जासूस बलराम के दो पठनीय कारनामों का संकलन है जासूस बलराम के सर्वश्रेष्ठ कारनामें -1

संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: पेपरबैक | पृष्ठ संख्या: 20 | प्रकाशन: फेनिल कॉमिक्स 

कॉमिक बुक समीक्षा: जासूस बलरायल के सर्वश्रेष्ठ कारनामें - 1 | फेनिल कॉमिक्स


फेनिल कॉमिक्स कॉमिक बुक इंडस्ट्री में काफी वर्षों से सक्रिय है लेकिन मैं अब तक इसके द्वारा प्रकाशित कॉमिक बुक्स पढ़ नहीं पाया था। बीच में नई कॉमिक बुक्स लेने का मन किया तो मैंने फेनिल कॉमिक्स से कॉमिक्स मँगवाने का फैसला कर लिया। 

कॉमिक्स आईं और उन कॉमिक बुक्स से जो कॉमिक मैंने पहले पहल पढ़ी वह जासूस बलराम के सर्वश्रेष्ठ कारनामें का पहला वॉल्यूम है। इस कॉमिक में जासूस बलराम के दो कारनामों को संकलित किया गया है। दस-दस पृष्ठ की इन कॉमिक्स में दो अलग-अलग टीम ने कार्य किया है और दोनों अपने आप में पूरी हैं तो इन्हें दो अलग अलग कॉमिक बुक के रूप में देखा जा सकता है।  

कॉमिक बुक की शुरुआत में लिखा गया है इस कॉमिक के माध्यम से प्रकाशक  फेनिल शेरडीवाला भारतीय कॉमिक इंडस्ट्री को नये टैलेंट से रूबरू करा रहे हैं। यह एक अच्छी पहल है और इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। 

मैं इस पोस्ट में इस संकलन की दोनों कॉमिक बुक्स पर एक साथ बात करूँगा। 

नादान 

लेखक: सलमान खान | पेंसिलिंग: उमाशंकर शुल्का | रंगसज्जा: अभिषेक सिंह | कैलीग्राफी: परेश चेवली | संपादक: रेणुका शेरडीवाला

कहानी

युवराज, पीयूष और सन्नी तीनों दोस्त थे जो ट्यूशन गए तो फिर लौटे नहीं। जब उन्हें लौटने में काफी देर हो गयी तो उनके अभिभावकों को किसी अनिष्ट की आशंका सताने लगी। 

यही कारण था इन तीनों बच्चों के अभिभावकों ने जासूस बलराम को अपने घर बुलाया था। 

वह चाहते थे कि जासूस बलराम इस मामले को देखें और उनके बच्चों का पता लगाएँ। 

आखिर इन बच्चों का अपहरण किसने किया था? 
क्या जासूस बलराम इनका पता लगा पाया?

मेरे विचार

किशोरावस्था एक ऐसा वक्त होती है जब व्यक्ति के अंदर जोश भरपूर होता है। यह वह वक्त भी होता है जब व्यक्ति न बच्चा रहता है और न वयस्क ही रहता है। ऐसे में अगर जोश में होश न रहे तो कई बार वह ऐसी गलतियाँ भी कर देता है जिसका भान उसे भले न हो लेकिन उसका खामियाजा बहुत बड़ा भुगतना पड़ता है। 

जासूस बलराम के सर्वश्रेष्ठ कारमानें के पहले वॉल्यूम की पहली कहानी 'नादान' ऐसे ही किशोरों को लेकर लिखी गयी है। चूँकि पूरी कहानी दस पृष्ठों की है तो कहानी में ज्यादा ट्विस्ट नहीं है। यह एक सीधी सरल कहानी है जो कि पढ़ते जाने के लिए विवश करती है। 

हाँ, मामला क्या है इसका भान आपको पहले ही हो जाता है तो अंत का ट्विस्ट इतना हैरान नहीं करता है। इसका एक कारण इसमें दिया वर्णन भी है जो कि कहानी के साथ साथ चलता रहता है। अक्सर कॉमिक बुक्स में नैरेशन बॉक्स का इस्तेमाल कहानी में चल रहे दृश्य के विषय में ही बात करने के लिए होता है लेकिन इसमें नैरेशन समानांतर चलता है। कहानी में जो चीज किरदार कर रहे हैं उससे यह अलग है और कहानी की मूल भावना को दर्शाता है। नैरेशन का यह स्टाइल मुझे पसंद आया। 

