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Monday, January 11, 2021

अपनी अपनी बीमारी - 1- हरिशंकर परसाई

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: ई बुक | एएसआईएन: B01N3L3FYJ | प्रकाशक: राजपाल एंड संस | पृष्ठ संख्या: 128
किताब लिंक:  पेपरबैक | किंडल

अपनी अपनी बीमारी - हरिशंकर परसाई | समीक्षा

'अपनी अपनी बीमारी' हरिशंकर परसाई के इक्कीस व्यंग्य लेखों का संग्रह है। चूँकि संग्रह में इक्कीस लेख हैं तो पोस्ट बड़ी हो जायेगी इसलिए मैंने इस पोस्ट को भागों में विभाजित कर दिया है। पहले भाग में शुरुआत के ग्यारह लेखों के विषय में बात की है और दूसरे भाग में बाद के दस लेखों के विषय में बातचीत की है। संग्रह में मौजूद शुरूआती लेख निम्न हैं:

अपनी अपनी बीमारी 
पहला वाक्य:
हम उनके चंदा माँगने गये थे।

जब लेखक चंदा माँगने एक धनाढ्य व्यक्ति के यहाँ गये तो उस व्यक्ति ने अपनी परेशानियाँ लेखक और लेखक के साथी को बतानी शुरू की। 

आखिर उस धनाढ्य व्यक्ति की क्या परेशानी थी? 

हर तबके के लोगों की अपनी अपनी अलग अलग परेशानियाँ होती हैं। लेकिन कई बार उच्च वर्ग के लोग ऐसी चीजों को अपनी परेशानी बताने लगते हैं जो कि हास्यास्पद होती हैं वहीं उनकी संवेदनहीनता को भी दर्शाती हैं। इसी के ऊपर लेखक इस लेख में व्यंग्य करते दिखते हैं। रोचक आलेख है। 

व्यंग का कुछ हिस्से जो मुझे पसंद आये:
चंदा माँगने वाले  और देने वाले एक दूसरे की शरीर की गंध बखूबी पहचानते हैं। लेने वाला गंध से जान लेता है यह देगा कि नहीं। देने वाला भी माँगनेवाले के शरीर की गंध से समझ लेता है कि यह बिना लिए टल जाएगा या नहीं।

इस देश में कुछ लोग टैक्स की बीमारी से मरते हैं और काफी लोग भुखमरी से। टैक्स की बीमारी की विशेषता यह है कि जिसे लग जाए वह कहता है - हाय, हम टैक्स से मर रहे हैं और जिसे न लगे वह कहता है - हाय, हमें टैक्स की बीमारी ही नहीं लगती। कितने ही लोग हैं जिनकी महत्वाकांक्षा होती है कि टैक्स की बीमारी से मरें, पर मर जाते हैं,  निमोनिया से।

अपनी बेईमानी प्राणघातक नहीं होती, बल्कि संयम से साधी जाए तो स्वास्थ्यवर्द्धक होती है। 

तरह तरह के संघर्ष में तरह-तरह के दुःख हैं। एक जीवित रहने का संघर्ष है और एक सम्पन्नता का संघर्ष है। एक न्यूनतम जीवन-स्तर न कर पाने का दुःख है, एक पर्याप्त सम्पन्नता न होने का दुःख है।

पुराना खिलाड़ी 
पहला वाक्य:
सरदार जी जबान से तंदूर को गर्म करते हैं।

वह पुराना खिलाड़ी था। जिन सरदार जी के यहाँ लेखक खाना खाने जाते थे वह लेखक को आगाह करते रहते थे। लेकिन लेखक को समझ नहीं आया कि वह क्या खेलता था। समझ आया भी तो तब जब वह उसके खेल में पूरी तरह फँस चुका था।
आखिर क्या था पुराने खिलाड़ी का खेल?

