वाईपर - गोपाल शर्मा

संस्करण विवरण:
फॉर्मैट: पेपरबक | एएसआईएन: B09BQZDZS2 | प्रकाशक: अजय पॉकेट बुक्स | शृंखला: वाईपर

किताब लिंक: अमेज़न

समीक्षा: वाईपर - गोपाल शर्मा


कहानी 

आर डी चौधरी देश का एक बहुत बड़े नेता था जिन्हें जनता बहुत प्यार करती थी। पर कोई था जो आर डी चौधरी को बर्बाद करना चाहता था। उसने आर डी चौधरी को राजनीति से सन्यास लेने की धमकी जारी की थी। 

जब आर डी चौधरी ने अपनी परेशानी प्रधान मंत्री के सामने रखी तो उन्होंने भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसी रॉ को यह मामला सौंपा। 

अब यह मामला रॉ के अधीन था और रॉ ने इस मामले की जाँच वाईपर को सौंपने का निर्णय लिया।

आखिर कौन था ये वाईपर? 
रॉ ने जाँच उसे क्यों सौंपने का फैसला किया?
आर डी चौधरी को कौन ब्लैकमेल कर रहा था? 
उसने उन्हें क्या धमकी जारी की थी? 
ब्लैकमेलिंग से वह क्या हासिल करना चाहता था?

ऐसे ही कई सवालों का जवाब आपको इस उपन्यास को पढ़ने से प्राप्त हो जायेंगे।


मुख्य किरदार

शरद शर्मा - रॉ का एक एजेंट जो कि अपनी आम ज़िंदगी में मोड एक्सपोर्ट कंपनी में काम करता था
सुनंदा शर्मा - शरद की पत्नी 
गायत्री - शरद की माँ 
ब्रजभूषण शर्मा- सुनंदा के पिता 
राम दयाल चौधरी - सत्यमेव पार्टी के अध्यक्ष 
प्रोमिला चौधरी - राम दयाल चौधरी की बेटी 
वेंकटस्वामी - रॉ का चीफ 
रहमान अंसारी - हायड पार्क गर्ल्स हॉस्टल का चौकीदार 
कैनीवर्थ - एक युवती जो प्रोमिला की दोस्त थी 
क्रिस्टोफ़र वासेल - एक ब्रोकर जिससे शरद कैनीवर्ध के घर के बाहर मिला था 
फिरोज खान - एक कश्मीरी युवक जो प्रोमिला का दोस्त था 
बुल्ले खान -  पाकिस्तानी ड्रग डीलर 
भरत - रॉ का एक एजेंट और शरद का मामा 
गुलबदन - फिरोज की बहन 
शाहबानो - एक कश्मीरी युवती जो शोरा बस्ती में रहती थी 
जंगसार खान - शाहबानो का पिता जो पाकिस्तान के साथ था 
साबिर अली  - एक कश्मीरी युवक जिसके पिता को जंगसार खान ने मार दिया था 
मुश्ताक आली - आईएसआई का बड़ा ताकतवर जासूस 
सगीर,जुम्मन - आतंकवादी जो मस्जिद में छुपे थे 
अख्तरी - शाहबानो की माँ 
इदरिस अली - साबिर के पिता 
रहमतुल्ला - एक व्यक्ति जो मुश्ताक के लिये लड़की लाया था 
मस्ताना - डाक बंगले में रहने वाला फोरेस्टर 
जानिब कुरेशी - पाकिस्तानी सेना का कर्नल 


मेरे विचार

अजय पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित वाईपर लेखक गोपाल शर्मा का लिखा हुआ उपन्यास है। यह इस शृंखला का पहला उपन्यास है।  इस उपन्यास की घोषणा जब हुई थी तब मुझे लगा था कि यह एक नवीन उपन्यास है लेकिन फिर नेट पर इसकी जानकारी तलाशते हुए मैं गुरप्रीत जी के ब्लॉग से गुजरा था जहाँ से पता चला कि लेखक ने वाईपर को लेकर पहले से ही एक शृंखला लिखी है। उनके पास वाईपर को लेकर लिखे गए कहर बरसायेगा वाईपर, वाईपर की टक्कर, लाश गिरेगी वाईपर नामक उपन्यास मौजूद थे। इससे यह तो साफ हो गया था कि यह उपन्यास शायद एक रीप्रिन्ट है। इसके अलावा उपन्यास जब आप पढ़ते भी हैं तो इसे पढ़ते हुए भी यह अहसास होता है कि इसका कथानक आज के समय में नहीं बल्कि आज से कुछ दशक पूर्व के समय में घटित होता है। ऐसे समय में जब लोग वी सी आर में वीडियो देखा करते थे। यह बात भी इस और इशारा करती है कि उपन्यास पुराना है। 