लेखक ने कहानी के माध्यम से किशोरों की एक समसामयिक समस्या को उठाया है और इसे एक शिक्षाप्रद कहानी के तौर पर लिखा है। कहानी अपना काम बाखूबी करती है। मुझे पसंद आई। 

कहानी में लेखक ने कुछ कलात्मक आजादी भी ली हैं। जैसे जासूस बलराम का फोन चेक करना और उसका अनलॉक होना। आजकल शायद ही कोई व्यक्ति हो जो अपना फोन अनलॉक रखता हो लेकिन जासूस बलराम को यही चीज मिलती है। वहीं कहानी में ही एक अखबार की भी विशेष भूमिका है। पर जिसे तरह एक व्यक्ति के घर वह न्यूज पेपर पहुँचते दर्शाया गया है वह अटपटा लगता है। कोई बेहतर तरीका इधर इस्तेमाल किया जा सकता था। 

कहानी के आर्टवर्क की बात करूँ तो आर्टवर्क ठीक है और कहानी के साथ न्याय करता है। हाँ, बलराम की शक्ल बदलती रहती है जिसमें एक रूपता लाई जा सकती थी। 

अंत में यही कहूँगा कि जासूस बलराम से हुई यह मुलाकात मुझे ठीक लगी। एक बार पढ़कर देख सकते हैं। 



फेकबुक

लेखक: अमन कुमार | चित्रांकन: रवि शंकर | कैलीग्राफी: दयाल सिंधी 

कहानी

रात का वक्त था जब वह व्यक्ति जासूस बलराम की गाड़ी से टकराया था। उस व्यक्ति की हालत बहुत खराब थी। किसी ने उस पर गोली चलाई थी। 

आखिर कौन था वह व्यक्ति? 
उस पर हमला किसने किया था? 
वह किससे बचकर भाग रहा था?

मेरे विचार 

आजकल व्यक्ति असल जीवन में कम और आभासी जीवन में ज्यादा वक्त बिता रहा है। इस आभासी जीवन का अपना एक अलग आकर्षण है और लोग यहाँ असल रिश्ते भी बना देते हैं। लेकिन यहाँ कई बार जो दिखता है वो असल में होता नहीं है। इसी आभासी जीवन कई ऐसे शिकारी भी मौजूद हैं जो हर पल अपने शिकार की तलाश में रहते हैं और जब उन्हें अपना शिकार मिलता है तो उस पर झपट्टा मारने से वह चूकते नहीं हैं। 

फेकबुक इसी विषय पर केंद्रित कॉमिक बुक है जिसमें जासूस बलराम को एक ऐसे शिकारी को तलाशना है जो कि सोशल मीडिया वेबसाईट का प्रयोग कर अपने शिकार को तलाशता था। 

कॉमिक की शुरुआत जासूस बलराम के एक व्यक्ति से टकराने से होती है जो कि फेकबुक नामक वेबसाईट में बने अपने दोस्त के द्वारा लूटा जा चुका है। जासूस बलराम उस व्यक्ति से जब यह सब जानता है तो वह इस ठग तक पहुँचने का मन बना लेता है। 

वह किस तरह इस ठग दोस्त तक पहुँचता है यह देखना रोचक रहता है। इस कॉमिक में बलराम का असिसटेंट 'सलिम' (सलीम तो मेरा देखा सुना है लेकिन सलिम को पहली बार मैं देख पढ़ रहा हूँ) भी उसका साथ देता दिखता है। कॉमिक बुक रोचक है और इसमें ट्विस्ट भी लेखक ने देने की कोशिश की है जिसमें एक जगह वह सफल होता है और दूसरी जगह वह ट्विस्ट थोड़ा अटपटा लगता है। 