देश के नाम पर, धर्म के नाम पर अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले कई लोग मौजूद हैं। वह दर्शाते तो यह हैं कि वह बड़े चिंतक है, समाजसेवी हैं लेकिन असल में वह अपने स्वार्थों की सिद्धि में ही लगे रहते हैं। इस लेख के माध्यम से लेखक ने ऐसे ही प्रवृत्ति वाले लोगों पर कटाक्ष किया है। 

कई बार देखने में आता है कि ऐसे लोग या तो अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं या अपनी अराजक गितिविधियों को देश प्रेम या धर्म के नाम पर करते जाते हैं क्योंकि इन्हें पता है कि जो चोला इन्होने धारण किया है उस चोले पर ऊँगली उठाने की जुर्रत कोई करेगा तो उसे सीधा धर्म या देश पर ऊँगली उठाते हुए बताया जा सकता है। विचारणीय लेख।

लेख के कुछ अंश जो मुझे पसंद आये:
जो देश का काम करता है, उसे थोड़ी बदतमीजी का हक है। देश-सेवा थोड़ी बदतमीजी के बिना शोभा ही नहीं देती। थोड़ी बेवकूफी भी मिली हो, तो और चमक जाती है।

वह दरी पर बैठा था। उसका चेहरा सौम्य हो गया था। भूख से आदमी सौम्य हो जाता है।

समय काटनेवाले 
पहला वाक्य:
मैं वह पत्थर हूँ जिस पर कोई भी अपने न कटने वाले समय को पटक-पटककर मार डालता है।

'समय काटने वाले' में लेखक ने रिटायर्ड लोगों की समस्या को उठाया है। उन्होंने कटाक्ष तो किया है और हास्य भी कई जगह पैदा हुआ है लेकिन यह एक गम्भीर विषय है जिसके तरफ वो ध्यान दिलाते हैं। 

कई बार जब व्यक्ति रिटायर हो जाता है तो  शुरुआत के कुछ दिन तो काफी अच्छे से बीतते हैं। अपनी नौकरी के चलते जो वह कर नहीं पाया था वह वो करने का प्रयास करता है। लेकिन फिर कुछ दिनों बाद कोई दिशा न होने के चलते वह परेशान रहने लगता है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि वह देखता है उसके आस पास जितने लोग हैं उन्हें कुछ न कुछ कार्य है। ऐसे में कई लोग अवसाद में चले जाते हैं। इसी को लेखक ने इस लेख के माध्यम से दर्शाया है। 

लेखक रिटायर हुए आदमी की मनोदशा बताते हुए लिखते हैं:

रिटायर्ड वृद्ध को समय काटना होता है। वह देखता है कि ज़िन्दगी भर मेरे कारण बहुत कुछ होता रहा है। पर अब मेरे कारण कुछ नहीं होता। वह जीवित सन्दर्भों से अपने को जोड़ना चाहता है, पर जोड़ नहीं पाता। वह देखा कि मैं कोई हलचल पैदा नहीं कर पा रहा हूँ। छोटी सी तरंग भी मेरे कारण जीवन के इस समुद्र में नहीं उठ रही है।

जहाँ तक मेरा ख्याल है कि अगर व्यक्ति के पास रिटायरमेंट के बाद भी कुछ कार्य करने की योजना हो तो बेहतर ही होगा। भले ही वह कार्य वह अपने वक्त काटने के लिए करे। कई लोग घूमने निकल जाते हैं, कई लोग जीवन की दूसरी पारी चालू कर देते हैं और यही सब काम उन्हें व्यस्त रखता है। जो यह नहीं करते वो शायद परेशान ही रहते हैं या जैसे लेखक ने दर्शाया है दूसरों को परेशान ही करते हैं। 

लेख के कुछ अंश:
समय रोज पैदा हो जाता है और उसे रोज मारना पड़ता है। समय को न मारो तो वह अपने को मार डालता है। 

जिसे एक्सटेंशन न मिले, उसे रिटायर्ड आदमी कहते हैं। एक्सटेंशन की अवधि से ही यह टूटने लगता है। मातहत आपस में कहते हैं- बुड्ढा एक्सटेंशन पर चल रहा है। मिनिस्ट्री बदली कि गए। एक्सटेंशन वाला आठों पहर अनुभव करता है कि वह रेत के ढेर पर बैठा है।

