चाल पे चाल - अमित खान

संस्करण विवरण:
फॉरमेट:
पेपरबैक । पृष्ठ संख्या: 287 । प्रकाशक: रवि पॉकेट बुक्सश्रृंखला: कमांडर करण सक्सेना


समीक्षा: चाल पे चाल - अमित खान | कमांडर करण सक्सेना सीरीज

कहानी:

रसूलपुर की फौजी छावनी में रावी नदी के बीच वह किला मौजूद था जो चारों तरफ से पानी से घिरा हुआ था। वह पाकिस्तानी किला अभेद्य समझता जाता था क्योंकि सुरक्षा के ऐसे बन्दोबस्त किये गये थे जिन्हें तोड़ पाना नामुमकिन समझा जाता था। 

कुछ दिनों पूर्व जब भारतीय सेना अध्यक्ष दामोदर सिंह डबराल का विमान दुर्घटनाग्रस्त होकर पाकिस्तान के इलाके में गिरा था तो पाकिस्तान ने उन्हें मृत  घोषित कर दिया था।

परन्तु अब खबर मिली थी कि पाकिस्तान के इसी किले में भारतीय सेना अध्यक्ष दामोदर सिंह डबराल को कैद करके रखा गया था और उनसे भारत की गुप्त जानकारी निकलवाने की कोशिश की जा रही थी। 

अब दामोदर सिंह डबराल को इस किले से सुरक्षित निकलवाने की पूरी जिम्मेदारी करण सक्सेना को सौंप गई थी। परन्तु जैसा दिखता था वैसा असल में नहीं होता था।

कमांडर करण सक्सेना को रॉ एजेंट रचना मुखर्जी के साथ पाँच और फौजी लोगो की टीम दी गयी थी जिनकी मदद से उसे इस असंभव कार्य को संभव बनाना था। 

अपने इस मिशन को सफल बनाने के लिए कमांडर करण सक्सेना को किन किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? 

क्या कमांडर करण सक्सेना अपने मिशन कामयाब हो पाया?

ऐसे ही कई प्रश्नों के उत्तर आपको इस उपन्यास में पढ़ने को मिलेंगे।

यह भी पढ़ें: पुस्तक अंश: चाल पे चाल


 मुख्य किरदार
करण सक्सेना- रॉ का सबसे होनहार एजेंट
रचना मुखर्जी - रॉ की एक एजेंट
गंगाधर महंत - करण का चीफ
ब्रिगेडियर धरम सिंह, कर्नल केदार पटेल, लेफ्टिनेंट कर्नल यशवंत गावली, मेजर इकबाल सिंह, कैप्टेन सुरेंद्र खुराना - भारतीय फौजी जो इस मिशन में शामिल थे
फरजाना - रौनक क्लब में काम करने वाली एक वेट्रेस 
परवेज हुसैन - पाकिस्तानी फौज का एक कप्तान जिसकी नौकरी रसूलपुर के किले में थी 
कर्नल इशरत अली - पाकिस्तान की फ़ौज का कर्नल 
नादिरा बेगम - किले की महिला स्टाफ की सुपर इंचार्ज
जहाँगीर अंसारी - पाकिस्तान का थल सेना अध्यक्ष
कर्नल नासिर - आई एस आई का चीफ
सलीम गौस - किले का डिप्टी चीफ

मेरे विचार:

चाल पे चाल लेखक अमित खान का कमांडर करण सक्सेना श्रृंखला का उपन्यास है। कमांडर करण सक्सेना से अगर आप वाकिफ नहीं है तो आपको बता दूँ कि यह लेखक अमित खान का सबसे मकबूल किरदार है। करण सक्सेना भारतीय खूफिया एजेंसी रॉ का सबसे होनहार एजेंट है जो कि अपने मिशन के लिए अक्सर अपनी जान साँसत में डालता रहता है। इस श्रृंखला के उपन्यास उसके इन्हीं मिशनों पर आधारित होते हैं। 

प्रस्तुत उपन्यास चाल पे चाल भी कमांडर के एक मिशन की कहानी ही कहता है। उपन्यास के शुरुआत में पाठक देखते हैं कि कमांडर पाकिस्तान के रसूलपुर इलाके के एक जंगल में आ चुका है। वहीं उसके इस मिशन में उसके साथ एक रचना मुखर्जी नाम की एजेंट है और पाँच फौजी भी शामिल हैं। यहाँ पाठक उनके मिशन से अवगत होते हैं लेकिन जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है पाठक पाते हैं कि मामला उतना भी सीधा नहीं है जितना दिखाई दे रहा था।

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कहानी में कई बार चीजें बिगड़ती हैं जिससे कहानी की दिशा ही बदल जाती है। उपन्यास का नाम चाल पे चाल हैं और ये चालें शुरू से लेकर अंत तक किरदार चलाते रहते हैं जिस कारण कहानी में रोमांच बना रहता हैं और पाठक उपन्यास आगे तक पढ़ता चला जाता है। यह सब क्यों किया जा रहा है यह जानने की इच्छा पाठक के मन में बलवती होती जाती है।

