसे भी जायगी। 

जब उसे पता लगता है कि सरदारी लाल को पैसे की ज़रुरत है तो वो उसे अपने पैसे देने में भी नहीं हिचकिचाती है।

सुनकर एक बार तो जी हुआ, घरवाले को एक करारी सुना कर चित कर दे, पर ज़बान पर काबू पा मित्रो बोली - महाराज जी, न थाली बाँटते हो. न नींद बाँटते हो, दिल के दुखड़े ही बाँट लो। 

मित्रो ने एडियाँ उठा पड़छत्ती पर से टीन की संदूकची उतारी। ताली लगा लाल  पट्ट की थैली निकाली और घरवाले के आगे रख बोली-यह दमड़ी दात परवान  करो लाल, जी ! कौन इस नाँवें के बिना मित्रो की बेटी कँवारी रह जायेगी ?

मित्रों एक ऐसे मर्द के साथ बियाही है जो उसकी शारीरक ज़रुरत को पूरी करने में असमर्थ है और वो इसी खीज को अपनी फब्तियों द्वारा व्यक्त करती है।

बनवारी ने एक और छोड़ी - जो सच भी है और झूठ भी , सरदारी की बहु, कचहरी के मुकदमेवाली यह तेरी कैसी मिसल?
सरदारी की बहु को मुँह मांगी मुराद मिल गई । कटोरी सी दो आँखें नचाकर कहा - सोने सी अपनी देह झुर-झुरकर जला दूं या गुलजारी देवर की न्याई सुई-सिलाई के पीछे जान खपा लूँ? सच तो यूँ , जेठ जी, कि दीन-दुनिया बिसरा मैं मनुक्ख की जात से हँस खेल लेती हूँ। झूठ यूं की खसम का दिया राजपाट छोड़ी मैं कोठे पर तो नहीं जा बैठी । 



एक तरफ तो इस कहानी में मित्रो जैसा किरदार है । ऐसे समाज में जब औरत को अपना जीवन साथी तक चुनने का अधिकार नहीं दिया जाता और अगर औरत सेक्स के बारे में रुचि दिखाती है तो उसके चरित्र  को दूषित समझा जाता है उस समाज में मित्रो सीना ठोक कर अपनी जरूरतों  को व्यक्त करती है । उसे अपमान तो झेलना पड़ता है लेकिन अपने बेबाकीपन से वो ये सब झेल जाती है।

मित्रो पहले तो सास को घूरती रही।  फिर पलत्थी मार नीचे बैठ गयी और मुंडी हिला-हिला बोली - भिगो-भिगोकर और मारो , अम्मा! पाँच-सात क्या, मेरा बस चले तो गिनकर सौ कौरव जन डालूँ, पर अम्मा, अपने लाडले बेटे का भी तो आड़तोड़ जुटाओ ! निगोड़े मेरे पत्थर के बुत में भी कोई हरकत तो हो !
धनवंती के बदन पर काँटें उग आये। 
-छिः-छिः बहू ! ऐसे बोल-कुबोल नहीं उचारे जाते !- फिर बनवारीलाल की बात का ध्यान कर समझाया- बेटी, ऐसे दिल छोड़ने की क्या बात है ? सौ जंतर-मंतर, टोने-टोटके , फिर जब मेरी बहू की साकखयात शक्ति...
मित्रो हि-हि हँसने लगी- अम्मा, मैं तो ऐसी देवी कि छूने से पहले ही आसन विराज जाऊँ, पर भक्त बेचारा तो ....

 खबरदारी की अँगुली दिखा कर सुहाग ने बड़ी कड़वी आँख से तरेरा- सरदारी देवर देवता पुरुख है, देवरानी! ऐसे मालिक से तू झूठ मूठ का ब्यौहार कब तक करेगी ? यह राह-कुराह छोड़ दे, बहना। एक दिन सबको उस न्यायी के दरबार में हाज़िर होना है !
मित्रो ने सदा की तरह आँख नचाई-काहे का डर? जिस बड़े दरबारवाले का दरबार लगा होगा, वह इंसाफी क्या मर्द-जाना न होगा ? तुम्हारी देवरानी को भी हाँक पड़ गई तो जग-जहान का अलबेला गुमानी एक नज़र तो मित्रो पर भी डाल लेगा !

वहीँ दूसरी तरफ इस कहानी में एक संयुक्त परिवार में अक्सर होने वाले झगड़ों को दर्शाया गया है । एक तरफ तो सुहाग है जो कि हर तरफ से एक ऐसी बहु है जिसकी कल्पना एक सास कर सकती है वहीँ दूसरी तरफ फूलवन्ती है जो एक दम विपरीत है।  और अंत में ये होता है कि गुलजारी और उसकी बीवी परिवार से अलग हो जाते हैं जो कि अकसर ही संयुक्त परिवार में देखने को मिलता है। इस कहानी के माध्यम से कृष्णा जी ने एक संयुक्त परिवार  के माहोल का भी सटीक चित्रण किया है।

कहानी मुझे पसंद आई। सचमुच मित्रो एक अपने तरह का किरदार है।  हिंदी साहित्य को मैंने इतना तो नहीं पढ़ा लेकिन जीतना भी पढ़ा है उसमे ऐसा किरदार नहीं देखा। आप मित्रो को चाहने लगते हैं उसकी बेबाकी के लिए, उसके अच्छेपन  के लिए और उसकी मुश्किलों को समझने की कोशिश भी करते हैं।

मुझे जो बात खली वो इसका अंत था। अगर मित्रो सरदारी को छोड़ कर चली जाती तो शायद वो उसके चरित्र के अनुरूप होता।  लेकिन खाली अकेलेपन के डर से उसका सरदारी के साथ रहने का समझोता करना मुझे नहीं कुछ रास नहीं आया और अटपटा सा लगा।

खैर, मुझे लगता है हर किसी को ये कहानी पढनी चाहिए।  १९६७ में ये पहली बार प्रकाशित हुई थी और उस समय के हिसाब से ये काफी बोल्ड रही होगी।  आपने अगर ये कहानी पढ़ी है तो आपके इसके विषय में क्या विचार है ?? ये कहानी अंग्रेजी में To, hell with you Mitro नाम से प्रकाशित हुई है।  आप अगर अंग्रेजी में पढ़ना पसंद करते हैं तो इसका अंग्रेजी संसकरण भी मंगवा सकते हैं।

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