एक अच्छे कॉमिक बनने का खोया हुआ मौका है 'अंधा जासूस' | तुलसी कॉमिक्स | तरुण कुमार वाही

संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: ई-बुक | प्रकाशक: तुलसी कॉमिक्स | प्लैटफॉर्म: प्रतिलिपि | कथा: तरुण कुमार वाही | चित्र: अजय | सम्पादन: प्रमिला जैन

कॉमिक बुक लिंक: प्रतिलिपि

समीक्षा: अंधा जासूस | तुलसी कॉमिक्स | तरुण कुमार वाही


कहानी

मुंबई इस वक्त दहशत में थी। वहाँ पर कोई था जो लोगों को कत्ल कर उन्हे जला दे रहा था। 

वहीं मुंबई की पुलिस इन जली अधजली लाशों को उठाने के सिवा और कुछ नहीं कर पा रही थी। 

प्रभाकर एक प्राइवेट डिटेक्टिव था। प्रभाकर के दोस्त रवि दिनकर के छोटे भाई आशीष दिनकर जब इस अज्ञात हत्यारे का शिकार बना तो प्रभाकर ने इस हत्यारे को ढूँढ निकालने का फैसला कर लिया। 

लेकिन परिस्थितियों के चलते जब प्रभाकर नेत्रहीन हो गया तो उसे अपना यह मिशन अब असंभव लगने लगा। 

आखिर कौन था वह अज्ञात हत्यारा जो मुंबई में जली हुई लाशों का ढेर लगा रहा था? 
वह ऐसा क्यों कर रहा था?
प्रभाकर की आँखों की ज्योति कैसे चली गयी? 
क्या प्रभाकर कातिल को पकड़ पाया और यह कार्य करने के लिए उसे कितने पापड़ बेलने पड़े?


विचार

कुछ शीर्षक ऐसे होते हैं जिन्हें सुनकर आपकी कल्पनाओ के घोड़े दौड़ने लगते हैं और आप यह देखने के लिए लालायित हो जाते हो कि लेखक ने इस शीर्षक से साथ आए कथानक में आपको क्या परोसा होगा? एक पाठक के रूप में किसी रचना को पढ़ते वक्त उससे ज्यादा अपेक्षा नहीं रखता हूँ फिर भी कई बार ऐसे शीर्षक जो आपको ठहरने के लिए मजबूर कर दें को देखकर कहानी का अंदाजा लगाने से खुद को रोक नहीं पाता हूँ। अंधा जासूस भी एक ऐसा ही शीर्षक था जिसे जब प्रतिलिपि में तुलसी कॉमिक्स के संग्रह में देखा तो इसने मुझे रुकने पर मजबूर कर दिया। जासूसी कहानियाँ मुझे पसंद आती हैं और एक अंधा जासूस किस तरह की जासूसी कर सकता है यह देखने के लिए मैंने इस कॉमिक बुक को पढ़ने का मन बना लिया। 

कॉमिक बुक अंधा जासूस की शरुआत अच्छी थी। कथानक की शुरुआत मुंबई में जगह-जगह पर मिल रही जलती लाशों से होती है। एक के बाद एक लाशों के मिलने के सिलसिले से पुलिस परेशान रहती हैं। वहीं जब परिस्थितियों के चलते जब जासूस प्रभाकर इस मामले से जुड़ता है तो कॉमिक एक जासूसी कहानी के रूप में आगे बढ़ता है। अपनी जासूसी के चलते वह किन चीजों से टकराता है और किस तरह असल कातिल से भिड़ता है यह देखना रोचक रह जाता है। खलनायक से भी आप मिलते हो और वह अपनी कुटिलता से आपको काफी प्रभावित करता है। 

लेकिन चूँकि शीर्षक अंधा जासूस है तो आप उस अंधे जासूस का इंतजार करते रहते हो। लेकिन फिर कुछ घटनाएँ ऐसी घटित होती हैं कि प्रभाकर अपनी आँखों की रोशनी खो देता है। अब प्रभाकर ही वह अंधा जासूस बन चुका है जिसका अब तक आपको इंतजार था। अब आप ये देखना चाहते हो कि प्रभाकर अपनी आँखों की ज्योति खोने के बाद इस मामले को कैसे सुलझाएगा? आँखों की ज्योति के बिना एक आसान मामला और एक आम सा खलनायक भी एक बड़ा मसला बन सकता है ऐसे में आप ये देखना चाहते हो कि हमारा नायक इस जटिल मसले (क्योंकि खलनायक मिलेगा कहाँ ये कोई नहीं जानता) और इस खतरनाक खलनायक से कैसे पार पाता है?