पर इन बातों के अलावा उपन्यास मे कहीं भी इस चीज को साफ नहीं किया गया है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि उपन्यास के अंत में वाईपर शृंखला के उपन्यासों और इसके लेखक के विषय में जो भी उपलब्ध जानकारी है वो लिखी हुई होती तो पाठकों के लिये अच्छा होता। वहीं उपन्यास की शुरुआत में उपन्यास के विषय में  संपादक कमलदीप या प्रकाशक अजय पॉकेट बुक्स के तरफ से कुछ शब्द लिखे होते जो कि इस बात से पाठकों को अवगत करवाते कि वाईपर का पहला उपन्यास कब प्रकाशित हुआ था तो शायदअच्छा रहता। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि अगर पाठक इस उपन्यास को नया कथानक समझकर पढ़ता है तो उसे यह कथानक आउट ऑफ डेट लग सकता है लेकिन अगर उसे पता रहे कि यह एकउपन्यास पुनः प्रकाशन है तो वह इसी हिसाब से कथानक को पढ़ेगा।


अब उपन्यास पर आयें तो वाईपर उपन्यास का कथानक एक ब्लैकमेल की घटना से शुरू होता है जिसे सुलझाने की जिम्मेदारी भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के ऊपर आ जाती है। रॉ के पास यह समस्या आती है तो समस्या सुलझाने के लिये अपने एक एजेंट वाईपर को इस काम पर लगाती है। यहाँ वाईपर कोई व्यक्ति नहीं है बल्कि एक पदवी है जो कि रॉ के एक एक विशिष्ट एजेंट को दी जाती है। 


प्रस्तुत उपन्यास में शरद नाम के एक एजेंट को वाईपर की पदवी दी गयी है। उपन्यास पढ़ते हुए ऐसा भी लगता है कि वाईपर के रूप में यह मिशन शरद का पहला मिशन है। अपने मिशन के चलते शरद को पहले लंदन, फिर काश्मीर और आखिरकार पाकिस्तान की धरती पर जाना पड़ता है। वह इन जगहों पर क्यों जाता है और इन जगहों पर कैसी मुसीबतों का सामना करता है यही उपन्यास का कथानक बनते हैं। 

उपन्यास ब्लैकमेल से जरूर शुरू होता है लेकिन आगे जाकर पहले युवाओं में मौजूद ड्रग्स की समस्या और फिर उसके आगे जाकर यह काश्मीर में मौजूद आतंकवाद की समस्या को रेखांकित करता है। किस तरह युवा ड्रग्स के चक्कर में बर्बाद हो रहे हैं यह यहाँ दर्शाया गया है। वहीं पड़ोसी मुल्क किस तरह अपने स्वार्थ एक चलते वहाँ के लोगों को बरगला रहा है यह इधर दृष्टिगोचर होता है। काश्मीर के कुछ लोग भी इनका साथ दे रहे हैं और वहाँ जंग का माहौल है। उपन्यास में इस जंग में शामिल हर तरह के लोग दिखते हैं। इनमें से कुछ कश्मीरी ऐसे हैं जो असल में इसे आजादी की जंग मानते हैं और कुछ काश्मीरी केवल अपने स्वार्थ के लिये इसे लड़ते दिखते हैं। वहीं उपन्यास में ऐसे काश्मीरी भी हैं जो भारत के साथ हैं। इनके बीच के आपसी द्वन्द को भी लेखक ने किरदारों के माध्यम से दर्शाया है। और जन्नत कहे जाने वाले काश्मीर पर इस जंग का क्या असर पड़ा है यह भी किरदारों और संवादों के माध्यम से इधर दिखता है। 

यह उपन्यास आपको 60-80 के दशक में आई जासूसी फिल्मों की याद भी दिलाता है। उपन्यास की शुरुआत में भी यह दावा किया गया है कि वह फिल्म से भी तेज रफ्तार है तो यह साफ लगता है कि लेखक ने कहीं न कहीं फिल्मों को ध्यान में रखकर इसे लिखा है।  60-80 के दशक के वक्त जितेंद्र, धर्मेन्द्र इत्यादि अदाकारों अभिनीत कई ऐसी फिल्में आती थी जिनके केंद्र में जासूसी होती थी। उपन्यास का फॉर्मैट भी वैसा ही है। एक संजीदा हीरो, एक मजाकिया लेकिन तेज तर्रार कॉमेडियन और कई खलनायक। यानि अगर दो चार गाने भी इसमें शामिल होते तो उस जमाने की एक अच्छी फिल्म का मसाला इसमें मौजूद है।

उपन्यास के केंद्र में शरद है जो कि एक शादी शुदा खुशहाल युवक है और परिवार की नजर में एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करता है। उसकी माँ और पत्नी इस बात से अनजान हैं कि वह असल में क्या है? अपने मिशन के चलते उसे अलग अलग जगहों पर अक्सर भेजा जाता है और ऐसे में वह किन किन चीजों  से महरूम रह जाता है  इस पहलू को भी कथानक में दर्शाया है। यानि एक एजेंट के रोमांचक किस्से तो इधर हैं ही लेकिन ऐसे काम को करते हुए वह और उसका परिवार किस तरह का त्याग करता है वह भी लेखक ने यहाँ पर दर्शाने की कोशिश की है। 

