एक बुक जर्नल: ऑनर किलिंग - वेद प्रकाश शर्मा

Thursday, March 21, 2019

ऑनर किलिंग - वेद प्रकाश शर्मा

उपन्यास के मार्च 4 2019  से मार्च 20,2019 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 306
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स
आईएसबीएन : 9789332427068


ऑनर किलिंग - वेद प्रकाश शर्मा
ऑनर किलिंग - वेद प्रकाश शर्मा


पहला वाक्य:
"ये इस दुनिया की सबसे अद्भुत लड़की है योर ऑनर।"

तरांडी गाँव में अपनी परम्पराओं,अपने उसूलों का बहुत ख्याल रखा जाता था। वहाँ केवल गाँव का क़ानून चलता था। परम्परा तोड़ने वालों को आसानी से बख्शा नहीं जाता था।

ऐसी ही एक परम्परा के अनुसार तरांडी गाँव में लड़कियों को अपनी बिरादरी से बाहर प्यार करने की इजाजत नहीं थी। और जो भी प्रेमी युगल इस लक्ष्मण रेखा को लाँगने की कोशिश करते उसको गाँव वाले एक ही सजा देते।

सजाये मौत।

ऐसे में काजल के ज़िन्दगी में कपिल आया। और फिर जो न होना था वो हो गया।

न चाहते हुए भी काजल और कपिल में मोहब्बत हो गई। काजल ने भी फैसला कर लिया कि वो जियेंगे तो साथ और मरेंगे तो साथ।

लेकिन फिर जो आगे हुए उसके विषय में तो काजल ने कभी सोचा ही नहीं था।

और अब काजल कोर्ट के सामने खड़ी, कोर्ट से न्याय की भीख माँग रही थी।

आखिर क्या हुआ था काजल के साथ? 
वो कोर्ट के सामने क्यों आई थी? 
क्या हिंदुस्तान की न्याय पालिका उसकी मदद कर पाई? 
काजल और कपिल के प्रेम का क्या हुआ? 
क्या वो गाँव के कानून को धता बताकर अपने प्रेम को पूरा करने में कामयाब हो पाये?

ऐसे ही कई प्रश्नों के उत्तर आपको इस उपन्यास को  पढ़ने को मिलेंगे।


मुख्य किरदार:
हरिया - तरांडी गाँव में मौजूद एक व्यक्ति
अमर और आरती - एक प्रेमी युगल जिसे तरांडी गाँव वालों ने प्रेम की सजा दी थी
व्योम बालियान - तरांडी गाँव में तैनात एक पुलिस ऑफिसर
जरासंध - तरांडी गाँव का सरपंच
काजल - जरासंध की बेटी
योगिता - जरासंघ की पत्नी
कुक्कू - तरांडी गाँव का एक युवक जो काजल से ब्याह करना चाहता था
कपिल - एक फोटोग्राफर जो कि शेर की तलाश में तरांडी गाँव आया था
शेर सिंह - कपिल का दोस्त
बलवंत सैनी - मुंबई पुलिस में एक डीएसपी
भूपचंद - बलवंत सैनी का पी आर ओ
राजीव शर्मा - पुलिस का एक सब इंस्पेक्टर
रमेश पुष्कर - एक वकील
कमला जोशी - राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य
सम्पदा - मुंबई डीएसपी की बेटी

मेरे विचार:
ऑनर किलिंग वेद प्रकाश जी का एक सामाजिक उपन्यास है। वैसे इस उपन्यास को मैंने खरीद तो काफी पहले लिया था लेकिन अब पढने का मौक़ा लगा है।

वेद जी को जो पढ़ते हैं वो जानते हैं कि वेद जी न केवल अपने उपन्यासों के शीर्षक के लिए मशहूर थे बल्कि अपने उपन्यासों के विषयों के लिए भी वो खासे मशहूर थे। वो समाज से रोचक,आकर्षक विषय उठाकर उसके अनुरूप अपने कथानक बैठाने में माहिर थे। इस कारण पाठक बरबस ही उनके उपन्यासों के तरफ आकर्षित हो जाता था। इस शीर्षक ने भी मेरे मन में कोतुहल पैदा किया था और यही कारण है कि उस वक्त मैंने उपन्यास खरीद कर रख दिया था।