दया की भी शर्ते होती हैं।

रिटायर्ड आदमी की बड़ी ट्रेजेडी होती है। व्यस्त आदमी को अपना काम करने में जितनी अक्ल की जरूरत पड़ती है, उससे ज्यादा अक्ल बेकार आदमी को समय काटने में लगती है।

यह भी पढ़ें: हरिशंकर परसाई की अन्य रचानाओ पर लेख

रामकथा क्षेपक 
पहला वाक्य:
एक पुरानी पोथी में मुझे ये दो प्रसंग मिले हैं।

लेखक को एक पुरानी पोथी मिली जिसमें उसे दो प्रसंग मिले। यह प्रसंग राम और हनुमान से जुड़े हुए थे।
आखिर लेखक को कौन से प्रसंग मिले?

रामकथा क्षेपक में लेखक ने राम और हनुमान से जुड़े दो प्रसंगों द्वारा समाज पर व्यंग्य कसा है। शुरुआत में वह किस तरह लोग डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करते हैं उसे लेकर व्यंग्य कसा है। लेखक कहते हैं:

पुराने जमाने में लिखे दस पन्ने भी किसी को मिल जाएं तो उसे मजे में उनकी व्याख्या से डॉक्टरेट मिल जाती है।

प्रसंगों की बात करूँ तो लेख में दो प्रसंग हैं।पहला प्रसंग प्रथम साम्यवादी है जिसमें उन्होंने व्यापारी वर्ग की कुटिलता पर कटाक्ष किया है। वहीं प्रथम स्म गलर के माध्यम से उन्होंने किस तरह सत्ता में बैठे लोगों के लिए कानून अलग और आम व्यक्तियों के लिए कानून अलग होता है इस पर कटाक्ष किया है। वह कहते हैं:

स्मगलिंग यों अनैतिक है। पर स्मगल किये हुए सामान से अपना या अपने भाई-भतीजों का फायदा होता हो, तो यह काम नैतिक हो जाता है।

रोचक लेख है।

बुद्धिवादी 
पहला वाक्य:
आशीर्वादों से बनी जिंदगी है।

बुद्धिवादी में लेखक ने बुद्धिजीवियों के ऊपर कटाक्ष किया है। ऐसे लोग बातें तो बड़ी बड़ी करते हैं। कई बार यह बातें ऐसी होती हैं जिनका कोई मतलब नहीं होता है या वो किसी काम की नहीं होती हैं। बुद्धिवादी का चरित्र दर्शाते हुए वह लिखते हैं:

अगर कोई आदमी डूब रहा हो तो, उसे बचाएंगे नहीं, बल्कि सापेक्षिक घनत्व के बारे में सोचेंगे। कोई भूखा मर रहा हो, तो बुद्धिवादी उसे रोटी नहीं देगा। वह विभिन्न देशों के अन्न-उत्पादन के आंकड़े बताने लगेगा। बीमार आदमी को देखकर वह दवा का इंतज़ाम नहीं करेगा। वह विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट उसे पढ़कर सुनाएगा। कोई उसे अभी आकर खबर दे कि तुम्हारे पिताजी की मृत्यु हो गई, तो बुद्धिवादी दुखी नहीं होगा। वह वंश-विज्ञान के बारे में बताने लगेगा।

ऐसी बुद्दिजीवी कई बार अपने जीवन में उतने ही संकीर्ण विचारों के होते हैं जिनके खिलाफ वह बातें करते रहते हैं।इसी को लेखक ने इस लेख में दर्शाने का प्रयास किया है। 

करार व्यंगय है।

लेख के कुछ अंश:
हम पूरे मूंह से बोलते हैं, मगर बुद्धिवादी मुंह के बाएँ कोने को ज़रा-सा खोलकर गिनकर शब्द बाहर निकालता है। हम पूरा मुंह खोलकर हँसते हैं, बुद्धिवादी बाईं तरफ के होठों को थोड़ा खींचकर नाक की तरफ ले जाता है। होंठ के पास नथुने में थोड़ी हलचल पैदा होती है और हम पर कृपा के साथ यह संकेत मिलता है कि–आई एम एम्यूज़्ड! तुम हँस रहे हो, मगर मैं सिर्फ थोड़ा मनोरंजन अनुभव कर रहा था। गंवार हँसता है, बुद्धिवादी सिर्फ रंजित हो जाता है।

