मोना चौधरी खतरे में - अनिल मोहन

किताब सितम्बर 26 2020 को पढ़ी गयी

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक 
पृष्ठ संख्या: 240
प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स 
श्रृंखला: मोना चौधरी

मोना चौधरी खतरे में - अनिल मोहन
मोना चौधरी खतरे में - अनिल मोहन

पहला वाक्य:
मोना चौधरी के होंठ सिकुड़ गये।

कहानी:
रामकुमार नरेला सत्ताधारी पार्टी का अध्यक्ष था जिसने यह घोषणा कर दी थी कि आने वाले चुनावों में उनकी पार्टी से जगनाथ मुख्यमंत्री बनेगा। लेकिन अब कुछ ऐसा हो गया था कि जगनाथ का मुख्यमंत्री बनना मुश्किल लग रहा था। इसी मुश्किल को हल करने के लिए रामकुमार नरेला ने मोना चौधरी की मदद माँगी थी।

पर कोई ऐसा शख्स भी था जो नहीं चाहता था कि मोना चौधरी जगनाथ की मदद कर सके। यह रहस्यमय व्यक्ति बेहद खतरनाक था और मोना चौधरी को रास्ते से हटवाने के लिए कुछ भी कर सकता था।

आखिर जगनाथ किस मुसीबत में फँस गया था?
क्या मोना चौधरी उसकी मदद कर पाई?
आखिर कौन था जो चाहता था कि मोना जगनाथ की मदद न करे?
इस रहस्यमय व्यक्ति की जगनाथ से क्या दुश्मनी थी?
इसने मोना के सामने कौन कौन सी परेशानियाँ इकट्ठा कर दी थीं?

वहीं दूसरी और कमिश्नर दीवान और इंपेक्टर विमल कुमार मोदी ने जगनाथ के खिलाफ अघोषित युद्ध छेड़ दिया था। वह चाहते थे कि जगनाथ का छुपा हुआ काला चेहरा जनता के सामने आए और इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार थे। यहाँ तक मोना चौधरी के रास्ते में आने को भी। 

खादी और खाकी के इस मामले में मोना चौधरी को क्या मुसीबतें झेलनी पड़ी? क्या वह इन मुसीबतों से उभर पाई?

ऐसे कई सवालों के जवाब आपको इस उपन्यास को पढ़कर पता चलेंगे।

मुख्य किरदार:

मोना चौधरी - एक अपराधिनी जो कि पैसे लेकर कोई भी काम अंजाम दे देती है
नीलू महाजन - मोना चौधरी का खास आदमी
पारसनाथ - एक पूर्व अपराधी जो कि अब रेस्टॉरेंट चलाता था। मोना चौधरी का खास
शेखर दीवान - पुलिस कमिश्नर
मिस्टर पहाड़िया - मिलिट्री सीक्रेट सर्विस के चीफ
इंस्पेक्टर विमल मोदी- शेखर दीवान के अंतर्गत कार्य करने वाला इंस्पेक्टर। मोना चौधरी से इसका सामना हो चुका था
चमनलाल - नेशनल बार एंड रेस्टॉरेंट का मालिक और बार टेंडर
रामसिंह वोहरा - वह व्यक्ति जिसने जगनाथ के आदमियो को युवती का अपहरण करते देखा था
जगनाथ - सत्तारूढ़ पार्टी का नेता जो कि आगे जाकर चीफ मिनिस्टर बनने वाला था
रामकुमार नरेला - सत्ताधारी पार्टी का अध्यक्ष
भीमसिंह, किशनलाल, मंगतराम और नीम सिंह - वो चार व्यक्ति जिन्होंने जगनाथ के लिए रूपा वर्मा का इंतजाम किया था
रूपा वर्मा - एक युवती 
सक्सेना - श्याम नगर में रहने वाला एक व्यक्ति
नन्दराम - मोना चौधरी का पड़ोसी 
ओमप्रकाश - सेवेन नाईट क्लब का मैनेजर 

मेरे विचार 
मोना चौधरी खतरे में अनिल मोहन द्वारा लिखा गया मोना चौधरी श्रृंखला का उपन्यास है। मुझे मोना चौधरी श्रृंखला का उपन्यास पढ़े हुए काफी दिन गुजर गये थे। इससे पहले जो उपन्यास मैंने पढ़ा था वो तू चल मैं आई था जो कि मैंने 2018 में पढ़ा था। अभी अपने घर पर  हूँ और यह उपन्यास इधर दिखा तो सोचा इसे पढ़ ही लेता हूँ।

'मोना चौधरी खतरे में' राजनीति की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास है। उपन्यास शुरुआत से ही आपको बाँधकर रखता है। एक्शन की शुरुआत उपन्यास शुरू होते ही हो जाती है और फिर यह अंत तक बनी रहती है। मोना चौधरी किस तरह नेताओं के लिए काम करने लगती है और इस काम को करने में उसे क्या परेशानी आती हैं यह देखने के लिए आप उपन्यास के पन्ने पलटते चले जाते हैं।

उपन्यास में मोना चौधरी एक रहस्यमय शख्स से जूझती हुई दिखाई देती है। यह ऐसा शख्स है जो कि मोना को उसके मकसद में सफल नहीं होने देना चाहता है। वह मोना के आगे मुसीबतें खड़ी करता रहता है। जैसे मोना एक कड़ी पकड़ती है वह उसको खत्म कर देता है। उपन्यास में यह खेल रोमांच पैदा करता चला जाता है। यह रहस्यमाय शख्स कौन है यह प्रश्न अंत तक बना रहता है और लेखक के बताने पर ही आपको इस शख्स की पहचान पता चलती है। हाँ, अगर मोना चौधरी किन्हीं सुरागों का पीछा करते हुए इस शख्स की पहचान तक पहुँचती और उसे भी पाठक की तरह व्यक्ति की पहचान जानकार झटका न लगता तो पढ़ने में थोड़ा ज्यादा मजा आता।

