ग्रीन गोल्ड | राज कॉमिक्स | मालती वर्मा

संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: पैपरबैक | पृष्ठ संख्या: 32 | प्रकाशन: राज कॉमिक्स | शृंखला: भेड़िया | कहानी: मालती वर्मा | चित्रांकन: धीरज वर्मा | इंकिंग: राजेन्द्र धौनी | कलर स्कीम: संजय वर्मा 


कहानी 


भेड़िया के कारण एलफाण्टो और उसके साथी झोली घाटी के अपने ठिकाने को छोड़ने के लिए मजबूर हो गए थे। अब पुलिस वालों ने झोली घाटी में अपनी एक चौकी का निर्माण कर लिया था। 

एलफाण्टो भेड़िये से मिली अपनी दो शिकस्तों के कारण बौखलाया हुआ था। वहीं बॉस और रोबी भी तस्करी का सामान अपने हाथ से निकल जाने के कारण परेशान थे। 

वह उस ग्रीन गोल्ड को दुबारा पाना चाहते थे जिससे वह अथाह दौलत के मालिक बन सकते थे और बॉस के पास एक ऐसी योजना थी जिससे वह इस न केवल ग्रीन गोल्ड को दोबारा हथिया सकते थे बल्कि भेड़िया से अपना बदला भी ले सकते थे। 

आखिर बॉस के दिमाग में कौन सी खिचड़ी पाक रही थी?
क्या वो झोली घाटी पर दोबारा कब्जा कर पाये?
क्या भेड़िया ने उनका मुकाबला किया? 
इस मुकाबले का क्या नतीजा निकला?

मेरे विचार

'ग्रीन गोल्ड' राज कॉमिक्स (Raj Comics) द्वारा प्रकाशित भेड़िया शृंखला (Bheriya Series) का चौथा कॉमिक बुक है। इस कॉमिक बुक की कहानी मालती वर्मा (Malti Verma) द्वारा लिखी गई है और इसका चित्रांकन धीरज वर्मा (Dhiraj Verma) द्वारा किया गया है। 

ग्रीन गोल्ड की कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ से एलफाण्टो की खत्म हुई थी इसलिए अगर आपने इसे पढ़ने से पहले एलफाण्टो नहीं पढ़ा है तो मेरी सलाह यही रहेगी कि आप एक बार उसे पढ़ लें। एलफाण्टो के अंत में पाठकों ने देखा था कि कैसे भेड़िया ने झोली घाटी से एलफाण्टो, बॉस और रोबी को हरा दिया था और इस तरह जानवरों द्वारा तस्करी किये जाने वाले गिरोह का सफाया हो गया था। 

अब झोली घाटी में एक पुलिस चौकी स्थापित हो चुकी है और तस्करी अब रुक चुकी है।  एलफाण्टो, बॉस और रोबी भेड़िया से मिली इस हार से बौखलाए हुए हैं और वापिस झोली घाटी पर कब्जा करना और भेड़िया से बदला लेना चाहते हैं। वह लोग कैसे झोली घाटी पर कब्जा करते हैं और भेड़िया से बदला लेने के लिए कौन सी योजना बनाते हैं यही इस कॉमिक बुक में देखने को मिलता है। इसके अलावा कॉमिक बुक में एलफाण्टो कैसे एलफाण्टो बना यह भी देखने को मिलता है। 

जहाँ पिछली कॉमिक तस्करी पर केंद्रित थी वहीं इस कॉमिक में हमें यह देखने को मिलता है कि नशा किस तरह से नशा करने वालों की सोचने समझने की शक्ति छीन लेता है और कई बार वह जिससे प्यार करते हैं नशे के लिए उसे ही नुकसान पहुँचाने लगते हैं। किसी का कोई नजदीकी अगर नशे के गिरफ्त में तो उससे जूझना कितना मुश्किल हो जाता है यह भी इस कॉमिक में दर्शाया गया है। 

