आतंक का पहाड़ | अनिल मोहन | देवराज चौहान

 संस्करण विवरण

फॉर्मैट: पैपरबैक | पृष्ठ संख्या: 224 | प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स | शृंखला: देवराज चौहान 




कहानी 

नसीम अहमद बिल्लौरी उर्फ आतंक का पहाड़  एक खूँखार आतंकवादी था जिसको भारत सरकार चाहकर भी अब तक नहीं पकड़ पाई थी। उसी आतंक के पहाड़ ने दिल्ली से मद्रास जाने वाले हवाई जहाज को हाईजैक कर लिया था। अब वह हवाई जहाज यात्रियों  समेत आतंक के पहाड़ के ठिकाने में मौजूद था।

और आतंक के पहाड़ ने यात्रियों को छोड़ने के एवज में ऐसी शर्त रखी थी जिसे मानना देश के लिए हानिकारक हो सकता था।  

इसी जहाज पर बदकिस्मती से देवराज चौहान अपने साथियों के साथ मौजूद था। 

आखिर आंतक का पहाड़ ने उस हवाई जहाज को हाईजैक क्यों किया था? 

देवराज चौहान अब क्या करने वाला था? 

किरदार 

नसीम अहमद बिल्लौरी उर्फ आतंक का पहाड़ - एक खूँखार आतंकवादी
देवराज चौहान - डकैती मास्टर 
जगमोहन - देवराज चौहान का जिगरी दोस्त 
सुंदर सिंह त्रिपाठी - हवलदार जो विमान में मौजूद था
दीपा सिंह त्रिपाठी - सुन्दर की बीवी
भीमसिंह - तालातोड़ जिसने देवराज के साथ नैशनल बैंक डकैती में भाग लिया था
पार्वती - भीम सिंह ते पत्नी
रूपलाल - जेल से फरार फाँसी पाया मुजरिम और बैंक डकैती में देवराज का साथी 
हल्दीराम - एक अपराधी और पार्वती का बाप 
नगीना - देवराज की साथी 
इन्स्पेक्टर बलराम सिंह कालिया - इंस्पेकटर जिस पर नैशनल बैंक की सुरक्षा का जिम्मा था 
सब इन्स्पेक्टर सूरज भान यादव - कालिया का मातहत 
इन्स्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े - वह इन्स्पेक्टर जिसके ऊपर देवराज चौहान को पकड़ने की जिम्मेदारी थी
रशीद उर्फ टोनी - आतंक का पहाड़ का साथी 
गजाला - एक खतरनाक अपराधी जो कि विश्व विजय का सपना देख रही थी
थापर - एक अपराधी जिससे गजाला प्यार करती थी 

मेरे विचार

आतंक का पहाड़ अनिल मोहन की देवराज शृंखला का उपन्यास है। वैसे तो इस उपन्यास की कहानी दौलत खतरे में उपन्यास से आगे बढ़ती है लेकिन फिर भी लेखक ने इस उपन्यास दौलत खतरे में के विषय में इतनी जानकारी दे दी है कि मुझ जैसे पाठक जिसने दौलत खतरे में नहीं पढ़ी थी वह भी इस उपन्यास का लुत्फ ले पाया था। लेकिन अगर आपके पास दौलत खतरे में मौजूद है तो मेरी राय यही रहेगी कि आप उस उपन्यास को पहले पढ़े। 

आतंक का पहाड़ के उपन्यास की बात करें तो इस उपन्यास मुख्यतौर पर तीन घटनाक्रम होते हैं। 

उपन्यास की शुरुआत एक प्लेन के हाईजैक से शुरू होती है। बदकिस्मती से देवराज और उसके साथी भी इस प्लेन में होते हैं। यह साथी कौन है? वह कैसे प्लेन में आए और किस तरह देवराज उन्हें इस मुसीबत से बचाता है यही उपन्यास का प्रमुख  हिस्सा बनता है। 

