आखिरी शिकार - संतोष पाठक

 संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: ई बुक |  पृष्ठ संख्या:  278 | प्रकाशक: एडूक्रिएशन पब्लिशिंग ।  श्रृंखला:  आशीष गौतम #1
किताब लिंक: पेपरबैक | किंडल`

समीक्षा: आखिरी शिकार - संतोष पाठक

कहानी:

नीलेश तिवारी को अब तक के अपने सत्ताईस अट्ठाईस साला जिंदगी में केवल बदकिस्मती ही मिली थी। वह लेखक बनना चाहता था लेकिन इस क्षेत्र में उसकी दाल नहीं गल पा रही थी। 

ऐसे में जब उसका नया उपन्यास आवारा लेखक  प्रकाशक को न केवल पसंद आया बल्कि  उन्होंने उस उपन्यास के कारण ही उसके साथ बीस उपन्यासों का कॉन्ट्रैक्ट लिख दिया तो नीलेश को लगा कि उसकी सोयी हुई किस्मत अचानक जाग चुकी है। 

पर शायद होनी को कुछ और ही मंजूर था। नीलेश अपनी किताब की सफलता न देख पाया और उससे पहले ही उसकी मौत हो गयी। 

पुलिस की माने तो नीलेश ने अपनी किताब के प्रकाशित होने की ख़ुशी में अत्यधिक पी ली थी और ऐसे में जब वह अपने बाथरूम गया तो उसका पैर फिसल गया और इस दुर्घटना से उसकी मृत्यु हो गयी। 

परन्तु खबरदार के स्पेशल कोरसपांडेंट आशीष गौतम को पुलिस की इस थ्योरी पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह नीलेश से जुड़ी ऐसी बातें जानता था जिसके कारण पुलिस की थ्योरी उसे जच नहीं रही थी। कहीं तो कुछ गड़बड़ थी और इस गड़बड़ का पता लगाने का जिम्मा आशीष ने अपने सिर पर ले लिया था। 

आखिर आशीष को पुलिस की थ्योरी पर विश्वास क्यों नहीं था?
क्या नीलेश का सचमुच कत्ल कर दिया गया था? अगर हाँ, तो उसका कत्ल किसने किया था?

मुख्य किरदार:
आशीष कुमार गौतम - खबरदार नामक अखबार का स्पेशल कोरेस्पोंडेंट 
निलेश तिवारी - एक लेखक 
अनिल सलूजा - खबरदार में आशीष का सम्पादक 
अंजली नारंग - होटल मूनलाइट की मालकिन 
जयराज, दीपक - मून लाइट के सिक्यूरिटी इनचार्ज 
सुदीप राजवंशी - मॉडर्न का सम्पादक 
रामचन्द्र - मॉडर्न का चपड़ासी 
माधुरी राय - एक युवती जिसके नीलेश से सम्बन्ध थे 
नितिन राय - माधुरी का पति 
सुधीर राय - दिल्ली पुलिस का इंस्पेक्टर 
मुक्ता - सुधीर राय की पत्नी 
सरला भटनागर - आशीष गौतम की वाकिफकार
कंचन चावला - करुणा घोष की दोस्त
करुणा घोष -नीलेश तिवारी की जानकार
मोनिका जैन - नीलेश तिवारी की जानकार
आयशा - आशीष गौतम की रिसेप्शनिस्ट
संजीव - खबरदार में एक रिपोर्टर
आशा चटर्जी - खबरदार की डीटीपी ऑपरेटर
कल्पना लाल - एक महिला जिससे नीलेश की वाकफियत थी

मेरे विचार:

आखिरी शिकार लेखक संतोष पाठक द्वारा रचित आशीष गौतम श्रृंखला का पहला उपन्यास है। यह उपन्यास 2017 में प्रथम बार प्रकाशित हुआ था। अगर आप आशीष गौतम से परिचित नहीं हैं तो आपको बता दूँ कि आशीष गौतम खबरदार नामक अखबार का चीफ रिपोर्टर है जो कि अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए दिल्ली में काफी मशहूर है। वह एक दिलफेंक शख्सियत का मालिक है जो कि अपने पेशे के चलते कई बार रहस्यमयी घटनाक्रम से दो चार होता रहता है। इस किरदार को लेकर संतोष पाठक अब तक चार उपन्यास लिख चुके हैं।

प्रस्तुत उपन्यास आखिरी शिकार एक रहस्यकथा है। अपनी जिंदगी में हम आये दिन कई लोगों से मिलते हैं। उनसे दोस्ती करते हैं और यह समझते हैं कि हम उन्हें जानते हैं। लेकिन क्या असल में ऐसा है? क्या हम किसी को जान पाते हैं? यह उपन्यास पाठक को यह सोचने पर मजबूर कर देता है। 