जंगल के जल्लाद भेड़िये के कॉमिक को पढ़ें तो एक्शन की उम्मीद आपको रहती ही है। अगर इस कॉमिक के संदर्भ में एक्शन की बात की जाए तो इस कॉमिक में एक्शन इसके पहले भाग के मुकाबले थोड़ा कम देखने को मिलता है। एलफाण्टो और उसके साथी चतुराई से चौकी पर कब्जा कर लेते हैं लेकिन इसमें एक्शन इतना अधिक नहीं होता है। वहीं भेड़िया से लड़ने के लिए जो योजना वो बनाते है उसके क्रियांवयन में काफी वक्त लगता है जिसे कुछ ही पैनलों में समेटा जरूर गया है लेकिन योजना ऐसी रहती है जिसमें नायक खलनायक एक बीच सीधे एक्शन की गुंजाइश कम रहती है। हाँ, कॉमिक के आखिरी कुछ पृष्ठों में भरपूर एक्शन है और भेड़िया अपने पूरे जलाल पर दिखता है। 

कॉमिक बुक की कमियों की बात करूँ तो कहानी के कुछ कमजोर पक्ष मुझे लगे। जैसे हमें इस कहानी में एलफाण्टो की कहानी जानने को मिलती है जिसमें वह एक शांत प्रकृति का जीव लगता है। ऐसे में उसकी कहानी जानकर यह लगता है कि अभी जो भी वह कर रहा है वह उसके मूल किरदार से मेल नहीं खाता है। वह ऐसा कैसे बन गया इसे दर्शाने के लिए भी कुछ पैनल्स खर्च किये जाते तो बेहतर रहता क्योंकि एक ऐसे जीव जो काफी वर्षों से शांति से अपना जीवन यापन करता है उसका अचानक ऐसे खलनायक में तब्दील होना थोड़ा पचने में दिक्कत होती है। 

इसके साथ ही बॉस और उसके साथी के विषय में कोई भी अतिरिक्त जानकारी देने की कोशिश लेखिका ने नहीं की है। मुझे लगता है उनके विषय में थोड़ा बहुत तो बताना चाहिए था कि वह कौन थे कहाँ से आये थे और इतने बड़े पैमाने में तस्करी करने में कैसे सक्षम हो गए थे। 

इसके अलावा कहानी में यह दर्शाया गया है कि एलफाण्टो और उसके साथ फूजो बाबा और भेड़िये की नाक के नीचे न केवल तस्करी करने लगते हैं बल्कि भेड़िया के प्यारे भेड़ियों को कैद भी करने लगते हैं। मुझे यह चीज पचाने में थोड़ी दिक्कत हुई क्योंकि फूजो बाबा से जंगल की चिड़ियाएँ और दूसरे जानवर बातें करते थे। ऐसे में क्या इतने दिनों के दौरान कोई भी जानवर उस इलाके में नहीं गया जिसमें खलनायकों का अड्डा था?  वहीं कहानी में  भेड़िया को अपने  भेड़िया फौज के लंबे वक्त तक गायब होने का पता न लगना भी थोड़ा अटपटा लगता है क्योंकि मुझे नहीं लगता कि भेड़िया कई कई दिनों तक अपनी भेड़िया फौज से मिलता नहीं होगा। इस सब का थोड़ा मजबूत कारण दिया होता तो अच्छा होता। 

कॉमिक बुक की आर्ट की बात करूँ तो आर्ट मुझे ठीक लगा। कहानी को उभारता है। हाँ, कोई भी पैनल ऐसा नहीं लगा जो आपको ठिठकने को मजबूर सा कर दे। 

अंत में यही कहूँगा कि ग्रीन गोल्ड एक रोचक कॉमिक है जो कि नशे के नुकसान को दर्शाने का कार्य बाखूबी करता है।  एक्शन की मात्रा इसमें थोड़ा अधिक होती तो ज्यादा मज़ा आता। फिर भी एक बार पढ़ा जा सकता है क्योंकि इसमें एलफाण्टो जैसे रोचक खलनायक की एंट्री हुई है। 

यह भी पढ़ें


FTC Disclosure: इस पोस्ट में एफिलिएट लिंक्स मौजूद हैं। अगर आप इन लिंक्स के माध्यम से खरीददारी करते हैं तो एक बुक जर्नल को उसके एवज में छोटा सा कमीशन मिलता है। आपको इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ेगा। ये पैसा साइट के रखरखाव में काम आता है। This post may contain affiliate links. If you buy from these links Ek Book Journal receives a small percentage of your purchase as a commission. You are not charged extra for your purchase. This money is used in maintainence of the website.

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Top Post Ad

Below Post Ad