एक एजेंट के तौर पर शरद एक बेहतरीन एजेंट है। लेकिन वह अमानवीय शक्तियों का स्वामी नहीं है। यही कारण है कि उपन्यास में वह कई बार गलतियाँ करता है और उसके कारण फँसता भी दिखता है। वाईपर के रूप मे शायद उसका यह पहला मिशन है और इस कारण एक नौसिखियापन भी उसके अंदर दिखाई देता है। 

उपन्यास में खलनायक की बात करें तो खलनायक के तौर पर इधर गुलबदन का किरदार प्रभाव छोड़ने में सफल होता है। उपन्यास काश्मीर की समस्या पर आधारित है और गुलबदन ऐसे समाज का प्रतिनिधित्व करती है जो कि भारत को कश्मीर से अलग मानते हैं और काश्मीर को अलग करने की कवायद जी जान से कर रहे हैं। गुलबदन अलगाववादी जरूर है लेकिन वह सच्चे मन से इसे स्वतंत्रता की लड़ाई समझती है। वह अपने दुश्मनों के तरफ क्रूर हो सकती है लेकिन उसूलों की पक्की है। ऐसे में जब आखिर में उसका असलियत से पाला पड़ता है तो उसे अपनी गलती का अहसास होता है और इस कारण उसमें जो बदलाव आता है उससे वह पाठक के दिल में जगह बनाने में कामयाब हो जाती है। 

गुलबदन के अलावा फिरोज, जंगसार,मुश्ताक अली भी उपन्यास में खलनायक हैं लेकिन वह वैसे ही हैं जैसे कि उनसे उम्मीद की जा सकती है। वह एक आयामी ही प्रतीत होते हैं। 

उपन्यास जहाँ एक जासूसी उपन्यास है वहीं इसमे हँसी का तड़का देने के लिये भरत नाम का जासूस भी रखा गया है। भरत उम्र में शरद से बड़ा है और शरद का मामा लगता है। वह एक तेज तर्रार जासूस है जो कि मस्त मौला इंसान है। वह शारीरिक रूप से ताकतवर नहीं है और हरकतों से बेवकूफ भी लगता है लेकिन उपन्यास में वह ऐसे कारनामें भी करता दिखता है जिससे पता लग जाता है कि वह शरद से ज्यादा अनुभवी है और सच्चे मायने में उसका गुरु है। भरत की हरकतें देखकर बरबस ही चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है। 

उपन्यास की कमियों की बात करूँ तो मैंने इसका किन्डल संस्करण पढ़ा था जिसमें वर्तनी की काफी गलतियाँ मौजूद हैं। कई जगह वाक्य भी अधूरे रह गए हैं। इनसे पढ़ने का मज़ा थोड़ा किरकिरा हो जाता है।  तो प्रकाशन को इस पर ध्यान देना चाहिए और हो सके तो ई संस्करण को अपडेट कर सही संस्करण डालना चाहिए। ई बुक कम से कम यह सुविधा प्रकाशन को देता है। 


उपन्यास शायद कई वर्षों पहले लिखा गया था तो वह चीज इसमें दृष्टिगोचर होती है। वहीं कथानक में वाईपर को एक मास्क भी दिया गया है जिसका प्रयोग वह कभी कभी करता है। यह चीज मुझे थोड़ी बचकानी लगी। अगर हर जगह वो मास्क पहनता तो कोई बात होती लेकिन ऐसा नहीं है। जब वह मास्क में नहीं भी रहता है तो भी वाईपर के रूप में कई लोगों को अपना परिचय देता है जो कि अटपटा लगता है और इससे मास्क की जरूरत भी खत्म हो जाती है। मास्क का कान्सेप्ट मुझे अच्छा लगा है लेकिन बेहतर होता कि मास्क के भीतर के व्यक्ति की पहचान न कराई गयी होती या कोई बीच का रास्ता अख्तियार किया गया होता।  


अंत में यही कहूँगा कि वाईपर का कान्सेप्ट मुझे पसंद आया है। किरदार के रूप में वाईपर में काफी संभावनाएँ हैं। आने वाले उपन्यासों में वाईपर का किरदार किस तरह से विकसित होता है और वह कौन कौन से कारनामे करता है यह देखना रोचक होगा । वहीं इस किरदार में इतनी खूबी है कि इसे आज के समय के हिसाब से अपग्रेड किया जा सकता है। प्रकाशक को इस और जरूर ध्यान देना चाहिए और आज के समय के लिये एक नया वाईपर जरूर खड़ा करना चाहिए। 

उपन्यास मुझे पसंद आया। अगर आप इसे एक रीप्रिन्ट के तौर पर पढ़ते हैं तो इसका ज्यादा लुत्फ उठा पाएंगे। 


किताब लिंक: अमेज़न


यह भी पढ़ें:




Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Top Post Ad

Below Post Ad