यहाँ इतना ही कहूँगा कि अगर कोई व्यक्ति इतना समझदार है कि वह अपराध करने के लिए वेबसाईट का प्रयोग एक सायबर कैफे में कर रहा है, लूटने के लिए किराये के गुंडे का इस्तेमाल कर रहा है तो वह इतना बेवकूफ़ तो न होगा कि अपने नाम पर जारी किये हुए नंबर से अपराध को अंजाम दे। पहले से ही वह ऐतिहात बरतेगा। कॉमिक का बस यही एक कमजोर पहलू मुझे लगा। जबकि अगर वह सीन कॉमिक में न होता तो शायद इस पर कुछ प्रभाव भी न पड़ता। जासूस बलराम नंबर के बदौलत नहीं सायबर कैफै के बदौलत भी उस तक पहुँचता दर्शाया जा सकता था।  

कॉमिक के आर्टवर्क की बात करूँ तो चूँकि यह आर्टवर्क नए लोगों द्वारा बनाया गया है तो उस हिसाब आर्टवर्क अच्छा है। इसमें कम से कम बलराम की शक्ल शुरू से लेकर अंत तक एक जैसी है। 

अंत में यही कहूँगा कि यह कॉमिक बुक मुझे पसंद आई। इसमें नादान के मुकाबले ज्यादा तहकीकात जासूस बलराम को करनी पड़ी तो जासूसी कथा के रूप में इसने मुझे संतुष्ट किया। आपने नहीं पढ़ा है तो एक बार पढ़ कर देखिए। 

*****


तो यह थी जासूस बलराम के सर्वश्रेष्ठ कारनामें -1 में मौजूद दो कॉमिक बुक्स के प्रति मेरी राय। कुछ बातें ऐसी हैं जो दोनों कॉमिक बुक्स पर लागू होती हैं तो उनके विषय में यहाँ पर लिखना चाहूँगा। 

दोनों कॉमिक्स में हिन्दी की वर्तनियाँ काफी जगहों पर गलत हैं। जैसे शुक्ला को शुकला लिखा गया है, कैलीग्राफी को कैलिग्राफी लिखा गया है, जासूस को जासुस लिखा गया है, मार्क्स को मार्कस लिखा गया है, मुम्बई को मुँबई लिखा गया है इत्यादि। ऐसी गलतियों से बचा जाना चाहिए। कॉमिक बुक में वैसे भी टेक्स्ट इतना नहीं होता है तो ऐसे में ये गलतियाँ खीर में आए कंकड़ की तरह पढ़ने के अनुभव को बिगाड़ने का कार्य करती हैं। 

दूसरी बात यह है कि फेनिल शेरडीवाला इस बात के लिए सराहना के पात्र हैं वह इन प्रोजेक्ट्स में नई टीमों को मौका दे रहे हैं। चूँकि आर्टवर्क अलग अलग व्यक्तियों द्वारा किया जा रहा है तो  कोशिश करें कि जासूस बलराम के चेहरे मोहरे में कुछ ऐसी खासियत लाएँ जिससे सभी आर्टिस्ट उसे एक ही तरह का बनाए। अभी दोनों कॉमिक में जासूस बलराम का चेहरा अलग अलग है। जहाँ फेकबुक में बलराम के चेहरे में एकरूपता दिखती है वहीं नादान में चेहरा फ्रेम दर फ्रेम बदलता रहता है। कभी उसकी नाक सीधी रहती है, कभी मुड़ जाती है। हाँ, उसकी ड्रेस एक रहती है लेकिन अगर चेहरा ऐसा हो जिससे अपनी टिपिकल ड्रेस के बिना भी जासूस बलराम पहचाने में आए तो बेहतर रहेगा।

इन दोनों कहानियों की अच्छी बात यह है कि दोनों शिक्षाप्रद कहानियाँ हैं जो कि समसामयिक विषयों पर बात करती हैं। हर कहानी के अंत में बलराम फोर्थ वाल तोड़कर पाठक से बातचीत करता है जो कि आगे जाकर उससे जुड़ाव पैदा करेगा। 

इस शृंखला के अन्य वॉल्यूम का इंतजार रहेगा। 
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