लेकिन यही वह बिन्दु है जब रायता फैल जाता है। यहाँ पर आकर कहानी जो अब तक यथार्थ का थोड़ा बहुत दामन थामे चल रही थी वह यथार्थ को छोड़ एक फंतासी का रूप अख्तियार कर लेती है। जैसे जैसे अब कहानी आगे बढ़ती है आप यह सोचने को मजबूर हो जाते हो कि लेखक की आखिर क्या मजबूरी रही होगी कि उसने ऐसी कहानी जो कि काफी रोमांचक और पठनीय बन सकती थी को इस तरह कबाड़ा करने की सोची। हैरत करने वाली बात ये भी है कि इस प्रोजेक्ट में एक संपादक और एक आर्टिस्ट भी जुड़े हैं जिन्होंने भी बिना कोई हुज्जत किए न केवल इस कहानी पर काम किया बल्कि इसे प्रिन्ट होने की अनुमति भी दी।  फंटासी के तत्व के विषय में यहाँ बस इतना ही कहूँगा कि 80-90 के दशक के मुंबई में चलती इस कहानी में अचानक एक ऐसी मशीन पैदा हो जाती है जिससे अंधे न आँख वालों के समान देख सकते हैं और अपना हीरो ऐसे मामला सुलझा देता है जैसे उसकी आँखों की रोशनी कभी गयी ही न हो। और इस तरह अंधा जासूस एक अच्छे कॉमिक बनने का खोया हुआ मौका बनकर ही रह जाती है। 

इस बिन्दु के बाद कहानी आगे पढ़ने की इच्छा मेरी खत्म ही हो गयी थी। बस जैसे तैसे पढ़ा। मुझे लगता है इसका अंत ठीक था। लेखक ने उस अंत से एक शिक्षा भी पाठकों को देने की कोशिश की है।  कातिल के कातिल बनने के पीछे एक कारण दिया है जो कि समझा जा सकता है कि कैसे कोई उस कारण के चलते पागल हो जाता है। अगर ऊपर वाला फंटासी वाला बिन्दु न होता और जासूस अपने अंधेपन के कारण उपजी मुसीबतों से जूझकर कातिल तक पहुँचता तो यह एक अच्छा कॉमिक बना होता जिसे पढ़ने में मज़ा आया होता। कातिल और जासूस की इस मुठभेड़ को रोमांचक बनाने के लिए लेखक जासूस के अंधेपन को इस्तेमाल कर सकते थे। 

लेकिन अफसोस ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। 

एक कॉमिक बुक के प्रशंसक के रूप में एक अच्छे आईडिया का इस तरह बेकार होना कम से कम मुझे तो बहुत बुरा लगा। मैं जरूर जानना चाहूँगा कि तरुण जी ने कहानी का ये कबाड़ा क्या सोच कर किया? 

कहानी के आर्टवर्क की बात करूँ तो इसका आर्टवर्क मुझे पसंद आया। अजय जी द्वारा किया गया ये आर्टवर्क नन्दन, पराग इत्यादि में आता था जहाँ पर व्यक्ति बॉडी बिल्डर जैसा न होकर आम आदमी सरीखा होता था। मुझे ऐसे आर्टवर्क हमेशा से बॉडीबिल्डर वाले आर्ट से बेहतर लगे हैं। कॉमिक के ज्यादातर पैनल अच्छे हैं लेकिन एक्शन सीक्वेंस में थोड़ा काम करना चाहिए था। उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे आर्टिस्ट ने अपने घर के किसी बच्चे को या अपने किसी शिष्य को उन्हें बनाने के लिए दे दिया हो। 

अंत में कहने के लिए कुछ है नहीं। बस यही कहूँगा कि अगर आप भी ऐसे कॉमिक बुक्स जानते हैं जो कि बस एक अच्छे कॉमिक का बनने का खोया हुआ मौका बनकर रह गयी तो मुझे उनके विषय में जरूर बताइएगा। 