बहुत दिनों से वेद जी का लिखा कुछ पढ़ना चाह रहा था तो सोचा क्यों न इसे पढ़ लिया जाये।  अक्सर वेद जी के उपन्यास भागों में बंटे रहते हैं और मेरे पास कोई न कोई भाग मौजूद नहीं रहा है।  ऐसा मेरे साथ कई बार(कुबड़ा, डायन,लाश कहाँ छुपाऊँ) हो चुका है। और यही कारण रहता है कि कुछ कहानियाँ मैंने अधूरी ही पढ़ी हैं। उनके दूसरे भाग ढूँढने पर भी नहीं मिलते हैं और फिर वह अधूरी ही रह जाती हैं। एकल उपन्यासों में कम से कम यह समस्या नहीं आती है। चूँकि यह एक एकल उपन्यास है तो इसके साथ भाग वाली समस्या नहीं थी और इस कारण भी इसे पढ़ने के लिए चुना।

उपन्यास के ऊपर बात करने से पहले मैं ऑनर किलिंग के ऊपर बात करना चाहूँगा।

ऑनर किलिंग समाज में फैली एक ऐसी कुप्रथा है जहाँ लोग अपने परिवार के लोगों को केवल इसलिए मौत के घाट उतार देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उन परिवारजनों के कृत्यों से उनके परिवार की इज्जत धूमिल हुई है। और उन जाहिलों की यह सोच रहती है कि परिवार के इस धूमिल इज्जत को वो केवल उन परिवारजनों के खून से धोकर ही मिटा सकते हैं। और उन परिवारजनों का कत्ल क्यों होता है? अक्सर यह प्यार के वजह से होता है। हमारे समाज में आज भी युवाओं को अपने प्रेमियों को चुनने की आज़ादी कई जगह पर नहीं है।

 इसके पीछे जातिगत, धार्मिक  दम्भ भरा होता है। एक जाति वाले या धर्म वाले दूसरे जाति या धर्म  के युवकों/युवतियों  से अपने बेटे/बेटियों को सम्बन्ध को पचा नहीं पाते हैं और फिर अक्सर उन्हें मौत के घाट उतारने में भी बाज नहीं आते हैं।

ऑनर किल्लिंग का एक सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए लेकिन यह हमारे लिए शर्म की बात है कि ऐसा होता है। उम्मीद है आगे आने वाली पीढ़ी को इस कुप्रथा से निजाद मिल जायेगा और हर किसी को अपने जीवन साथी को चुनने की आजादी होगी।

अब उपन्यास की बात करते हैं तो उपन्यास की मुख्य किरदार काजल है।  काजल एक ऐसे गाँव से आती है जहाँ बाहरी आदमी से प्यार की सजा मौत है। उसने प्यार किया लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसने की उसे अदालत के दरवाजे खटखटाने के लिए मजबूर कर दिया।

आखिर काजल के साथ क्या हुआ ? यह हमे काजल की जबानी पता चलता है। यही वह हिस्सा है जिससे इस उपन्यास का शीर्षक निकला है। हमे गाँव के हालात पता चलते हैं, उधर मौजूद लोगों के रवैये का पता चलता है और काजल की ज़िन्दगी में क्या होता है और क्यों होता है इसका पता चलता है।

बेकफ़्लैश की कहानी रोचक और पठनीय है। इसमें कई मजेदार प्रसंग भी हैं। कुश्ती और बेक फ़्लैश में कपिल के कई प्रसंग हँसी लाते हैं।

बेकफ़्लैश की समाप्ति के बाद कहानी फिर वर्तमान समय में आती है। यहाँ कहानी में घुमाव आता है। एक मुख्य किरदार कुछ इस तरह से हरकत करने लगता है कि पाठक के रूप में आप थोड़े कंफ्यूज हो जाते हो। वह ऐसी हरकत क्यों कर रहा है यह जानने के लिए आप उपन्यास पढ़ते जाते हो। कहानी के इस हिस्से में काफी मोड़ आते हैं। और अंत तक रोचकता बरकरार रहती है।

