Saturday, August 8, 2020

साक्षात्कार: विक्रम ई दीवान

लेखक परिचय:
विक्रम ई. दीवान एक उपन्यासकार, संपादक, फ्रीलांस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। उनके अंग्रेजी में छपे वारलॉक ’(पैरानॉर्मल / हॉरर) श्रृंखला के उपन्यासों को भारत और विदेशों में काफी प्रशंसा और व्यावसायिक सफलता मिली है। पाठकों की भारी मांग पर इसका हिंदी संस्करण भी प्रकाशित किया गया है।

उन्हें विभिन्न समाचार पत्रों और वेबसाइटों पर फीचर किया गया है। उनके लेख कई वेबसाइटों और समाचार पोर्टल पर भी प्रकाशित हुऐ हैं।  

वह पैरानॉर्मल, ऑकल्ट, मैजिक, सैटनिक विषयों, विचक्राफ़्ट, तंत्र और दर्शन के एक जीवन-पर्यन्त शोधकर्ता हैं।

उनसे आप निम्न लिंक्स के माध्यम से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं:

उनकी निम्न किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं:
वॉरलॉक: मौत की घाटी (हिन्दी | अंग्रेजी
(किताबें आप ऊपर दिए गये नामों पर क्लिक करके पा सकते हैं।)

'एक बुक जर्नल' की साक्षात्कार श्रृंखला में आज हम आप सबके सामने विक्रम ई दीवान जी से हुई बातचीत प्रस्तुत कर रहे हैं। विक्रम जी मूलतः अंग्रेजी में लिखते हैं और उनके शुरूआती उपन्यास अंग्रेजी में ही हैं। इसीलिए उनसे जब बातचीत का मौका लगा तो लगा बातचीत अंग्रेजी में ही होनी चाहिए। लेकिन चूँकि विक्रम जी के पाठक हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में ही हैं तो मैं चाहता था कि उनसे हुई बातचीत का हिन्दी संस्करण भी साथ साथ आये और इस कारण उनसे हुई बातचीत का अनुवाद आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ। उम्मीद है यह कोशिश आपको पसंद आएगी।

बातचीत का अंग्रेजी संस्करण आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
(You can read the English version of the interview by clicking on the link below)


प्रश्न: विक्रम जी अपने विषय में कुछ बताएं? आपका जन्म किधर हुआ? आप कहाँ पले बढ़े? पढ़ाई लिखाई किधर हुई? अभी फिलहाल किधर कार्यरत हैं? 
उत्तर: मेरी पैदाइश दिल्ली की है और यही पला बढ़ा हूँ। बचपन से जुड़ी एक एक रोचक बात जो मुझे याद आती है वह यह है कि जिन दिनों  मैं पूर्वी दिल्ली के कृष्णा नगर में रहा करता था और उन दिनों मेरे घर से एक किलोमीटर से भी  कम दूरी पर प्रसिद्ध जासूसी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक जी रहा करते थे।मैं उस वक्त इस बात से अनजान था - अगर मुझे यह पता होता तो मैं जरूर उनसे मिलने उनके घर  पहुँच जाता। 

अगर अपनी शिक्षा दीक्षा की बात करूँ, तो मेरी स्कूली शिक्षा ग्रीन फील्ड्स पब्लिक स्कूल से हुई और फिर मैंने दिल्ली विश्व विद्यालय से अंग्रेजी में मास्टर्स की डिग्री हासिल की। फिलहाल, लेखन के अलावा मैं एक सम्पादक और कंटेंट-क्रिएटर के तौर पर कार्य कर रहा हूँ।