बुद्धिवादी में लय है। सिर घुमाने में लय है, हथेली जमाने में लय है, उठने में लय है, कदम उठाने में लय है, अलमारी खोलने में लय है, किताब निकालने में लय है, किताब के पन्ने पलटने में लय है। हर हलचल धीमी है। हल्का व्यक्तित्व हड़बड़ाता है। इनका व्यक्तित्व बुद्धि के बोध से इतना भारी हो गया है कि विशेष हरकत नहीं कर सकता। उनका बुद्धिवाद मुझे एक थुलथुल मोटे आदमी की तरह लगा जो भारी कदम से धीरे-धीरे चलता है।

प्रेम की बिरादरी 
पहला वाक्य:
उनका सब  कुछ पवित्र है।

प्रेम विवाह आज भी हमारे यहाँ उतना आसान नहीं है जितना कि एक सभ्य समाज में होना चाहिए। जातिवाद हमारी धमनियों में रक्त की तरह बहता है और यह जातिवाद शादी ब्याह के मामले में सबसे ज्यादा देखा जाता है। इसी को लेकर यह व्यंग्य लिखा गया है।

लेख के कुछ अंश:
पवित्रता का मुंह दूसरों की अपवित्रता के गंदे पानी से धुलने पर ही उजला होता है। वे हमेशा दूसरों की अपवित्रता का पानी लोटे में ही लिए रहते हैं। मिलते ही अपवित्रता का मुंह धोकर उसे उजला कर लेते हैं। 

कैसा बुरा ज़माना आ गया! मैं जानता हूं कि वे बुरा ज़माना आने से दुखी नहीं, सुखी हैं। जितना बुरा ज़माना आएगा वे उतने ही सुखी होंगे–तब वे यह महसूस करके और कहकर गर्व अनुभव करेंगे कि इतने बुरे ज़माने में भी हम अच्छे के अच्छे हैं। कुछ लोग बड़े चतुर होते हैं। वे सामूहिक पतन में से निजी गौरव का मुद्दा निकाल लेते हैं और अपने पतन को समूह का पतन कहकर बरी हो जाते हैं।

झूठे विश्वास का भी बड़ा बल होता है। उसके टूटने का भी सुख नहीं, दुख होता है।

लोग कहते हैं कि आखिर स्थायी मूल्य और शाश्वत परम्परा भी तो कोई चीज़ है। सही है, पर मूर्खता के सिवाय कोई भी मान्यता शाश्वत नहीं है। मूर्खता अमर है। वह बार-बार मरकर फिर जीवित हो जाती है।

धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे 
पहला वाक्य:
चुनाव हो गये हैं।

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे में लेखक ने चुनावी प्रक्रिया, संविधान और न्याय पालिका के कार्य करने के तरीके पर प्रश्न चिन्ह उठाते हुए कटाक्ष किया है। वहीं चुनाव को लेकर एक आम आदमी के मन में कैसी हताशा है यह भी बाखूबी दर्शाया है।

लेख के कुछ अंश:
चुनाव के दिनों में यह एक नई नस्ल पैदा होती है–कार्यकर्ता। सच्चा कार्यकर्ता वह है जो पाटी को ‘पालटी’ बोलता है, विरोधी को ‘चुनैटी’ देता है और जिनकी सारी कोशिश यह होती है कि उम्मीदवार से ज़्यादा से ज़्यादा पैसे चाय-नाश्ते के लिए झटक ले।

