एक बुक जर्नल: धोखा - सुरेन्द्र मोहन पाठक

Sunday, June 21, 2015

धोखा - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग : ४.५ /५
उपन्यास पढ़ा गया: ३१ मई से २ जून तक

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : ३४८
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स
सीरीज : विवेक आगाशे #४


पहला वाक्य:
रोहित सूरी उस घड़ी करोलबाग थाने में मौजूद था जहाँ कि वो अपनी हाजरी गैरजरूरी समझता था। 

रोहित सूरी महतानी इन्वेस्टमेंट्स नामक स्टॉक ब्रोकर्स फर्म में एक असिस्टेंट की नौकरी करता था। वो एक साधारण इंसान था जो कि एक मामूली सी ज़िन्दगी जी रहा था। लेकिन उसकी ज़िन्दगी में एकाएक गैरमामूली हरकते होने लगी और हरकतें भी ऐसी जिनके वजूद कि पुष्टि करने में वो हमेशा नाकामयाब रहा। ये हरकतें थी खूबसूरत लड़कियों को मरते हुए या मरे हुए देखना।

जब उसने पुलिस की मदद लेनी चाही तो उन्हें वो लड़कियाँ अपनी जगह से न केवल नदारद मिली बल्कि ऐसी घटना के होने के सबूत भी न मिले।

वो रोहित को दिमागी मरीज या नशेड़ी बता रहे थे जबकि रोहित अपने बात पर अड़ा था कि जो उसने देखा वो सच था। क्या थी असलियत?

रोहित कि हालत के विषय में जब विवेक अगाशे को पता चला तो एक बार को वो भी चकरा गया। रोहित क्या सचमुच पागल था या किसी साजिश का शिकार था? अगर उसके खिलाफ साजिश रची जा रही थी तो वो कौन कर रहा था? इन्ही प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए विवेक ने अपनी इन्वेस्टीगेशन शुरू कर दी थी। क्या विवेक बात कि तह तक पहुँच पायेगा? ये जानने के लिए तो आपको उपन्यास को ही पढ़ना पड़ेगा।



धोखा विवेक अगाशे सीरीज का चौथा उपन्यास है। इससे पहले के उपन्यास क्राइम क्लब, कोई गवाह नहीं और गन्दा खून थे। इनमे से किसी भी उपन्यास को पढ़ने का मौका मुझे न लगा। खैर, ये एक सीरीज उपन्यास है लेकिन इसकी खूबी ये है इसके लिए आपको पिछले उपन्यासों का पढ़ा होना ज़रूरी नहीं है। विवेक अगाशे एक सेना से सेवा निवृत लेफ्टिनेंट कर्नल था जो कि एक प्राइवेट डिटेक्टिव था और सिग्मा सिक्यूरिटीज नामक फर्म का मालिक था। उसने क्राइम क्लब नामक संस्था कि स्थापना की थी जिसके सदस्य काफी अच्छा रसूख रखते थे। कई विचित्र रहस्यों को सुलझाकर उसने पुलिस महकमे में भी अपनी अच्छी पहचान बना ली थी। इस उपन्यास में भी हमें विवेक का जलवा देखने को मिलता है। उपन्यास मुझे काफी अच्छा लगा। कथानक काफी तेज था और इसने पन्नो को पलटने पर मुझे मजबूर किया। कम शब्दों के कहे तो उपन्यास पढ़कर मज़ा आ गया और पूरा पैसा वसूल लगा।

उपन्यास कि शुरुआत जब होती है तो पाठक खुद इस मुश्किल में पढ़ जाता है कि रोहित सही है या पुलिस वाले। रोहित क्यूँकी कि ऐसा व्यक्ति है जिसके प्रति ऐसी साजिश कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं तो यह कथानक को और रहस्यमय बना देता है। वो एक सामान्य इंसान है जिसके पास न रुतबा है न पैसे। उसके खिलाफ क्यों कोई साजिश करेगा ये ही बात पहले मन में उठती है। फिर ये कोई कौन हो सकता है ये सवाल उठता है। लेकिन विवेक बेहतरीन तरीके से इस गुत्थी को सुलझाता है और न केवल क्यूँ बल्कि उस कोई का भी पता लगा देता है। अगर आप रहस्मय उपन्यास पढ़ना पसंद करते हैं तो ये उपन्यास आपको ज़रूर पसंद आयेगा।
उपन्यास को आप निम्न लिंक से मंगवा सकते हो :
अमेज़न
न्यूज़हंट

उपन्यास की कुछ पंक्तियाँ जो पसंद आयीं :

लेकिन गुनाह- और गुनाह का हासिल - कागज़ की नाव है जो बहुत दूर तक, बहुत देर तक नहीं चलती। 

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