प्रश्न: साहित्य से जुड़ाव कब हुआ? बचपन में आपको किस तरह की किताब पढ़ने का शौक था?
उत्तर: पढ़ने-लिखने के प्रति मेरी रूचि बचपन में ही जागृत हो गयी थी। मेरे सबसे प्यारी यादों में मेरी बचपन की वह यादें भी शामिल हैं जब मेरी माँ गर्मियों की छुट्टियों के दौरान मुझे किरायें में किताब देने वाली दुकान पर ले जाया करती थीं। मैं वहाँ से अपने पसंद की हिन्दी कॉमिक बुक उठा लिया करता था और घंटो उनका रसावादन किया करता था। जहाँ दूसरे बच्चे एक या दो कॉमिक बुक से खुश हो जाया करते थे वहीं मैं एक ही दिन में आठ से दस कॉमिक चट कर जाया करता था। जो भी कॉमिक मुझे मिलती मैं वह पढ़ डालता। फिर भी अपनी पसंदीदा कॉमिक किरदारों  की बात करूँ तो इंद्रजाल कॉमिक द्वारा प्रकाशित  बेताल(फैंटम) और मेंड्रेक मेरे सबसे पसंदीदा किरदार थे। फिर जैसे जैसे मैं बढ़ा हुआ वैसे वैसे मैंने पहले बाल उपन्यासों और फिर उपन्यासों तक अपने क़दमों को अपनी पढ़ने की इस प्यास को बुझाने के लिए बढ़ाया। जब भी मैं किताबें पढ़ता था तो किसी दूसरे ही संसार में चला जाता था। कहानी के साथ मैं भी इन रोमांचक और आश्चर्यजनक जगहों घूम आता था। यह चीज़ मुझे बहुत भाती थी। किताबों के प्रति यह प्यार और किताबों के माध्यम से नयी-नयी जगहों की यात्रा करने की यह ललक मेरे अंदर अभी भी है। किताबें पढ़ना आज भी मेरा पसंदीदा शगल है। 

प्रश्न: आपको लेखन का ख्याल कब आया? ऐसी कौन सी चीज है जिसने आपको लेखन के प्रति झुकाव किया?
उत्तर: देखिये, सच बताऊँ तो लेखक बनने की चाह मेरे अंदर कभी भी नहीं रही। मैं तो अपनी किताबों में मस्त रहने वाला बन्दा था। लेकिन एक समय ऐसा आया कि जैसी कहानियाँ मैं पढ़ना चाहता था वो मुझे मिलती नहीं थी। ऐसे में एक दिन मेरे मन में एक विचार कौंधा कि क्यों न मैं खुद उस तरह की कहानी लिखू जैसी मैं पढ़ना चाहता हूँ। इस विचार के चलते ही मैंने लिखना शुरू किया। आज भी मेरा उसूल है कि मैं वही कहानियाँ लिखूँगा जो कि पाठक के रूप में मैं पढ़ना चाहता हूँ। मुझे लिखते समय हमेशा पाठक का ख्याल रहता है और मेरी यह कोशिश रहती है कि मैं एक ऐसी कहानी लिखूँ जिसका पाठक भरपूर लुत्फ़ ले सके। मेरी कोशिश रहती है कि  कथानक उसे बाँधकर उसे किताबों के पृष्ठों को पलटते जाने के लिए विवश कर दे। क्योंकि मैं खुद भी एक पाठक हूँ इसलिए मैं अपने पाठकों के साथ कभी धोखा नहीं कर सकता हूँ। इस कारण मैं उन्हें अधपकी या अधकचरी कहानी नहीं परोस सकता फिर भले ही कहानी लिखने के लिए मुझे कितना भी वक्त क्यों न लगे। मैं हमेशा ही बेहतर से बेहतर कहानी अपने पाठकों तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ।

प्रश्न: आप उपन्यास के साथ साथ कहानियाँ भी लिखते हैं। आपको क्या ज्यादा पसंद है- उपन्यास लिखना या कहानी लिखना?
उत्तर: अगर पसंद की बात की जाए तो मुझे कहानियों की तुलना में उपन्यास लिखना ज्यादा पसंद है। यह बात सच है कि उपन्यास-लेखन आसान नहीं है। यह लेखक को शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूप से थका देता है पर लेखन के प्रति जूनून और लिखते हुए जो आनन्द मुझे प्राप्त होता है वही लिखते चले जाने को मुझे प्रेरित करता है। जॉर्ज ओरवेल ने किताब लिखने को लेकर एक दिलचस्प बात कही थी। मैं उन्ही के शब्दों को इधर दोहराना चाहूँगा:

“किताब लिखना एक भयानक और थका देने वाला संघर्ष है। यह कुछ कुछ एक लम्बी बिमारी से जूझने सरीखा है।कोई भी समझदार व्यक्ति यह काम करने की तब तक नहीं ठानेगा जब कि उसे कोई  ऐसे शैतान, जिसे न वह समझ सकता है और न ही वह उसका विरोध कर सकता है,  उसे यह काम करने के लिए विविश न कर दे।” 