मैं पूछता हूं–इसे किसने लिखा? क्यों लिखा? किन परिस्थितियों में लिखा? लिखनेवालों के विचार-मान्यताएं क्या थे? उनकी क्या कल्पना थी? किन ज़रूरतों से वे प्रेरित थे? देशवासियों के भविष्य के बारे में उनकी क्या योजना थी?–क्या वे सवाल इस पोथी के बारे में पूछना जायज़ नहीं है। वह कहता है–कतई नहीं। जो पहले लिखा गया है उसके बारे में कोई सवाल नहीं उठाना चाहिए। वह तर्क से परे है। पहले लिखे की पूजा और रक्षा होनी चाहिए। वह पवित्र है। भोजपत्र पर जो लिखा है वह आर्ट पेपर पर छपे से ज़्यादा पवित्र होता है।

उस ज्ञानी के जवाब से ऐसा लगता है, जैसे न्यायपालिका को संविधान का गर्भ रह गया था, जिससे हम करोड़ों आदमी पैदा हो गए। हम संविधान और न्यायपालिका के व्यभिचार की अवैध संतानें हैं। तभी तो हमें कोई नहीं पूछता।

इस देश के ज्ञानी या अज्ञानी–सबकी यह विडंबना है कि वह क्रोध से फौरन किस्मत पर आ जाता है।

जिसकी छोड़ भागी है 
पहला वाक्य:
यह जो आदमी मेरे सामने बैठा है, जवान है और दुखी है।

एक व्यक्ति लेखक के सामने बैठा है। उसकी बीवी उसे छोड़कर भाग चुकी है। इस व्यक्ति को लेखक के किस तरह समझाया इसी पर यह लेख है।

जिसकी छोड़ भागी है वैसे तो एक बीवी की भागने की घटना पर शुरू होती है लेकिन लेखक ने इस में घूसखोरी, घूसखोरी को लेकर परिवार की समझ, राजनीति और भारतीयों की मानसिकता पर व्यंग्य किया है। किस तरह भारतीय औरत को इनसान न समझ पर प्रॉपर्टी समझता है इसे दर्शाने की कोशिश की है। इसमें पुरुष और महिला दोनों शामिल हैं। लेखक पुरुष की सोच दर्शाते हुए लिखते हैं:

मैं कहता हूं–तो तुम दूसरी से शादी कर लो। 

उसने कहा–मेरा तो जी होता है कि जाकर उस हरामजादी के कलेजे में छुरा घुसेड़ दूं। 

आखिर यह भी सच्चा भारतीय मर्द निकला। तलाक नहीं देगा, छुरा घुसेड़ेगा। यह समझता है कोई उसके घड़े को उठाकर ले गया है। यह उसे पत्थर से फोड़ना चाहता है–मैं इसमें पानी नहीं पीऊंगा, तो तू भी नहीं पिएगा। 

मैं कहता हूं–औरत प्रापर्टी नहीं है। 

वह भर-आँख मुझे देखता है। कहता है–औरत प्रॉपर्टी नहीं है? 

मैं कहता हूं–नहीं।

वहीं ये सोच महिलाओं की भी है जो कि लेख के अंत में दर्शाई गयी है। हाँ चूँकि इस एक लेख में लेखक कई मुद्दों पर कटाक्ष करते हैं तो मुख्य मुद्दा थोड़ा हल्का सा होता प्रतीत होता है। अगर भारतीय समाज में औरत को कैसे देखा जाता है इसी पर रहते तो शायद लेख और अच्छा हो सकता था।

लेख के कुछ अंश:
जवान आदमी को दुखी देखने से पाप लगता है। मगर मजबूरी में पाप भी हो जाता है। बेकारी से दुखी जवानों को सारा देश देख रहा है और सबको पाप लग रहा है।

जिस दिन घूसखोरों की आस्था भगवान पर से उठ जाएगी, उस दिन भगवान को पूछने वाला कोई नहीं होगा।

वारिस न हो तो जायदाद हाय-हाय करती रहती है कि मेरा क्या होगा? आदमी को आदमी नहीं चाहिए। जायदाद को आदमी चाहिए।

सदियों से यह समाज लिखी पर चल रहा है। लिखाकर लाए हैं तो पीढ़ियां मैला ढो रही हैं और लिखाकर लाए हैं तो पीढ़ियां ऐशो-आराम भोग रही हैं। लिखी को मिटाने की कभी कोशिश ही नहीं हुई! दुनिया के कई समाजों ने लिखी को मिटा दिया। लिखी मिटती है! आसानी से नहीं मिटती तो लात मारकर मिटा दी जाती है। इधर कुछ लिखी मिट रही है।