चूँकि उपन्यास राजनीति की पृष्ठभूमि पर लिखा है तो सफेद पोश नेताओं के काले कारनामों का भी इसमें जिक्र आता है। उपन्यास में रामकुमार नरेला और जगनाथ नाम के नेताओं का बहुत ही महत्वपूर्ण किरदार है। यह दोनों ही ऐसे सफेद पोश नेता हैं जिनकी छवि तो साफ लेकिन गड़बड़ घोटाले करने में ये माहिर हैं। ये कैसे अपने चाल बाजियों से जनता और एक दूसरे को अपने उँगलियों पर नचाते हैं यह आपको देखने को मिलता है। उनके मीठे बोलों और सफेद पोश चेहरों के पीछे क्या छुपा है यह भी आपको दिखलाया जाता है।

हाँ, नेताओं के विषय में बातचीत करते हुए यह जरूर पाठकों को बताया जाता है कि हर नेता ऐसा नहीं है। कई नेता अच्छे भी हैं और उन्हीं के वजह से इस देश का निजाम ठीक तरह से चल रहा है। 

तभी नीलू महाजन ने ने कड़वी निगाहों से पारसनाथ को देखा। 

"क्यों इन नेताओं के फेर में पड़ता है! इनसे भले तो गुण्डे-बदमाश, चोर लुटेरे हैं। जो कहते तो हैं हम बुरे हैं। जिनके बारे में सब जानते हैं तो हैं कि वो बुरे लोग हैं। और यह नेता - महात्मा गांधी की खादी को पहनकर राष्ट्रीयता और खादी को बदनाम कर रहे हैं। इनके जिस्मों में पड़ी खादी को झाड़कर देखो। सिर्फ कालापन ही नीचे गिरेगा। इनके पाप और अपराध ही उजागर होंगे।...."

"मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ।"

...

"लेकिन जो मैं कहने जा रहा हूँ उस बात से तुम भी सहमत होंगे।" - पारसनाथ ने शांत स्वर में कहा - "गलत और बुरे नेताओं की मौजूदगी के बावजूद भी देश सही सलामत खड़ा है तो इसकी वजह जानते हो? इसकी वजह यह है कि हमारे देश में अभी भी बहुत-से नेता खादी की इज्जत करते हैं। जनता की सेवा करते हैं। देश पर कुर्बान होने का जज्बा रखते हैं। कुछ नेताओं के खराब होने की सुनकर हम यह नहीं कह सकते कि सब नेता खराब हैं।"

"लेकिन वो अच्छे नेता नजर भी तो नहीं आते।", महाजन ने कडुवे स्वर में कहा।

...

"आते हैं, नजर आते हैं। लेकिन तुम उन्हें पहचान नहीं पाते। देश के हालत ही ऐसे हैं।"


उपन्यास में कमीश्नर और इंस्पेक्टर विमल कुमार मोदी का भी महत्वपूर्ण किरदार है। यह दोनों ईमानदार पुलिस वाले हैं लेकिन फर्ज और सिस्टम के हाथों मजबूर दिखते हैं। फिर भी यह हार नहीं मानते हैं और अपने तरफ से न्याय संगत कार्य करने की कोशिश करते रहते हैं। यह देखकर अच्छा लगता है।  इन दोनों का ही रिश्ता मोना चौधरी से रहा है और वह जानते हैं कि इश्तहारी मुजरिम होते हुए भी मोना के अंदर ऐसे गुण है जो उसे बाकी लोगों से अलग बनाते हैं। मोना के उन पर कुछ अहसान भी हैं तो वह मोना के खिलाफ नजर नहीं आते हैं। इस उपन्यास में तो मोदी अपने काम के चलते मोना का साथ देता नजर आता है। 

उपन्यास में मोना के साथी नीलू महाजन और पारसनाथ मौजूद हैं। नीलू महाजन ही वह व्यक्ति है जिसके कारण कहानी शुरू होती है। नीलू का किरदार रोचक है और मुझे पसंद आया। पारसनाथ के विषय में ज्यादा नहीं पता चलता है लेकिन उसका अतीत मुझे रोचक लगता है। जिस हिसाब से उसका दबदबा स्थापित है उससे मुझे लगता है कि उसे लेकर विशेष उसके अतीत को लेकर कुछ उपन्यास तो अवश्य ही लिखे जा सकते हैं। 

उपन्यास में भरपूर एक्शन और थ्रिल तो है पर इसके साथ मोना चौधरी के पड़ोसी नन्दराम के रूप में हास्य का लुत्फ़ भी पाठकों को लेखक देते हैं। नन्दराम और मोना के बीच की चुहुलबाजी रोचक है और हँसा देती है। कई बार नीलू महाजन भी अपनी हरकतों के चलते उपन्यास में ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देता है कि बरबस ही आप हँस देते हैं।

अंत में मैं तो  यही कहूँगा कि उपन्यास एक तेज रफ्तार थ्रिलर है और आपको अंत तक बोर नहीं होने देता है।  अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है तो एक बार अवश्य आपको इसे पढ़ना चाहिए। हो सकता है जैसा इसने मेरा मनोरंजन किया उसी तरह आप भी इसका लुत्फ़ ले पाएं।

रेटिंग : 4/5

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2 Comments
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  1. बहुत सुन्दर जानकारी।
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    पुत्री दिवस की बधाई हो।

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    1. जी आभार सर... आपको भी पुत्री दिवस की बधाई....

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