 मूलतः यह एक फ़िल्मी उपन्यास है। इसका मुख्य मकसद मनोरंजन है। इसलिए कई बार कहानी में कुछ चीजें अतार्किक भी हैं। जैसे आखिर में कुछ लोग जिन्हें कत्ल के इल्जाम में पुलिस ने पक्के सबूतों के साथ पकड़ा था वो छोड़ दिये जाते हैं। ऐसा क्यों होता है और वो तभी छोड़े जाते हैं जब अगले दिन कहानी में एक मोड़ आना होता है। कहानी में एक शेर का जिक्र है जिसके विषय में पता चलता है कि वो एक आदमी था जिसने शेर की खाल पहनी थी। अब इसी उपन्यास में उस शेर के पीछे लोग घोड़े ने जाते हैं और उसे पकड़ नहीं पाते हैं। यह सोचने वाली बात है कि खाल पहने आदमी घोड़े से तेज कैसे भाग सकता है। लेकिन यह सब बातें ऐसी हैं जिन्हें ऐसे उपन्यास पढ़ते वक्त नजरंदाज करेंगे तो ही इस उपन्यास का लुत्फ़ ले पाएंगे।

उपन्यास का अंत भी काफी फ़िल्मी है। काफी बड़ा एक्शन सीन है। उपन्यास किस तरह अंत होगा इसका अंदाजा तो मुझे हो गया था और वह अंदाजा मेरा थोड़ा बहुत ठीक भी निकला। परन्तु उपन्यास का अंत फ़िल्मी और क्लिशेड होते हुए भी भावुक कर देता है।

हाँ, उपन्यास में कुछ हिस्से ऐसे हैं जिन्हें हटाया जा सकता था। उन्हें देखकर लगता है कि वो केवल पृष्ठ संख्या बढ़ाने के काम लाये गये हैं। उपन्यास में एक नकली नोट वाला प्रसंग है, जो कि दस पृष्ठों तक फैला हुआ है,वो न भी होता तो कहानी में कोई फर्क नहीं पड़ना था। ऐसे ही उपन्यास में काजल जो कहानी सुनाती है वो 170 पृष्ठों तक जाती है।  यह हिस्सा भी छोटा हो सकता था।  इधर से कुछ अनावश्यक प्रसंग हटाए जा सकते थे। अभी उपन्यास 312 पृष्ठों का है लेकिन मुझे लगता है कि कुशल सम्पादन से इसे 270 तक तो आसानी से लाया जा सकता था। यह होता तो कहानी में और कसावट होती।

अंत में यही कहूँगा कि उपन्यास पठनीय है और एक बार पढ़ा जा सकता है। यह मनोरंजन के लिए लिखा गया उपन्यास है और उसी तौर पर देखा जाना चाहिए। अगर शीर्षक के कारण इससे इतर  अपेक्षा लगाकर इसे पढेंगे
तो निराशा हो सकती है।
अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।

मेरी रेटिंग: 2.5/5

अगर आपने इस नहीं पढ़ा है तो आप इसे निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं:
पेपरबैक

वेद प्रकाश शर्मा जी के मैंने दूसरे उपन्यास भी पढ़े हैं। उनके प्रति मेरी राय आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
वेद प्रकाश शर्मा

हिन्दी पल्प साहित्य के दूसरे उपन्यासों के प्रति मेरी राय आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
हिन्दी पल्प फिक्शन

4 comments:

  1. वेद प्रकाश के उपन्यासों में रोचकता और प्रवाह लाजवाब होता है । आभार उनके उपन्यास के इस परिचय के लिए । जासूसी उपन्यास होता तो शायद आपकी समीक्षा की रेटिंग बेहतर होती ।

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    1. जी उपन्यास की कमी जासूसी न होना नहीं थी। उपन्यास में कुछ जगह अनावश्यक खिंचाव था जिस कारण गति की कमी आई। कई जगह ऐसी चीजें थी जिनका कोई तर्क नहीं था। उपन्यास के अंत का अंदाजा भी आसानी से हो जाता है क्योंकि वैसा अंत या वैसे किरदारों का अंत कई फिल्मों में दर्शाया गया है। मुझे लगा था कि कुछ नया होगा। उपन्यास का शीर्षक समाज में मौजूद एक कुप्रथा के ऊपर जरूर है लेकिन उपन्यास के आधे में यह चीज गौण हो जाती है। ऐसे में यह लगता है जैसे शीर्षक केवल उसको भुनाने के लिए रखा गया था जो मुझे ठीक नहीं लगा।

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  2. ऑनलाइन पढ़ सकते हैं क्या

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    1. मैं उपन्यास खरीद कर ही पढ़ता हूँ। लेखक का उपन्यास बिकेगा नहीं तो वो लिखेगा ही क्यों??

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