मुझे भी शायद कोई है जो लिखते चले जाने को विवश करता है। मेरा मानना है कि मैं इसलिए भी लिखता हूँ क्योंकि मेरे उपन्यासों के किरदार मुझे वह सब बनने और करने का मौक़ा देते हैं जो कि असल जीवन में नहीं कर सकता हूँ। अपने लेखन के जरिये मैं अपनी आस-पास की बिखरी हुई आम जिंदगी को छोड़कर किसी ऐसी दुनिया में दाखिल हो जाता हूँ जहाँ हर चीज ख़ास है, रोमांचक है। ऐसा अक्सर होता है कि मैं अपने किरदारों को नहीं वह मुझे चला रहे होते हैं और मुझे अपने रोचक संसारों की सैर करा रहे होते है। मैं तो उनके साथ भागने की कोशिश भर ही कर पाता हूँ।

प्रश्न: लेखन विशेषकर गल्प लेखन एक एकाकी, वक्त खाऊ और अक्सर कम उजरत देने वाला काम है। इसके लिए आपको अपने सामाजिक जीवन को भी कम करना पड़ता है। ऐसे में आपका परिवार इसे कैसे देखता है? उनकी आपके लेखन के प्रति क्या प्रतिक्रिया रहती है। आप संतुलन कैसे बनाकर रखते हैं?
उत्तर: मेरे परिवार की बात करूँ तो उन्होंने तो मुझे सुधारने की कोशिश छोड़ दी है! हा, हा...लेकिन मजाक के बात छोड़ें तो इस सवाल का संजीदगी से उत्तर देना हो तो मैं तो यही कहूँगा कि मैं इस मामले में बेहद भाग्यशाली हूँ। मेरा परिवार मुझे समझता है। वह जानता है कि यह मेरा जूनून है। लेखन मुझे मैं बनाता है। इसके बिना मैं मैं नहीं रहूँगा। यही मुझे जिंदगी देता है मुझे स्थिर रखता है और इस कारण वो मुझे पूरा सहयोग देते हैं।  

जहाँ तक सामाजिक जीवन की बात है तो क्योंकि मैं एक अन्तर्मुखी व्यक्ति हूँ तो एकाकी जीवन मुझे उतना नहीं सालता है। मेरी प्रकृति के चलते  लोग मुझे शांत, चुपचाप रहने वाला और कई बार तो घमंडी भी समझते हैं। लेकिन वह यह नहीं समझ पाते हैं कि मेरा दिमाग हमेशा सक्रिय रहता है और कुछ न कुछ सोचता रहता है और फिर मैं बोलने से ज्यादा मै लिखने में खुद को सहज पाता हूँ। मैं इधर-उधर की गपशप भी नहीं कर पाता हूँ, तो भी शायद ऐसी गलतफहमियाँ होती हैं। पर क्या कर सकते हैं? 

लेखन से जहाँ तक धनोपार्जन की बात है तो मैं तो यही कहूँगा कि लेखन आप अपने जूनून, अपनी सनक के हवाले होकर करते हो। यह एक ऐसी असाध्य बिमारी है जिससे छुटकारा पाना आसान नहीं है। लेखन आप अमीर या प्रसिद्ध बनने के लिए नहीं करते हैं। अगर अमीर या प्रसिद्ध होना ही आपका ध्येय है तो मेरी सलाह है कि आप दूसरे कार्य करके इन चीजों को आसानी से पा सकते हैं। मुझे लगता है कि एक कलाकार को छोड़कर कोई दूसरा व्यक्ति यह नहीं समझ सकता कि एक कलाकार अपनी कला के लिए जूनून के कैसे सोपान चढ़ता है और कई दफा निराशा की किन गहराइयों में गोते लगाता है। लेखन आपके मन मस्तिष्क को पूरी तरह से निचोड़ देता है। यह आपको थका देता है। आप इसे तब तक जारी नहीं रख सकते जब तक कि आप इसे लेकर पागलपन की हद तक जुनूनी नहीं हैं। 