हाँ, चूँकि उपन्यास के ज्यादातर हिस्से में छुप छुप कर कार्य होता है तो सीधा एक्शन काफी कम देखने को मिलता है। परन्तु यह कहानी की माँग है तो मुझे इससे ज्यादा दिक्कत नहीं हुई थी। फिर कहानी के अंत में एक्शन काफी मात्रा में मौजूद है जो कि इस शिकायत को काफी हद तक दूर भी कर देता है।

किरदारों की बात करूँ तो उपन्यास के केंद्र में करण सक्सेना है और यह पूरे उपन्यास में दिखता है। बाकी के किरदार सहायक ही हैं और उन्हें उसी हिसाब से रखा गया है। करण किरदार के रूप में ठीक लगता है लेकिन उसकी कुछ हरकतें ऐसी हैं जो शायद जब यह उपन्यास लिखा गया तब चल जाती लेकिन अब उन्हें पढ़ना थोड़ा अटपटा लगता है। विशेषकर उपन्यास के शुरुआत में जो उसका रचना के प्रति जो व्यवहार है वह यौन उत्पीड़न की श्रेणी में ही रखा जायेगा। उनका रिश्ता आगे जाकर सुधरता जरूर है लेकिन शुरुआत का हिस्सा बेहतर तरीके से लिखा जा सकता था। 

रचना मुखर्जी एक अच्छा किरदार बन सकता था लेकिन इसमें वह ज्यादातर हिस्से में करण की छाया में ही दर्शाई गई है।  उम्मीद है कमांडर के अन्य उपन्यासों में उसके किरदार और बेहतर होगा। 

हाँ, फरजाना भी एक सही किरदार मुझे लगा था। पाकिस्तान में उसकी जिंदगी कैसी थी और उसने उधर क्या क्या काम किया यह मैं जरूर जानना चाहूँगा।

उपन्यास के बाकी किरदार कहानी के अनुरूप ही हैं लेकिन ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं। हाँ, कुछ बेहतर खलनायक अगर कहानी में मौजूद होते तो कहानी अभी जितनी अच्छी है उससे और ज्यादा रोमांचक बन सकती थी।

कहानी की कमी की बात करूँ तो उपन्यास की सबसे बड़ी कमी मुझे इसका अंत का रहस्योदघाटन लगी। उपन्यास में जो कुछ हो रहा है वो क्यों किया जा रहा है यह कोतुहल का विषय आखिर तक बना रहता है। लेकिन  इस मिशन के लिए जो कारण अंत में दिया गया है वह मुझे उतना मजबूत नहीं लगा था। यह मिशन काफी नाटकीय था जिसमें काफी खतरनाक एजेंट्स की जान खतरे में तो पड़ी ही थी साथ में भारत सरकार का काफी धन भी खर्च हुआ होगा। ऐसे में यह सबसे बेहतर विकल्प था ऐसा मुझे नहीं लगा। अगर कारण और मजबूत दिया जाता तो बेहतर होता। अभी तो खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली कहावत ही  चरित्रार्थ होते हुए दिखती है।

वहीं कहानी में एक प्रसंग है जिसमें मुख्य किरदारों को किले तक जाना होता है। वह यह कार्य जिस तरह करते दिखाए गये हैं वह अतिश्योक्तिपूर्ण लगता है। ज्यादा कुछ न कहते हुए यही कहूँगा कि कहानी में एक व्यक्ति को एक मोटर बोट की गति से तैरते हुए देखना थोड़ा अजीब लगता है। लेखक द्वारा इस प्रसंग के लिए बेहतर विकल्प तलाशा जाना चाहिए था। 

यह कुछ छोटी छोटी बातें थी जिनके ऊपर मेरे ख्याल से कुछ काम करके इन्हें बेहतर किया जा सकता था। अंत में यही कहूँगा कि चाल पे चाल एक पठनीय उपन्यास है जिसे अगर आप एक बार पढ़कर देख सकते हैं। अगर आप कमांडर के पहले से ही फैन हैं तो आपको यह पसंद आएगा। मुझे तो उपन्यास पसंद आया। 

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? मुझे कमेंट्स में अवश्य बताइयेगा? 

अगर आपने कमांडर करण सक्सेना के उपन्यास पढ़े हैं तो आपके पसंदीदा उपन्यास कौन कौन से हैं? मुझसे नाम साझा करना न  भूलियेगा। 

नोट: मित्र इरफान सैय्यद ने जानकारी दी कि उपन्यास वेयर ईगल्स डेयर नामक मूवी से प्रभावित है। विकिपीडिया में फिल्म की कहानी पढ़ने के बाद यह काफी हद तक सही लगता है।

उपन्यास रवि पॉकेट बुक्स से फेसबुक पृष्ठ के माध्यम से सम्पर्क कर मँगवाया जा सकता है। 
रवि पॉकेट बुक्स - फेसबुक पृष्ठ


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