मौत का नाच | तुलसी कॉमिक्स | मलय चक्रवर्ती

संस्करण विवरण:

फॉर्मैट: ई-बुक  |  प्रकाशक: तुलसी कॉमिक्स | लेखक: मलय चक्रवर्ती | संपादन: प्रमिला जैन | चित्रांकन: संजय विसपूते |  आवरण चित्र: अनिल उपलेकर

कॉमिक बुक लिंक: प्रतिलिपि
comic book review: Maut Ka Naach | समीक्षा: मौत का नाच

कहानी


राघव के परिवार वालों की रातों की नींद उड़ चुकी थी। कोई था जो एक-एक करके उसके परिवार के सदस्यों को मार रहा था। कोई था जो उनके घर में मौत का नाच खेल रहा था। 

वहीं जब राघव ने अपने पुलिस अफसर दोस्त गोविंद से मदद की गुहार लगाई तो वह भी उसके परिवार वालों की जान बचाने में असफल साबित रहा। 

आखिर कौन था जो राघव के परिवार के पीछे पड़ा था?
वह राघव के परिवार वालों की जान क्यों लेना चाहता था?
मौत के इस नाच का आखिर में क्या अंत निकला?

मुख्य किरदार

राघव - एक अमीर व्यक्ति 
शंकर - राघव का लड़का 
रचना - राघव की पत्नी 
ज्ञानेन्द्र - रचना का पिता 
वीरेंद्र - रचना का चाचा 
इन्स्पेक्टर गोविंद - राघव का दोस्त 
महादेव - रचना का भाई 

मेरे विचार

दहेज प्रथा हमारे समाज में फैली ऐसी बीमारी है जिसके चलते समाज में लड़कियों की स्थिति बहुत बुरी हुई है। बेटी की शादी में दिये जाने वाले दहेज का डर माँ बाप पर इतना रहता है कि वो लड़की पैदा होते ही उसे जिम्मेदारी की तरह देखने लगते हैं। जिसकी जितनी ज्यादा लड़कियाँ होंगी उसको उतना दहेज देना होगा। यह सोच आज भी सब पर हावी है जिसके चलते लड़की के पैदा होने को बुरी खबर ही समाज में मान लिया गया है। पर फिर भी लोग शिक्षा नहीं ले रहे हैं और दहेज प्रथा निरंतर चलती जा रही है। कई बार जो व्यक्ति अपनी बेटी के दहेज के लिए परेशान रहता है वही अपने बेटे की शादी के वक्त सीना चौड़ा करके दहेज माँगता दिखता है और इसलिए यह सामाजिक प्रवृत्ति बनी रहती है। दहेज के ये लोभी शादी के वक्त तो दहेज की माँग करते ही हैं लेकिन बाद में भी बहुओं को प्रताड़ित करने से बाज नहीं आते हैं। कई महिलायें ये यातनाएँ सहती रहती हैं क्योंकि उन्हे समाज ने इस तरह से बना दिया है कि कुछ कहना या विरोध करना उन्हे अपनी इज्जत बदनाम करना लगता है। वहीं मायके वालों का लड़की  को 'अब ससुराल ही उसका घर है' या 'ससुराल में लड़की डोली में आती है अर्थी में जाती है' जैसी बातें कहना भी लड़की को अपनी स्थिति को घर वालों के सामने लाने से हतोत्साहित करता है। इस कारण कई बार लड़की के माँ-बाप तक इन यातनाओं की खबर तब पहुँचती है जब बहुत देर हो चुकी होती है और उनकी लाडली जिसे उन्होंने पलकों पर बिठाया था वो इन धनलोलुप पशुओं की धन पिपासा का ग्रास बन मृत्यु की गोद में समा चुकी होती है। ऐसे मामलों में जो ताकतवर होते हैं वह कानून के मुँह पैसों से बंद कर देते हैं और पीड़ित सिवाय न्याय व्यवस्था को कोसने के कुछ नहीं कर पाता है।  