प्रश्न: आपको लिखने के लिए क्या प्रेरित करता है। उदाहरण के लिए आपने एक कहानी द कर्सड ग्लास लिखी थी। यह कहानी एक कोरियाई शहर बुसान में घटित होती है और उसके किरदार भी उस पृष्ठ भूमि से काफी दूर हैं जहाँ आप अभी रह रहे हैं। इस कहानी के पीछे की क्या कहानी है?
उत्तर: प्रेरणा तो हर जगह से मिल जाती है। कुछ दिनों पहले में एक जगह पढ़ रहा था कि लेखन एक बुराई है क्योंकि कल्पना शैतान की बनाई शय है। खैर, जहाँ तक प्रेरणा की बात है मैं दूसरे लोगों को देखकर, किताबें और दुनिया भर के लेख पढ़कर प्रेरित होता हूँ। मैं लोगों और जगहों को नॉटिस बाखूबी कर लेता हूँ। यही नोटिस करना आगे चलकर मुझे लेखन के लिए सामग्री उपलब्ध करा देता है। साधारण से साधारण चीज - जैसे सर्द रात्रि में गली  के दूसरी तरफ मौजूद पीले रोशनी से रोशन घर भी मेरे दिमाग में कई विचारों को उत्पन्न कर मुझे कहानी का प्लाट दे देता है। 

जहाँ तक मेरे कहानी द कर्सड ग्लास, द गेटवे टू द अननोन जिसका उदाहरण आपने दिया है तो मैं यही कहूँगा कि मेरी कहानियाँ  केवल भारत और भारतीय किरदारों तक सीमित नहीं है। यह तो सिर्फ मेरे अभी की कृतियाँ हैं जो कि भारत की पृष्ठ-भूमि पर  आधारित हैं। भविष्य में आने वाले मेरी ज्यादातर कृतियाँ बाहरी देशों में हैं और वह उसी पृष्ठभूमि के गैर भारतीय किरदारों की कहानी कहती हैं। इसके दो कारण हैं- पहला तो यह कि मैं अपनी सोच को केवल भारत तक सीमित नहीं रख सकता और दूसरा यह कि मेरे कथानक जितनी जगहों के विषय में होते हैं उतने ही लोगों के विषय में भी होते हैं - और मेरा मानना है कि लोगों के मूलभूत भावनायें, इच्छाएं और उनका व्यवहार तकरीबन एक जैसा होता है। इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस देश और किस नस्ल के हैं। और क्योंकि मेरा लेखन मेरे लिए एक नई दुनिया में विचरने का जरिया है तो यह बात भी तर्कसंगत नहीं है कि मैं उसे एक ही देश तक सीमित रखूँ। मुझे जब बाहर निकलना ही है तो क्यों न इस पूरे संसार को अपनी कल्पनाओं के माध्यम से मापूं। मेरी इसी सोच का नतीजा मेरी कहानी ‘द कर्सड ग्लास, द गेट वे टू द अननॉन’ थी। इसमें न तो कोई आम किरदार थे और न ही ऐसी परिस्थियाँ जिनको आप कई बार देख चुके हों।

प्रश्न: अभी तक आपने परालौकिक तत्वों के इर्द गिर्द ही लेखन किया है। आपके पहले दो उपन्यास तन्त्र मन्त्र के इर्द गिर्द थे और अभी हाल में आई फर्स्ट वैम्पायर भी एक मिथकीय जीव के इर्द गिर्द ही बुना गया है? आपको इस तरह की कहानियों के तरफ क्या आकर्षित करता है?
उत्तर: जब से मैंने होश संभाला है तभी से जादू-टोना, तन्त्र मन्त्र और परालौकिक शक्तियों के प्रति मेरा विशेष आकर्षण रहा है। जब में छोटा था तो मुझे नवभारत टाइम्स में इन विषयों से जुडी खबरों को काटकर उन्हें एक स्क्रैप बुक के तौर पर सहेज कर रखता था। शायद मेरे लेखन के प्रति झुकाव के पीछे यह एक कारण भी है, क्योंकि गल्प लेखन भी एक जादुई चीज है। आप किसी जादूगर की तरह कुछ ऐसा रचते हो जिसका उससे पहले कोई अस्तित्व नहीं होता है। कुछ नया, कुछ अद्भुत। इसी कारण मेरी शुरूआती किताबों में एक तरह का जादुई, डार्क, कुछ गोथिक अहसास महसूस होता है क्योंकि मुझे ये चीजें आकर्षक लगती हैं। इनमें एक तरह का रहस्य है। एक रोमांच है। यह एक ऐसा रास्ता जहाँ से वापिस नहीं लौटा जा सकता है। यह कुछ कुछ ऐसी खाई में छलांग लगाने सरीखा है जहाँ धुंध ने नीचे कुछ छुपा हुआ हैं। यह आपको डराता तो है लेकिन साथ में रोमांचित भी करता है।