किताबों की दुकान और दवाओं की 
पहला वाक्य:
बाज़ार बढ़ रहा है। 

किताबों की दुकान और दवाओं की में लेखक ने किताब, दवा, दूकान इत्यादि के माध्यम से समाज के कई स्याह पहलुओं पर बात की है। ज्ञान का घटता महत्व हो, समाज में गलत चीजों पर बढ़ता गर्व हो या परिवारों पर होता बाजारवाद का असर हो उन्होंने इन सभी मुद्दों पर कटाक्ष किया है। विचारणीय लेख है।

लेख के अंश:
बेकार आदमी हैज़ा रोकते हैं क्योंकि वे शहर की मक्खियां मार डालते हैं।

इस देश को खुजली बहुत होती है। जब खुजली का दौर आता है, तो दंगा कर बैठता है या हरिजनों को जला देता है। तब कुछ सयानों को खुजली उठती है और वे प्रस्ताव का मलहम लगाकर सो जाते हैं। खुजली सबको उठती है–कोई खुजाकर खुजास मिटाता है, कोई शब्दों का मलहम लगाकर।

बीमारी को स्वास्थ्य मान लेनेवाला मैं अकेला ही नहीं हूं। पूरे समाज बीमारी को स्वास्थ्य मान लेते हैं। जाति-भेद एक बीमारी ही है। मगर हमारे यहां कितने लोग हैं जो इसे समाज के स्वास्थ्य की निशानी समझते हैं? गोरों का रंग-दंभ एक बीमारी है। मगर अफ्रीका के गोरे इसे स्वास्थ्य का लक्षण मानते हैं और बीमारी को गर्व से ढो रहे हैं। ऐसे में बीमारी से प्यार हो जाता है। बीमारी गौरव के साथ भोगी जाती है। मुझे भी बचपन में परिवार ने ब्राह्मणपन की बीमारी लगा दी थी, पर मैंने जल्दी ही इसका इलाज कर लिया।

बीमारी बरदाश्त करना अलग बात है, उसे उपलब्धि मानना दूसरी बात। जो बीमारी को उपलब्धि मानने लगते हैं, उनकी बीमारी उन्हें कभी नहीं छोड़ती। सदियों से अपना यह समाज बीमारियों को उपलब्धि मानता आया है और नतीजा यह हुआ है कि भीतर से जर्जर हो गया है मगर बाहर से स्वस्थ होने का अहंकार बताता है।

घुटन के पन्द्रह मिनट 
पहला वाक्य:
एक सरकारी दफ्तर में हम लोग काम से गये थे- संसद सदस्य तिवारी जी और मैं।

लेखक जब अपने मित्र एक संसद सदस्य तिवारी जी के साथ एक सरकारी दफ्तर गये तो बड़े साहब ने उन्हें अपने साथ चाय पीने के लिए आमंत्रित किया। 

यह चाय पन्द्रह मिनट तक चली और इसी में हुई घुटन का उल्लेख लेखक ने किया है। 

घुटन के पन्द्रह मिनट एक करारा व्यंग्य है। नौकरीशाही और सत्ता में बैठे हुए स्त्ताधीशों के बीच व्यवहार करने का एक अपरिभाषित तरीका  होता है। कुछ कायदे होते जो कि नौकरशाहों को करने होते हैं ताकि सत्ताधीशों की अहम की तुष्टि कर सके। इसी को लेकर परसाई जी ने व्यंग्य किया है जिसमें उन्होंने नौकरशाहों और सस्ता में काबिज लोगों दोनों ही बिरादरी के लोगों को निशाने में लिया है। लेख आपको हँसाता है। इस पन्द्रह मिनट का विवरण पढ़ आप बरबस हँसते भी हो परिस्थितियों को लेकर चिंतित भी हो जाते हो क्योंकि आपको भी पता है कि यह बदलने वाला नहीं है।

