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गेस्ट पोस्ट: कई चाँद थे सरे-आसमां - शम्सुर्रहमान फारुकी | रैना उवाच

गजानन रैना साहित्यानुरागी हैं। समय समय पर सोशल मीडिया पर साहित्यिक कृतियों पर अपने खास अंदाज में टिप्पणी करते रहते हैं। आज पढ़िए शम्सुर्रहमान फारुकी के प्रसिद्ध उपन्यास कई चाँद थे सरे-आसमां पर लिखी उनकी यह संक्षिप्त टिप्पणी। 

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कई चाँद थे सरे आसमाँ , कि चमक चमक के पलट गए,
न लहू मेरे ही ज़िगर में था , न तुम्हारी ज़ुल्फ़ सियाह थी।


अगर आपने ओरहान पामुक की 'माय नेम इज रेड' पढी हो तो  आपने एक बार तो जरूर सोचा होगा कि काश, साठ भाषाओं में अनुवादित इस शाहकार के मुकाबले की चीज हमारे यहाँ भी  लिखी गयी होती।

खुश हो जाइए, उर्दू के डेमी गाड (अब स्व.) शम्सुर्रहमान फारुकी साहब की 'कई चाँद थे सरे-आसमाँ' ऐन आपकी ख्वाहिश के मुताबिक किताब है। फारुकी साहब के पास एक प्रखर शोधकर्ता के तथ्य हैं, एक प्रामाणिक इतिहासवेत्ता की जानकारियाँ हैं, एक कवि का सौंदर्यबोध है और है एक उस्ताद किस्सागो का अंदाजे बयां।

उपन्यास की घटनाभूमि है अठारहवीं, उन्नीसवीं सदी का लखनऊ। 

यह कहानी है मशहूर शायर,दाग देहलवी की जन्मदात्री़ वजीर खानम की। 

हुस्न की मलिका, परीचेहरा वजीर खानम को देख लगता था जैसे कि कोई अप्सरा बादलों की डोली में बैठ कर आसमां से उतर आई हो। वो जमीन पर नहीं, दिलों के गलीचे पर चलती थीं। उनके चार प्रेम संबंधों के बारे में जानकारी मिलती है। एक नवाब और एक शाहजादे के अलावा एक कलाकार भी उनके प्रेमियों में शामिल था।

उपन्यास में शहर भी एक चरित्र है तो संस्कृति भी। यहाँ जहाँ नवाबों, बेगमों , शायरों , फकीरों और भांड़ों, तवायफों का वर्णन है, वहीं तत्कालीन खान पान, कपड़ों, गहनों, हथियारों का भी है। त्योहारों और उस समय के लोगों के खेलकूद और शौकों का भी है।

और हाँ,पाठक एक बात महसूस किये बिना नहीं रह पाता कि फारुकी साहब ने संस्कृत काव्य जरूर पढ़ा है। 

वजीर खानम का सौंदर्य वर्णन यदि बाणभट्ट की याद दिलाता है तो उनकी चार मधुयामिनियों का रसपूर्ण वर्णन याद दिलाता है ऐन्द्रिकता के सिद्ध चितेरे, कालिदास की।

उपन्यास पढ़िये, पढ़ने से ताल्लुक रखता है।


पुस्तक विवरण:

नाम: कई चाँद थे सरे-आसमाँ | लेखक: शम्सुर्रहमान फारुकी | प्रकाशक: पेनगुईन बुक्स इंडिया | पुस्तक लिंक: अमेज़न 


टिप्पणीकार परिचय

गजानन रैना

गजानन रैना बनारस से हैं। वह पढ़ने, लिखने, फिल्मों  व संगीत के शौकीन हैं और इन पर यदा कदा अपनी खास शैली में लिखते भी रहते हैं। 

एक बुक जर्नल में मौजूद उनके अन्य आलेख: गजानन रैना

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4 Comments
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  1. मेरे द्वारा पढ़े गए अब तक के उपन्यासो में सबसे बोरिंग एवं बेकार यही नॉवेल रहा..... 😌😌😌😌😌😌😌😌😌😌

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  2. पता नहीं क्यों... शायद शुरुआत ही ऐसी है 😌😌😌😌😌😌😌

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    1. चलिए कोई नहीं...हर किताब किसी के लिए नहीं होती...

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