प्रश्न: आपके लेखन का क्या तरीका है? आप रिसर्च किस तरह से करते हैं? उदाहरण के लिए अपनी हाल ही में रिलीज़ किताब द फर्स्ट वैम्पायर, जो कि ऐसे समय में आधारित है जब भारत में अंग्रेजो का राज्य था, के लिए आपने किस तरह से रिसर्च की? 
उत्तर: कुछ भी लिखने से पहले मैं उस विषय के ऊपर काफी चीजें पढ़ता हूँ और उस पर शोध करता हूँ। कई बार तो यह सिलसिला महीनों या सालों तक भी चलता है जिससे मेरा लेखन काफी धीमा हो जाता है। लेकिन मेरा मानना है कि साल की आठ-दस अधकचरी किताबें आने से बेहतर साल में एक अच्छी किताब आना होता है। इसे मेरी कमजोरी या मेरी ईमानदारी कह सकते हैं कि मैं अधपकी चीजों को अपने पाठक के सामने नहीं रखना चाहता हूँ। 

जहाँ तक लेखन के लिए शोध की बात है तो मैं लोगों से बातचीत करता हूँ और उनके अनुभवों से सीखता हूँ… फिर वो तांत्रिक हों, कालकाजी मंदिर के बाहर बैठने वाले साधु बाबा हों, पुरानी दिल्ली में मौजूद ईसाईयों के कब्रिस्तान के चौकीदार हों या अमेरिका के नार्थ कैरोलिना में रहने वाली विच (जादूगरनी) हो।

कहानी में मौजूद यह सच्चे विवरण, ये डिटेल्स मेरे पाठकों को बेहद पसंद आते हैं। उदाहरण के लिए वारलॉक एक लाश का वापस जिंदा होने का दृश्य हो या तांत्रिकों द्वारा किये जाने वाले अनुष्ठानों का सच्चे  विवरण या फर्स्ट वैम्पायर में दिखाई गयी ईरान के लोगों की जिंदगी के तौर-तरीके; इन सभी को लिखने में मैंने बहुत ज्यादा रिसर्च (शोध) करा था और इसे पाठकों ने काफी सराहा भी था।

‘द फर्स्ट वैम्पायर’ की ही बात ले लें तो मैंने इसके लिए इतना शोध किया था कि मेरे पास अभी एक और किताब लिखने लायक सामग्री मौजूद है। मैं भविष्य में इन्हीं किरदारों को लेकर एक दूसरा उपन्यास लिखूँगा जिसे मैं इस उपन्यास से दस गुना ज्यादा मनोरंजक बनाने को कोशिश करूँगा। मेरे एक हॉरर उपन्यास पर मुझे जो सबसे ज्यादा दिलचस्प और यादगार आलोचना मिली थी वह यह थी कि वह जरूरत से ज्यादा डरावनी है। सोचिये एक हॉरर कहानी के लिए क्या इससे बेहतर कुछ टिप्पणी और हो सकती हैं?

प्रश्न: आप अभी क्या लिख रहे हैं? क्या आप अपने आने वाले प्रोजेक्ट्स के विषय में पाठकों को बताना चाहेंगे?
उत्तर: फिलहाल तो मैं ‘द फर्स्ट वैम्पायर’ के हिन्दी अनुवाद पर कार्य कर रहा हूँ। इसके पश्चात, मुझे अभी यह निर्णय लेना है कि मैं किसी अन्य हॉरर किताब पर कार्य करूँगा या किसी विज्ञान गल्प पर या किसी ऐसिहासिक गल्प पर। मेरा निर्णय इस बार पर निर्भर करता है कि मुझे क्या प्रेरणा मिलेगी या फिर पाठकों को मुझसे क्या चाहिए होगा?