उपन्यास के दूसरे हिस्से में देवराज चौहान का गजाला से साक्षात्कार होता है जहाँ देवराज के साथ साथ पाठक भी गजाला की ताकत और उसके मंसूबों से वाकिफ होता है। 

उपन्यास के तीसरे हिस्से में देवराज के सामने वापिस आतंक का पहाड़ आता है और इनके बीच आखिरी टकराव होता है। 

इन तीनों घटनाक्रमों की बात की जाए तो हाईजैक प्लेन में देवराज चौहान के होने का विचार रोमांचक है। जब उपन्यास की शुरुआत हुई तो मैं यही सोच रहा था कि वह किस तरह इस मुसीबत से पार पाएगा। मेरी कल्पना के घोड़े एक रोमांचक कथानक की तलाश में दौड़ने लगे थे लेकिन जो कथानक प्रस्तुत हुआ वह बेहद सीधा सपाट और सरल था जिसमें रोमांच गायब था। 

कई बार जब व्यक्ति का कद हद से बड़ा हो जाता है तो कुछ चीजें उसके लिए आसान हो जाती हैं और पाठक के लिए ऐसे नायक के किस्से पढ़ने में कोई रोमांच नहीं बचता है। उपन्यास के शुरुआती हिस्से में देवराज एक ऐसा ही नायक है जिसका नाम इतना हो चुका है कि उसके कारण उसे ऐसे मौके मिल जाते हैं जिसके चलते वह काफी आसानी से प्लेन के बंधकों को छुड़वा देता है। ऐसा करने के दौरान एक्शन जरूर रहता है लेकिन चूँकि खलनायक इस तरह का बनाया है जिसका व्यक्तित्व देवराज के आगे उतना ठहरता नहीं है तो रोमांच नदारद रहता है। हाँ इस उपन्यास में देवराज का देशभक्त स्वरूप भी देखने को मिलता है। यह उसे एक तरह से सकारात्मक रूप जरूर दे देते हैं लेकिन जिस तरह से देशभक्ति को लेकर उसके विचार हैं उन्हें पढ़कर कुछ कुछ जगह आपकी हँसी जरूर छूट जायेगी। 

उपन्यास के दूसरे हिस्से में देवराज की गजाला से मुलाकात जरूर रोचक है। गजाला की ताकतें विज्ञान गल्प सरीखी लगती हैं और देवराज पर उसका जो असर दिखता है वह रोमांच पैदा करता है। सचमुच गजाला ऐसा गोलियाथ है जिसके आगे देवराज डेविड सरीखा है। और इनकी यह मुलाकात इनका आखिरी टकराव देखने के लिए उत्सुक कर देती है। 

उपन्यास के आखिरी भाग में वापिस देवराज और आतंक का पहाड़ आमने सामने आते हैं लेकिन इधर भी खलनायक कोई खास असर नहीं डाल पाता है। इस कारण यह टकराव प्रभावी नहीं रहता है। 

ऐसे में कथानक एक तरह से गजाला और देवराज के आने वाले टकराव की भूमिका तो तैयार करता है लेकिन उतना रोमांच पैदा नहीं कर पाता है जितना कि तब कर पाता जब आतंक के पहाड़ को थोड़ा ज्यादा प्रभावी बनाया होता। 

उपन्यास के किरदारो की बात करूँ तो उपन्यास का शीर्षक आतंक का  पहाड़ है जो कि देवराज के सामने पहाड़ सरीखा नहीं लग पाया है। 

हल्दीराम का किरदार रोचक है। वह एक घुटा हुआ अपराधी है और अपनी हरकतों से प्रभावित करता है। वहीं पार्वती, रूपलाल और भीमसिंह कथानक के अनुरूप है। रूपलाल का प्रसंग और उसके साथ जो कुछ होता है वह  जरूर कहानी में रोमांच पैदा करता है। वहीं हवलदार त्रिपाठी और उसकी बीवी भी रोचक किरदार हैं। इनकी आपसी तू तू मैं मैं पढ़ने में रोचक है। वहीं आखिर में जो हरकत दीपा करती है और जिस तरह करती है उससे बरबस ही आपकी हँसी निकल जाती है।  इन सभी किरदारों के बीच का समीकरण देखने लायक है और दौलत के खातिर को पढ़ने के लिए ये प्रेरित करते हैं जहाँ ये अपने पूरे जलाल पर रहे होंगे।  