कहने को तो लेखक नीलेश तिवारी पत्रकार आशीष गौतम का दोस्त था लेकिन जब आशीष गौतम उसकी मृत्यु के पश्चात अपनी तहकीकात करता है तो नीलेश के विषय में उसे ऐसी बातें पता चलती हैं जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। 

यह एक रहस्यकथा है जिसकी शुरुआत एक लेखक के खून से होती है और जैसे जैसे कहानी आगे बढती जाती है न केवल कहानी में पेंच बढ़ते जाते हैं बल्कि उपन्यास में और अधिक कत्ल भी होते चले जाते हैं। कत्ल कौन कर रहा है यह समझ पाना आखिर तक मुश्किल रहता है। अंत में एक अच्छा ट्विस्ट भी कहानी में लेखक देते हैं जो कि मुझे पसंद आया। एक अच्छी रहस्यकथा वही होती है जो कि रहस्य अंत तक बनाये रखे हैं मुझे लगता है इस मापदंड पर यह उपन्यास पूरी तरह से खरा उतरता है।

उपन्यास के किरदारों की बात करूँ तो लेखक ने इसमें जो दुनिया बनाई है वह लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक के किरदार सुनील की दुनिया से प्रेरित होकर बनाई गयी लगती है। यहाँ भी मुख्य किरदार आशीष गौतम सुनील की तरह ही एक पत्रकार है। यहाँ भी आशीष की एक दोस्त है जो कि एक होटल की मालकिन हैं और उसके लिए तहकीकात करती है और अपने आदमियों द्वारा करवाती है। सुनील के मामले में यह चीज यूथक्लब का मालिक रमाकांत करता है और अपने लोगों द्वारा करवाता है। यहाँ एक पुलिस इंस्पेक्टर सुधीर (सुनील के मामले में प्रभुदयाल) भी है जिसकी आशीष से नौक झोंक चलती है। यह सभी किरदार आपको जाने पहचाने लगते हैं लेकिन जिस कहानी में उन्हें पिरोया गया है वह मौलिक है। उम्मीद है आगे जाकर लेखक इन किरदारों को इतना विकसित कर लेंगे कि यह अपने आप में अपनी एक अलग पहचान बना लेंगे। परन्तु अभी यह प्रेरणा उपन्यास की कमी जरूर लगती है। 

हाँ यहाँ आशीष और अंजली की बीच की जुगलबंदी मुझे पसंद आई है। आगे जाकर इनके रिश्ते कैसे विकसित होता है यह मैं जरूर देखना चाहूँगा। वहीं दीपक और आशीष के सम्पादक का किरदार भी मुझे पसंद आया है। 

उपन्यास में रहस्य तो है ही लेकिन साथ में इसमें हास्य का पुट भी लेखक ने दिया है। कहानी को रोचक बनाने के लिए लेखक ने आशीष को दिल फेंक दिखाया है लेकिन व्यक्तिगत तौर पर चूँकि मुझे ऐसे किरदार ज्यादा पसंद नहीं आते हैं तो इस बात से मुझे कहानी की रोचकता में कोई प्रभाव पड़ते नहीं दिखा। दूसरे पाठकों को हो सकता है यह चीज पसंद आये। हाँ, उपन्यास में आशीष की सुधीर, अनिल सलूजा और बाकी के किरदारो से जो जबानी उठा पटक चलती है वह मुझे जरूर पसंद आई। 

अंत में यही कहूँगा कि यह एक अच्छी रहस्यकथा है जिसे अगर आपने नहीं पढ़ा है तो एक बार आपको जरूर पढ़ना चाहिए। मुझे यह उपन्यास काफी पसंद आया और आशा करता हूँ जितना मनोरंजन इसने मेरा किया है उतना ही आपका मनोरंजन  करने में यह सफल होगा। 

किताब लिंक: पेपरबैक | किंडल`

©विकास नैनवाल 'अंजान'

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8 Comments
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  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 30-04-2021) को
    "आशा पर संसार टिका है" (चर्चा अंक- 4052)
    पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

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    1. चर्चा अंक में मेरी प्रविष्टि को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार मैम....

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  2. यदि यह उपन्यास आपको पसंद आया है विकास जी तो निश्चय ही उत्तम होगा। कथानक से लगता है कि एक बेहतरीन रहस्यकथा है यह। अच्छी समीक्षा लिखी है आपने।

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    1. जी सर। हिन्दी अपराध साहित्य में संतोष पाठक ने अपना एक अलग मुकाम कायम कर लिया है। अगर आपने उन्हें नहीं पढ़ा है तो एक बार अवश्य पढ़िए। उनके पहले के उपन्यासों के किरदारों और शैली में पाठक साहब की छाप जरूर दिखती है लेकिन वक्त के साथ उन्होंने अपनी एक शैली विकसित कर ली है जो कि पाठकों को काफी पसंद भी आ रही है।

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  3. लेखक परिचय के साथ बेहतरीन समीक्षा विकाश जी,पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ गयी ,सादर

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  4. रोचकता जगाती सुंदर समीक्षा।

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