कॉमिक बुक लिंक: प्रतिलिपि


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2 Comments
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  1. मैंने यह कॉमिक पढ़ी थी और प्रतिलिपि ऐप पर इसकी समीक्षा भी लिखी थी।
    निजी तौर पर मुझे इस कहानी से कोई उमीद नही थी और मैं जानता था कि इसके नाम बड़े और दर्शन छोटे होंगे। हुआ भी वही।
    दिनकर एक कुशल अविष्कारक था जिसने प्रभाकर के लिए एक ऐसी मशीन बना दी थी कि वह देखने लग गया था। यदि वह इतना ही समझदार था तो खुद भी अपने भाई के कातिल को पकड़ सकता था, प्रभाकर के होने न होने से कहानी में फ़र्क नही पड़ता।
    कहानी इस तरह भी घुमाई जा सकती थी कि दिनकर एक अविष्कारक था जो एक हादसे के बाद अपनी आंखें खो देता है उसी के साथ अपनी प्रेरणा भी जीवन जीने की। पर जब उसके भाई की हत्या होती है तो वह डोरेमॉन के माफिक गैजेट बना(विज्ञान कथा बन सकती थी कहानी) हत्यारे को पकड़ता है। कहानी टैब प्रेरणादायक लगती।

    खलनायक का उद्देश्य मुझे अधपका लगा।
    उसे दुनिया जलानी थी तो वह गोदामो, डॉक्स या बस्तियों में आग लगा सकता था।

    किसी भी राह चलगे रेंडम व्यक्ति को मारना मुझे हज़म नही हुआ।
    ऐसा लगा जैसे लेखक ने अंत ववत में उद्देश्य सोचा। हादी लेखक को दंगो के खिलाफ सिख देनी ही थी तो वह खलनायक के हाथों दंगाइयों को मरवाते दिखाता।

    आइडिया अच्छा था पर लेखक महोदय इसे अच्छे से विस्तार न दे सके।

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    1. आपकी समीक्षा पर मेरी नजर गयी थी। आविष्कारक के ही जासूसी करने के तर्क पर मैं सहमत नहीं हूँ। दो अलग तरह का कौशल चाहिए होता है। कई बार बड़े बड़े वैज्ञानिक स्ट्रीट स्मार्ट नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए जिस तरह से पीआई प्रभाकर ने उन गुंडों को धूल चटाई थी मुझे नहीं लगता कि आम वैज्ञानिक ऐसा कर सकता था क्योंकि उसे उनसे उलझने का अनुभव नहीं होगा। ऐसे में वह पहली मुठभेड़ में ही मारा जा सकता था। फिर उसे कहाँ किसको तलाशना है यह वही व्यक्ति जान सकता है जिससे ऐसे मामलों से दो चार होने का अनुभव हो। ऐसे में वह जासूसी नहीं ही कर पाएंगे। इसलिए आविष्कारक का जासूस न होना मुझे जम गया था।

      रही बात शैतान के द्वारा किए गए कृत्य की तो मैं इधर ये मान कर चल रहा था कि उसके साथ जो चीज घटित हुआ उससे उसका मानसिक संतुलन हिल गया था। उसने अपने मन में हर किसी को उसके साथ घटित हुये अन्याय का कारण मान लिया। वो जो दंगे में शामिल थे और वो जो चुपचाप ये सब होते देखते रहे। इसलिए वह इस तरह से कार्य कर रहा था कि पकड़ा भी नहीं जाए और खुद को शांति दे सके। ऐसे में उसके द्वारा किए गए कत्ल आम व्यक्ति के लिए तर्कसंगत नहीं होंगे लेकिन मुझे उसके द्वारा किए जा रहे कार्यों से दिक्कत नहीं हुई। मनुष्य कई बार ऐसे ही प्रतिक्रिया देता है। उदाहरण के ऐसा देखा गया है कि कई यौन शोषण करने वाले अपराधी ऐसे होते जिनका बचपन में खुद शोषण हुआ रहता है। कायदे से उनकी नफरत यौन शोषण करने वाले के प्रति होनी चाहिए लेकिन अक्सर वह खुद शोषक बन जाते हैं। ये तर्कसंगत नही है लेकिन ऐसे मामले देखने को मिलते हैं। चूँकि मैं इस पहलू से वाकिफ था तो शैतान द्वारा किए गए कृत्य मुझे ऐसे नहीं लगे कि उन्हें हजम न किया जा सके। हो सकता है लेखक ने इतना कुछ सोचा हो या फिर तुक्के से ऐसी बात निकल कर आ गयी हो जिस पर इस तरह से भी सोचा जा सकता है।

      आपकी आखिरी बात से सहमत हूँ कि आईडिया अच्छा था लेकिन इसका क्रियांवन जिस तरह से हुआ वह निराश करता है।

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