प्रश्न: आपको किस तरह का साहित्य पढ़ना पसंद है? क्या आप अपनी पसंदीदा किताबों के विषय में पाठकों को बताने चाहेंगे?
उत्तर: मैं जितना लेखन को लेकर जुनूनी हूँ उससे कई गुना ज्यादा पढ़ने को लेकर जुनूनी हूँ। मैं जब लेखन नहीं कर रहा होता हूँ या लेखन के विषय में सोच नहीं रहा होता हूँ तो मैं पढ़ रहा होता हूँ। मैं हर तरह की किताबें, हर तरह के फॉर्मेट में पढ़ता हूँ। जब किताबें नहीं पढ़ रहा होता हूँ तो लेख पढ़ रहा होता हूँ। मुझे जासूसी साहित्य, आत्मकथाएँ, इतिहास सम्बन्धी पुस्तकें, कांस्पीरेसी थियोरियाँ, विभिन्न संस्कृतियों के विषय में पुस्तकें इत्यादि पढ़ना पसंद है। मुझे गल्प(फिक्शन) और कथेतर (नॉन-फिक्शन) दोनों ही तरह का साहित्य पसंद है। अगर पसंदीदा पुस्तकों की बात की जाए तो फ्रेडरिक फॉरसीथ के उपन्यास, आर्थर कॉनन डोयल द्वारा लिखी गयी शर्लाक होल्म्स की कहानियाँ और जॉर्ज ओरवेल की 1984 का नाम मैं लेना चाहूँगा। मैं अक्सर लेखक के बजाय किताब को तरजीह देता हूँ और इस कारण मैंने अलग अलग लेखकों द्वारा लिखी गयी अलग अलग किताबें पढ़ी हैं। भारतीय लेखकों में से मुझे वेद प्रकाश कम्बोज, सुरेन्द्र मोहन पाठक, परशुराम शर्मा, वेद प्रकाश शर्मा, अमित खान, अनिल मोहन, विकास स्वरुप की किताबें पसंद आती हैं। 

प्रश्न:  आपकी किताबों के हिन्दी अनुवाद हुए हैं। यह विचार कैसे बना? आप अनुवाद  और उसकी जरूरत के विषय में क्या सोचते है?
उत्तर: जब से मेरी वारलॉक श्रृंखला की पहली पुस्तक  प्रकाशित हुई थी तभी से पाठकों ने मुझसे कई बार इसका हिन्दी अनुवाद लाने को कहा था। फिर  मेरे भाई आदित्य वत्स ने मुझे इसका अनुवाद लाने के लिए प्रोत्साहित किया और अमित खान जी हिन्दी अनुवाद अपने प्रकाशन संस्थान के द्वारा प्रकाशित करने को तैयार हो गये तो यह किताब पाठकों के हाथों में पहुँचने में सफल हुई। मैं यहाँ यह बताना चाहूँगा कि हिन्दी पाठकों की दुनिया अद्भुत है। जितना प्यार, जितना अपनापन वो आपको देते हैं वह दूसरी जगह पाना मुश्किल है। 

मैं इस बात से भी पूर्णतः कायल हूँ कि किताबों के अनुवाद आते रहने चाहिए। यह किताब का दायरा बढ़ाता है। मैं यह उम्मीद करता हूँ कि मेरी किताबें अन्य भाषाओं(भारतीय और वैश्विक) में भी अनूदित होंगी जिसके चलते मैं अलग-अलग भाषाओं के पाठकों का भी मनोरंजन कर पाऊँगा। 

प्रश्न: आज के वक्त में जब हम इस त्रासिदी में जी रहे हैं तो इसमें साहित्य क्या भूमिका निभा सकता है? 
उत्तर: साहित्य जहाँ एक तरफ आपको मनोरंजन भी प्रदान कर सकता है तो वहीं दूसरी तरफ रोजमर्रा की तकलीफों से कुछ वक्त के लिए निजाद भी दे सकता है। यह आपको प्रेरित भी कर सकता है और आपको प्रोत्साहित भी करता है। कई बार अवसाद से घिरे हुए व्यक्ति को केवल आपसे यह चाहिए होता है कि आप उससे सहानुभूति रखे और उसकी बातें सुनें। ऐसे में अगर लेखक अपनी रोचक कहानियों के माध्यम से लोगों को रोजमर्रा के तनावों से मुक्ति दिला सके या किसी भी एक व्यक्ति जो प्रेरित कर उसे बचा सके तो उससे बेहतर और कुछ नहीं है। मानव मस्तिष्क कुछ इस तरह से बना हुआ है कि हम अक्सर तथ्यात्मक बातों को भूल जाते हैं, अगर हमें ज्यादा ज्ञान दिया जाए तो उसे नजरअंदाज कर देते हैं लेकिन हम अक्सर ऐसी बातों को याद रखते हैं, ऐसी बातों से प्रेरित होते हैं जो कि हमे अच्छी कहानियों, फिर चाहे वो सच्ची हो या काल्पनिक, के चोले में समझाई जाती हैं।