लेख के कुछ अंश:
एक निहायत बनावटी मुस्कान फैली साहब के चेहरे पर। यह मुस्कान सरकार खास तौर से अपने कूटनीतिज्ञों और अफसरों के लिए बनवाती है। पब्लिक सेक्टर में इसका कारखाना है। प्राइवेट सेक्टर के कारखाने में बनी मुस्कान व्यापारी के चेहरे पर होती है। इसे नकली मूंछ की तरह फौरन पहन लिया जाता है।

आचार्यजी, एकटेंशन और बागीचा 
पहला वाक्य:
क्लीन शेव  के  बाद भी आचार्यजी को एक्सटेंशन नहीं मिला।

आचार्य जी बड़े भले आदमी थे। प्रोफेसर थे और सभी से स्नेह करते थे। आचार्य जी को एक्सटेंशन नहीं मिला था और वो परेशान थे। उन्होंने सब जतन करके देख लिया था। 

आखिर कौन थे ये आचार्य जी? क्यों इन्हें एक्सटेंशन नहीं मिला था? 

आचर्य जी, एक्सटेंशन और बागीचा ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो कि ऊपरी तौर पर तो बहुत स्नेही है लेकिन उसका स्नेह अपना काम निकालने के लिए ही है। ऐसे कई लोग आस पास देखने को मिल जाते हैं जो कि वैसे तो आपके शुभचिंतक बनते हैं लेकिन उनका ध्येय केवल आपसे कार्य  निकालना ही होता है। जब कार्य निकल जाये तो वह आपको जीवन से दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल देते हैं।

रोचक लेख है। मुझे यकीन है लेख पढ़ते पढ़ते आचार्य जैसे किसी न किसी व्यक्ति का चेहरा जरूर उभरेगा।

लेख के कुछ अंश:
उनके स्नेह के अनुपात में मैं उनके स्वार्थ का अनुपात समझने लगा था।

मैं सोचता कि क्या मेरे प्रति ही इनका इतना स्नेह है? क्या सिर्फ मुझे ही गले लगाते हैं। नहीं, वे बहुत सुलझे हुए विचार के आदमी थे। उनके विचारों में कोई दुविधा नहीं थी। किससे कितना लाभ उठाना है, इसका हिसाब उनके मन में होता था और वे इसी हिसाब से अपने हृदय का स्नेह उद्वेलित कर देते थे।

मैंने पूछा - पर उन्होंने तुमसे मेरी निंदा की होगी न? सच बताओ। 
उसने झिझकर कहा - "हाँ, की थी! पर तुमने कैसे जाना?"
मैंने कहा - "मैं जानता हूँ, वे बहुत सुलझे हुए विचारों के आदमी हैं। जिससे फायदा उठा रहे हैं, उसकी प्रशंसा और बाकी सबकी निंदा - ऐसी क्लियर थिंकिंग है उनकी।"


यह सभी लेख आपको सोचने के लिए काफी कुछ दे जाते हैं। लेख हँसाते भी हैं और विचार करने के लिए प्रेरित भी करते हैं। अगर आपने इस संग्रह को नहीं पढ़ा है तो एक बार पढ़ना चाहिए। 

किताब में मौजूद आखिर के दस लेखों पर मेरे विचार:
अपनी अपनी बीमारी 2 

किताब लिंक:  पेपरबैक | किंडल

© विकास नैनवाल 'अंजान'

4 comments:

  1. परसाई जी, व्यंग्य के पर्याय

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    1. जी सही कहा....उनके व्यंग्य रोचक तो हैं हीं प्रासंगिक भी हैं....

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  2. वाह! बेहतरीन समीक्षा, मैं भी आजकल यही पढ़ रहा हूँ... परसाई साहब के व्यंग्यों में दर्शन और हास्य का दुर्लभ समायोजन होता है। एक दिन में एक रचना पढ़ लेता हूँ तो दिन भर की खुराक हो जाती है।

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    Replies
    1. सही कहा.... उनके लेख मारक हैं और प्रासंगिक भी हैं... आभार...

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