नीले परिन्दे - इब्ने सफी

संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: पेपरबैक | पृष्ठ संख्या: 132 | प्रकाशक: हार्पर कॉलिन्स | शृंखला: इमरान | अनुवाद: चौधरी ज़िया इमाम

पुस्तक लिंक: अमेज़न



कहानी 

जमील का नाम सरदारगढ़ में रहने वाले अमीरों में शुमार होता था। कुछ दिनों पहले तक जमील के पास सब कुछ था। वह खुश था क्योंकि उसकी शादी हो रही थी लेकिन फिर वह हादसा हुआ और जमील ने खुद को अपने कमरे में बंद कर दिया। 

एक रेस्तरां में वह बैठा  हुआ था जब एक नीले परिंदे ने उस पर हमला किया और अगले दिन उसके शरीर पर सफेद दाग उभर आए।

जमील के घर वाले समझते थे कि नीले परिंदे का यह हमला किसी की सोची समझी साजिश थी इसलिए जमील के चाचा सज्जाद ने फ़ैयाज को बुलाने का फैसला किया। 

चूँकि मामला आधिकारिक तौर पर डिपार्टमेंट ऑफ इंवेस्टिगेशन नहीं देख सकता था तो सज्जाद ने अली इमरान की मदद लेने का फैसला किया। 

क्या इमरान नीले परिंदे का रहस्य सुलझा पाया? 
क्या जमील पर होने वाला हमला असल में किसी की चाल थी? अगर हाँ, तो वह इस हमले से क्या हासिल करना चाहते थे? 
इमरान को इस मामले को सुलझाने के लिये किन किन मुसीबतों से दो चार होना पड़ा?




मुख्य किरदार 

जमील - सरदारगढ़ नाम की जगह का रईस आदमी
सज्जाद - जमील का चाचा जिसने फैयाज की मदद मांगी थी
फैयाज - डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टिगेशन का सुप्रीटेंडेंट
सईदा - सज्जाद की बेटी
नवाब जावेद मिर्जा - सरादरगढ़ का एक और रईस
परवीन - जावेद की बेटी
शौकत, इरफान, सफदर - नवाब के भतीजा
रेहाना - नवाब की भांजी
इशरत - नवाब का डॉक्टर
रुशी - इमरान की सेक्रेटरी
सलीम - शौकत का लेबोरेट्री असिस्टेंट


विचार 

नीले परिंदे (Neele Paarindey) लेखक इब्ने सफी (Ibn-e-Safi) की इमरान शृंखला (Imran Series) का छठवाँ उपन्यास है। यह उपन्यास 1956 में प्रथम बार प्रकाशित हुए उनके उर्दू उपन्यास 'नीले परिंदे' (Neele Parindey) का हिंदी अनुवाद है। उपन्यास का अनुवाद चौधरी ज़िया इमाम (Chaudhary Ziya Imam) द्वारा किया गया है और पुस्तक को हार्पर कॉलिन्स (Harper Collins) द्वारा प्रकाशित किया गया है। 

विज्ञान की तरक्की वैसे तो मनुष्यता की भलाई के लिए होती हैं लेकिन कई बार लोग इसका बेजा इस्तेमाल कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। इब्ने सफ़ी (Ibn-e-safi) द्वारा लिखा गया  प्रस्तुत उपन्यास नीले परिंदे (Neele Parindey) भी एक ऐसे ही व्यक्ति की कहानी है जो कि एक वैज्ञानिक उपज का इस्तेमाल अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए करता है। 

उपन्यास के कथानक की शुरुआत डिपार्टमेंट ऑफ इंवेस्टिगेशन के फ़ैयाज द्वारा इमरान को गाड़ी में एक सफर पर ले चलने से होती है। पाठक देखते हैं कि फ़ैयाज गाड़ी चला रहा है और इमरान पीछे सो रहा है। यह दोनों गाड़ी में कहाँ जा रहे हैं और क्यों जा रहे हैं इसका पता आगे आने वाले पृष्ठों में पता चलता है।  इसके बाद इमरान अपने चिरपरिचित अंदाज, जिसमें तहकीकात के साथ काफी सारी बेवकूफाना हरकते शामिल होती हैं, इस मामले की तह तक जाता है। अपराध क्यों हुआ? क्या अपराध असल में हुआ है? अगर हुआ है तो उसके पीछे कौन है? यह प्रश्न आपको पृष्ठ पलटने पर मजबूर कर देते हैं। कई संदिग्ध किरदार भी उपन्यास में मौजूद है  जो अपनी हरकतों से यह पता लगाना मुश्किल बना देते हैं कि असल अपराधी कौन है? 

उपन्यास का मुख्य किरदार इमरान है।  इमरान की हरकतें कई बार मनोरंजन करती हैं लेकिन कई बार उससे कोफ्त भी पैदा होती है। वैसे तो इमरान ये बेवकूफियाँ केवल अपना एक तरह का प्रभाव सामने वाले पर छोड़ने के लिए करता है लेकिन कैसे ये फितरत उसके किरदार में शामिल होती जा रही है इसका एक उदाहरण भी आपको देखने को मिलता है। उपन्यास में एक प्रसंग आता है जब वह अकेले होते हुए भी बेवकूफाना हरकत करता है और बाद में खुद को ही टोकता है। 

लेकिन अचानक उसके ज़ेहन में एक नया ख्याल पैदा हुआ। क्या वह अकेले में भी बेवकूफी करने लगा है? क्या वह बेवकूफी नहीं थी? (पृष्ठ 102)  

वहीं उपन्यास के अंत में यह भी पता लगता है कि इमरान केवल के साधारण जासूस नहीं है बल्कि सीधे होम डिपार्टमेंट से उसका संबंध है। 