प्रश्न: लॉकडाउन का आपके ऊपर क्या प्रभाव पढ़ा है? आपकी जीवनशैली किस तरह से प्रभावित हुई है और यह बदलाव आपके जीवन में क्या असर डालेगा?
 उत्तर: इस दौरान मैं कई तरह के भावों से गुजरा हूँ। अवसाद, मानसिक तनाव,आत्मविश्वास और उत्साह  के बीच डोलता रहा हूँ। मैंने इस वक्त को अपने लेखन के ऊपर ज्यादा से ज्यादा केन्द्रित करने में लगाया है। मैं अभी तक अपनी तीन किताबें प्रकाशित कर पाया हूँ - दो अपनी वारलॉक श्रृंखला के उपन्यासों के हिन्दी अनुवाद और एक अंग्रेजी उपन्यास द फर्स्ट वैम्पायर। इसके अलावा इस समय का उपयोग मैं देश भर में फैले अपने पाठकों से सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़ने में भी किया है। मेरे जैसे अन्तर्मुखी व्यक्ति जिसे पढ़ने लिखने में सबसे ज्यादा ख़ुशी मिलती है उसे घर में रुकने में कोई ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। मुझे अगर कुछ किताबें पढ़ने को मिल जाएँ और लिखने के लिए कागज़-कलम दे दिया जाए तो मुझे लगता है मैं कहीं भी रह लूँगा।

प्रश्न:  आखिर में आप अपने पाठकों को क्या कहना चाहेंगे? उन्हें क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर: मैं अपने पाठकों को पहले तो धन्यवाद् कहूँगा कि उन्होंने मुझे अपने समर्थन और अपने प्यार से नवाजा। मैं जब लिखता हूँ तो खुद के लिए लिखता हूँ और अक्सर वही कहानियाँ लिखता हूँ जिन्हें मुझे लिखने में मजा आता है परन्तु किताब प्रकाशित करते वक्त मेरे जहन में केवल मेरे पाठकों का विचार रहता है। मेरी कोशिश रहती है कि जो भी वक्त और पैसा उन्होंने मेरी रचना पर लगाया है वो उन्हें जाया होता न लगे। उन्हें मेरी रचनाएँ ‘पैसा-वसूल’ लगे।

और मेरे पाठक भी मुझे इतनी मोहब्बत देते हैं जिसे शब्दों में ब्यान करना मेरे लिए तो मुश्किल ही है। मेरी हमेशा कोशिश रहेगी कि उन्हें कुछ नया, कुछ हटकर पढ़ने को देता रहूँ और मुझे उम्मीद रहती है कि उन्हें मेरी यह कोशिशें पसंद आएँगी। मेरे लेखन को मेरे पाठक और मेरे लेखन के प्रति उनके विचार ही सशक्त करते हैं। मुझे लगता है कि मैं भले ही ज्यादा प्रतिभावान लेखक न होऊँ लेकिन मैं एक मेहनती, ईमानदार और निष्ठावान लेखक जरूर हूँ, जो हर किताब के साथ अपने आप को बेहतर करने और अच्छा से अच्छा लेखन पाठकों को देने की कोशिश करता है। मुझे उम्मीद है पाठक   मेरा साथ देते रहेंगे।

मैं पाठकों से यह भी कहना चाहूँगा कि वह किताबों के विषय में अपने विचार अमेज़न, फ्लिप्कार्ट, गुड रीड्स और सोशल मीडिया में देते रहे ताकि जिन पाठको को ऐसी कहानियों की तलाश है, वह तलाश पूरी हो।

विक्रम ई दीवान जी की किताबें

अनुवाद: विकास नैनवाल 'अंजान'
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तो यह थी विक्रम जी से हुई हमारी बातचीत। यह बातचीत आपको कैसी लगी? अपने विचारों से आप हमें जरूर अवगत कर्वाइयेगा। 

'एक बुक जर्नल' में मौजूद अन्य साक्षात्कार आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

© विकास नैनवाल 'अंजान'

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