कहानी में देवराज के साथी के रूप में जगमोहन और नगीना है।  जगमोहन तो देवराज का साथी है जिससे काफी उपन्यासों में मिल चुका हूँ। वह देवराज का साथ हमेशा की तरह निभाता आया है। नगीना के किरदार से यह पहली मुलाकात थी और उसके बारे में और जानने के लिए उत्सुक हो चुका हूँ। अगर मुझे पुराने उपन्यास मिलते हैं तो नगीना वाले उपन्यास मैं जरूर पढ़ना चाहूँगा। 

इनके अलावा पवन कुमार वानखेड़े का किरदार भी प्रभावशाली है। इस उपन्यास में ये भी पता लगता है कि वह पुलिस वाला होने के अलावा एक गुप्त सरकारी संस्था का सदस्य भी है। यह जानना रोचक था। पवन और देवराज के बीच के समीकरण भी रोचक है और इनकी मुलाकत भी मनोरंजक है। देखना होगा आगे इनके बीच क्या क्या घटित होता है। 

इस उपन्यास की हाईलाइट की बात करूँ तो वह गजाला ही होगी। उसकी ताकत देखकर मज़ा आ जाता है। ऊपर उसके विषय में काफी कुछ लिख चुका हूँ तो इधर यही कहूँगा कि वह देवराज के लिए टक्कर की खलनायक है। मज़ा आने वाला है।  

उपन्यास की  कमियों की बात करूँ तो एक कमी देवराज के लिए मुसीबत का आसान होना था और दूसरा इसके खलनायक आतंक के पहाड़ का ज्यादा प्रभावशाली न होना था। इन दोनों कमियों के कारण उपन्यास में रोमांच का तत्व कमजोर है। इसके अलावा इक्का दुक्का प्रूफरीडिंग की गलतियाँ भी दिखीं। जैसे:

पृष्ठ 200 में कॉफी पृष्ठ 202  में चाय बन जाती है।

देवराज चौहान ने नहा-धोकर कपड़े बदले फिर कॉफी के दौरान जगमोहन और नगीना से बात की। पृष्ठ 200

"जब भी जरूरत पड़े थापर को साथ ले लेना। ", देवराज चौहान चाय का प्याला समाप्त करके उठता हुआ बोला। 

पृष्ठ 223 में जब देवराज और आतंक के पहाड़ का एक्सीडेंट होता है और त्रिपाठी की एंट्री होती है तो एंट्री दिखलाती काफी वाक्य गायब हैं। यह पढ़ने का लय बिगाड़ देता है। आपको पता तो है कि क्या हुआ होगा लेकिन यह केवल आपका अंदाजा भर रहता है।  


अंत में यही कहूँगा कि आतंक का पहाड़ जिस सोच के तहत लिखा गया था वह सोच तो अच्छी थी लेकिन अगर ऊपर बताई गई कमियों पर काम होता तो यह अपने वर्तमान रूप से बहुत बेहतर बन सकता था। उपन्यास को एक बार पढ़ा जा सकता है। बहरहाल इसके पहले भाग दौलत खतरे में को मैं जरूर पढ़ना चाहूँगा। साथ ही यह उपन्यास गजाला के प्रति उत्सुकता जगाने में कामयाब हुआ तो उससे जुड़े उपन्यास भी पढ़ना चाहूँगा। 


अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? मुझे अपने विचारों से जरूर अवगत करवाइएगा। 


अमेज़न में मौजूद अनिल मोहन के दूसरे उपन्यास: 

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