मेरा ताल्लुक सीधे होम डिपार्टमेंट से है और डायरेक्टर जनरल के अलावा सी बी आई का हर अफसर मेरा मातहत है... पृष्ठ 125

इमरान के विषय में यह जानना रोचक था। वहीं फ़ैयाज के लिए यह विस्मय में डालने वाली बात थी।  इसके कारण फ़ैयाज और उसके रिश्ते में क्या फर्क आता है यह मैं जरूर जानना चाहूँगा। 

उपन्यास में रूशी भी मौजूद है जो कि एक तरह से इमरान की सेक्रेटरी है। उन दोनों के बीच की नोक झोंक देखना रोचक रहता है। 

इसके अलावा उपन्यास में  मौजूद नवाब जावेद मिर्जा का किरदार भी रोचक है। वो एक खानदानी रईस है और इस कारण उनकी खब्त देखते बनती है। जिस हिसाब से डॉक्टर भी अपनी डॉक्टरी बचाने के लिए उनकी हाँ में हाँ मिलाता है यह देखना हास्य पैदा करता है लेकिन लेखक इससे ऐसे लोगों के रवैये के ऊपर एक टिप्पणी करते हैं जिनके गलत सही बात को सभी केवल इसलिए मानते हैं क्योंकि वह अमीर हैं। इस कारण उनके चारों और हाँ में हाँ मिलाने वाले लोगों का एक घेरा सा बन जाता है और वह सही और गलत के बीच में फर्क मालूम नहीं कर पाते हैं। यही चीज अंत में उनकी बर्बादी का कारण भी बनती है।  इमरान जानता है वह ऐसे लोगों से तभी पार पा सकता है जब वह भी उसे अपने जितना या अपने बड़ा अमीर बने और इस कारण जिस तरह वह उनसे मिलता है वह तरीका अटपटा जरूर लेकिन कारगर सिद्ध होता है। 

उपन्यास की कमी की बात करूँ तो उस तरह से मुझे इसमें कोई कमी नहीं दिखी पर हाँ एक बिन्दु जरा अटपटा लगा। उपन्यास में एक प्रसंग है जब इमरान किसी के यहाँ मेहमान के रूप में आता है। वह जिस घर में आता है उसके दूसरे हिस्से की तलाशी लेता है और कोई पहचान न ले इसके लिए चेहरे पर 'काला नकाब' लगाता है। यह पढ़ते हुए मैं यही सोच रहा था कि वह मेहमान के रूप में उधर आया था और इस कारण कई लोगों ने उसके कपड़े देखे होंगे। अगर वह पकड़ा जाता है तो भले ही वह मास्क के कारण बच जाता लेकिन भागने पर कामयाब होने के बाद भी उन लोगों को यह चीज न खटकती कि तलाशी लेने आए अंजान व्यक्ति के कपड़े बिल्कुल उनके मेहमान की तरह थे। मास्क के अलावा भी वह पहने हुए कपड़ों में तब्दीलियाँ करता तो बेहतर होता। 

आखिर सिर्फ कोठी तक जाने के लिए रिवॉल्वर साथ ले जाने की क्या जरूरत थी। इमरान ने अपने सिर को थोड़ा हिलाया। जिसका मतलब यह था कि चाहे कुछ भी हो, उस वक्त इस छोटी-सी इमारत की तलाशी जरूर ली जाएगी।?

उसने जेब से एक काला नकाब निकाल कर अपने चेहरे पर चढ़ा लिया। ऐसे मौकों पर वह अक्सर यही करता था। मकसद यह था कि किसी से मुठभेड़ हो जाने के बावजूद भी वह न पहचाना जा सके।  (पृष्ठ 85)

उपन्यास की दूसरी बात जो मुझे खटकी वह उपन्यास से नहीं परंतु उसके पहले लिखे संपादक के लेख से संबंधित है। एक रहस्य कथा का सबसे जरूरी हिस्सा उसका रहस्य होता है लेकिन उपन्यास की शुरुआत में दिया लेख इसी चीज को उजागर कर देता है। मुझे लगता है संपादक को इससे बचना चाहिए था। आप रहस्यकथाओं के ऊपर कुछ लिखते हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि आपके लेख से उपन्यास का रहस्य न खुले क्योंकि इससे लेखक की की गई मेहनत पर पानी फिर जाता है। अगर आप उपन्यास पढ़ें तो मेरी राय यही रहेगी कि संपादक का लेख उपन्यास के अंत में ही पढ़ें। वहीं प्रकाशक को भी इसका ध्यान रखना चाहिए। अगर लेख ऐसा है जो रहस्य उजागर कर रहा है तो उसे उपन्यास के अंत में प्रकाशित करना चाहिए न कि पहले। 


अंत में यही कहूँगा कि उपन्यास रोचक है और एक बार पढ़ा जा सकता है। लेखक रहस्य को अंत तक बनाए रखने में सफल हुए हैं जो कि उपन्यास को पठनीय बना देता है।  अगर नहीं पढ़ा है तो एक बार पढ़कर देख सकते हैं। 

पुस्तक लिंक: अमेज़न


इमरान शृंखला के सातों उपन्यास दो वॉल्यूम में एकत्रित हैं। ये वॉल्यूम निम्न लिंक पर जाकर मिल जाएँगे: 

इमरान शृंखला भाग 1 | इमरान शृंखला भाग 2


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4 Comments
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  1. काफी समय पहले पढा था, रोचक उपन्यास है।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-04-2022) को चर्चा मंच       "अट्टहास करता बाजार"    (चर्चा अंक-4392)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    
    --

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    1. चर्चाअंक में पोस्ट को स्थान देने हेतु हार्दिक आभार...

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