Thursday, March 6, 2014

अरेबा -परेबा - उदय प्रकाश

finished on: मार्च २ ,२०१४ 
रेटिंग - ४ /५



अरेबा - परेबा   उदय  प्रकाश  जी का कहानी संग्रह  है ।  इसमें निम्न ११ रचनायें  को संगठित करके पाठकों  के समक्ष प्रस्तुत  किया गया है।
१) डिबिया २.५/५
२)  नेलकटर ५ /५
३) अपराध १ /५
४) सहायक ३ /५
५) अभिनय २ /५
६) नौकरी ४ /५
७) छत्रियां   ३/५
८) छप्पन तोले की करधन ३.५/५
९) अरेबा- परेबा ३/५
१०) पॉल गोमरा का स्कूटर  ५/५
११) दिल्ली ३.५/५
१२) और अंत में प्रार्थना ५/५

इस संग्रह की कहानियों  को दो भागों में बांटा जा सकता है-
एक भाग में वे कहानियां जो की बचपने की मासूमियत को झलकाती हुई हैं और एक सेंसेटिव बच्चे की फीलिंग्स को बयां करती हैं। इसमें हम निम्न कहानियों को इन्क्लुड कर सकते हैं ।

डिबिया में लेखक अपनी मासूमियत और बचपन के विश्वास को नहीं खोना चाहता है।'नेलकटर ' में बड़ी ही खूबसूरती से दर्शाया है कि किस तरह  जब व्यक्ति चले जातें है तो हम उनसे जुडी हुई वस्तुओं से ही उनके पास होने का एहसास पाते हैं ।

'सहायक' में भी एक बच्चे की दृष्टी से कहानी बताई गयी है जिसमें ये अहसास उसे होता है की  ज्यादातर व्यक्ति केवल मूक दर्शक होते हैं दूसरो के दुःख के।और जो आदमी सबकी सहायता करने को  था,जब उसे सहायता कि ज़रुरत पड़ी तो कोई भी उनकी मदद को नहीं आया , सब केवल देखते ही रहे।
 'छत्रियां' में किशोर मन की लालसाओं का चित्रण है, और कहानी की मासूमियत कैसे एक ऐसा मोड़ ले लेती है कि वह समाज में फहले हुए वहशीपन का एक प्रतिबिम्ब दिखती है ।

 छप्पन तोले की करघन  भी एक बच्चे द्वारा अपने घर का वृत्तांत ही है। जिसमें अपनी बूढी दादी के प्रति वह परिवार के बाकी सदस्यों का जब वो रवय्या देखता है तो उसके मन और खुद के रवय्ये  में कैसा बदलाव आता है, इसी को दर्शाया गया है।

और अंत में अरेबा परेबा कहानी है। जिसमें एक बच्चे का एक दिन का वाक्या  है, जिसमें में कुछ पाता है लेकिन जब वो उसे खो देता है तो उसकी माँ किस तरह से उसे समझाने का प्रयत्न करती हैं।

संग्रह की दुसरे भाग में हम बाकी की कहानियों को इन्क्लुड कर सकते हैं कहानियां जो समाज में फैले हुए भ्रष्टाचार, पाश्चात्य संस्कृति के पीछे अंधी दौड़, और सरकारी महकमें के काम करने की प्रणाली को दर्शाता है।
'नौकरी' में वो हमारे संस्थानो  कि कार्यप्रणाली को दर्शाते है , जिसमें महापंडित राहुल को अपने ही रचनाओं के अध्यन के लिए बने संसथान में इसलिए नौकरी नहीं मिलती क्यूंकि वो इसके लिए क्वालिफाइड नहीं समझे जाते है।
'पॉल गोमरे  का स्कूटर ' एक ऐसे कवी कि कहानी है जो समय के बदलाव कि तेजी से अपने को बदलने में  कहीं पिछड़ जाता है ।  और जब वह ऐसी कोशिश भी करता है तो सफलता उसे कम ही हासिल होती है।  इसमें पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव और इस प्रभाव में अपने को बदलने कि होड़ को लेखक पॉल गोमरे  के रूप में दर्शाते हैं।
 
'ऐसा नहीं था की वे नाकारा या अयोग्य थे । वे घनघोर परिश्रमी थे । प्रूफरीडिंग, सबिंग और लेआउट का काम भूत की तरह करते थे । इतिहास का उन्हें अपार ज्ञान था। लेकिन वर्तमान उनकी समझ  में नहीं आता था। बहुत पर्यत्न पूर्वक एकाग्रचित होकर वे कभी- कभार वर्तमान को समझने का  पर्यत्न करते , तब तक वह बदल जाता था। '

और उनकी आखरी कहानी 'अंत में प्रार्थना' जो डॉ दिनेश मनोहर वाकणकर का परिचय।  दिनेश एक ऐसे व्यक्ति हैं जो अपना काम बड़ी मेहनत और पूरी तन्मयता के साथ करना चाहते हैं पर सिस्टम उन्हें ये भी नहीं करने देता । 

इस संग्रह को पढ़के  काफी कुछ सोचने पे मजबूर हो गया था में ।  उदय प्रकाश जी के मोहन दास  ले बाद ये दूसरी रचना है जो मैंने पढ़ी है और आगे भी उनकी रचनाओ को  पढ़ता  रहूंगा इसकी आशा है । इस पुस्तक में शुरुआत में ही लिखा है कि उदय जी एक नए उपन्यास पे काम कर रहे हैं, तो मेरी यही आशा है कि जल्द ही उसे पढ़ने का मौका मिलेगा।  ये एक उम्दा कलेक्शन  है और मैं चाहूंगा सभी इसे पढ़ें ।

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