प्रस्तुत कॉमिक बुक मौत का नाच भी दहेज और दहेज के लोभियों के इर्द गिर्द ही बुना गया है। कहानी मलय चक्रवर्ती की है और उनकी कहानी को चित्रों से संजय विसपूते द्वारा सजाया गया है। आवरण चित्र अनिल उपलेकर द्वारा बनाया गया है। 

राघव का परिवार लालची परिवार है जिसने धन के लालच में अपने बहु को जलाकर मार दिया था। अब इस परिवार के साथ आगे क्या होता है यह कथानक बनता है। कहानी रोचक है और पाठक पर अपनी पकड़ बनाकर चलती है। कानून व्यवस्था कैसे समर्थ के साथ रहती है यह लेखक ने दिखाया है। कुछ चीजें अतिनाटकीय हैं लेकिन चूँकि यह एक कॉमिक बुक है तो इसकी अपेक्षा इससे होनी चाहिए इसलिए खलती नहीं है। राघव के परिवार के साथ क्या होगा और पीड़ित को न्याय कैसे मिलेगा यह देखने के लिए आप कहानी पड़ते चले जाते हैं। कहानी के आगे बढ़ने पर इसमें एक रहस्यमय कातिल भी आ जाता है। यह कातिल कौन है और परिवार वाले इसके प्रकोप से बच पाएंगे या नहीं यह देखने की उत्सुकता भी आपको कॉमिक के पृष्ठ पलटते चले जाने के लिए विवश कर देती है। 

कॉमिक बुक का आर्टवर्क कहानी के न्याय करता है। मुझे सुपरहीरो कॉमिक्स में बने हुए चित्र इतने पसंद नहीं आते हैं क्योंकि वो आम आदमियों जैसे नहीं दिखते हैं। यहाँ ऐसा नहीं है तो चित्र पसंद आए हैं। 

कॉमिक बुक की कमी की बात करूँ तो इसकी एक कमी इसके अंत का ट्विस्ट रहता है। रहस्यमय कातिल कौन है यह जब आपको पता चलता है तो वह एक बड़ा सा प्रश्न आपके समक्ष छोड़ देता है। ज्यादा न कहते हुए मैं इतना कहूँगा कि पहले तो मैं ये कभी नहीं चाहूँगा कि मैं लोगों के समक्ष झूठ-मूठ यह दर्शाऊँ कि मेरी मौत हो गयी है। फिर भी किसी कारणवश अगर ऐसा होता है तो अपने नजदीकियों को इस झूठ में शामिल तो करूँगा ही ताकि वो कोई अनुचित कदम न उठाएँ और उन्हें कोई हानी न हो। इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा। कॉमिक बुक प्रतिलिपि पर मुफ़्त में पढ़ने के लिए उपलब्ध है। आप पढ़ेंगे तो जान पाएंगे कि मैं क्या कह रहा हूँ। अभी इतना ही कहूँगा कि लेखक ने ट्विस्ट अच्छा दिया था लेकिन इस ट्विस्ट को और मजबूती दिये जाने की जरूरत थी। 

अंत में यही कहूँगा कि कॉमिक बुक एक बार पढ़ा जा सकता है। वहीं दहेज के विषय में मुझे इतना कहना है कि कभी भी धनलोलुप पशुओं से अपनी लाडली की शादी न करवाएँ। उन्हे पढ़ा लिखाकर आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाएँ। कई बार ये पाश्वीक लोग पहले तो संभ्रांत होने का ढोंग करते हैं लेकिन शादी के दिन अपने चेहरे से मुखोटा उतार कर अपने असली रूप को वधू पक्ष को दिखाते हैं। उस वक्त वधू पक्ष समाज में अपनी इज्जत के कारण इनकी नाजायज माँगों को मान लेते हैं जो कि गलत है। इन बातों का उसी समय प्रतिकार होना चाहिए और वधू पक्ष को शादी से इंकार कर देना चाहिए। समाज को भी उनके इस कदम की सराहना करनी चाहिए।  समाज से दहेज की बीमारी हटेगी तो समाज में कन्या की स्थिति सुदृढ़ होगी और तब शायद कन्याओं के पिता को बेचारगी की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा।


कॉमिक बुक लिंक: प्रतिलिपि

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