एक बुक जर्नल: जुआघर - अनिल मोहन

Wednesday, January 1, 2020

जुआघर - अनिल मोहन

दिसम्बर 28, 2019 से दिसम्बर 31 ,2019 में पढ़ा

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 240
प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स
आईएसबीएन:9789380871486
मूल्य: 60 रूपये


जुआघर - अनिल मोहन
जुआघर - अनिल मोहन

पहला वाक्य:
देवराज चौहान ने कार के स्टेयरिंग में कोहनी फँसाई और सिग्रेट सुलगाकर पुनः स्टेयरिंग थाम लिया।
कहानी:
ब्लू स्टार कैसिनो काठमांडू का सबसे प्रतिष्ठित कैसिनो था। यूँ तो यहाँ रौनक सालभर रहती थी लेकिन साल के आखिरी सप्ताह में इस रौनक में चार चाँद लग जाते थे। उन दिनों इधर पर्यटकों की भरमार रहती थी और इस कारण काफी लेन देन भी होता था। लोगों की माने तो 60-80 करोड़ रूपये ब्लू स्टार कैसिनो के स्ट्रोंग रूम में उस वक्त मौजूद रहते थे।

यह रूपये किसी की भी नियत बिगाड़ने के लिए काफी थे। लोगों की नियत डोली भी थी लेकिन ब्लू स्टार कैसिनो की सुरक्षा व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि कोशिश करने वाले कोशिश करते हुए मारे गये थे। ब्लू स्टार  कैसिनो से इन पैसों को निकालना लगभग असम्भव माना जाता था।

पर अब इस असम्भव से लगते काम को करने का बीड़ा जगमोहन ने उठाया था। जगमोहन काठमांडू आया तो किसी और काम से था लेकिन हालात ऐसे बने थे कि वह अब ब्लू स्टार कैसिनो में डाका डालने की योजना बना चुका था।

वहीं देवराज चौहान को उस काम को अंजाम देना था जिसके लिए जगमोहन इधर आया था।  यानि वह जगमोहन पर नजर तो रख सकता था लेकिन उसकी मदद नहीं कर सकता था।

क्या जगमोहन डकैती डाल पाया? 
जगमोहन को डकैती डालने की आवश्यकता क्यों पड़ी? 
आखिर देवराज चौहान जगमोहन की मदद क्यों नहीं कर पाया? 
वो लोग पहले किस मकसद से काठमांडू से आये थे? 


मुख्य किरदार:
देवराज चौहान - डकैती मास्टर
जगमोहन - देवराज का साथी
माथुर - आई बी का चीफ डिटेक्टिव
कदम सिंह - माथुर का सहकर्मचारी
अजित गुरुंग - ब्लू स्टार का मालिक
बाल्को  खंडूरी - ड्रगस के काम में लिप्त एक बड़ा रईस व्यक्ति
रामसिंह - ब्लू स्टार होटल में वेटरों का हेड
बाज बहादुर - ब्लू स्टार कैसिनो का मैनजेर
सूर्य थापा - देवराज चौहान का पहचान वाला जिसने जगमोहन की नौकरी ब्लू स्टार में लगाई थी
मंगल जोशी - ब्लू स्टार होटल के मालिक
ओम नटियार - ब्लू स्टार कैसिनो की सिक्यूरिटी का इंचार्ज
माला - एक नेपाली लड़की
बन्धु - माला का भाई
पदम सिंह, गोरखा, विजय - बन्धु के साथी

मेरे विचार
जुआघर वैसे तो देवराज चौहान श्रृंखला का उपन्यास है लेकिन यह काफी मामलों में बाकी के उपन्यासों से भिन्न है। अगर आप देवराज चौहान श्रृंखला के पाठक हैं तो इस बात से वाकिफ होंगे कि देवराज चौहान और जगमोहन का समीकरण कुछ ऐसा है कि डकैती डालने की योजना और तैयारी हमेशा देवराज करता है और जगमोहन केवल उसका साथ देता है। यानी एक तरह से कहा जाए कि जगमोहन देवराज का साइड किक है जो देवराज के कहे अनुसार चलता है। लेकिन इस उपन्यास में ऐसा नहीं है। वैसे तो जगमोहन काठमांडू देवराज के कहने पर ही आता है लेकिन डकैती की योजना वो खुद ही बनाता है और उसका किर्यान्वन भी वो खुद ही करता है।

उपन्यास में दो योजनायें एक साथ चलती हैं। एक तो डकैती की जिसको जगमोहन को अंजाम देना होता है और दूसरी वह योजना जिसके चलते देवराज काठमांडू आया होता है। पाठक को इस कारण दो दो रोमांचक घटनाक्रम देखने को मिलते हैं जो उसका भरपूर आनन्द करते हैं।

हमें जगमोहन का इस उपन्यास में एक नया रूप भी देखने को मिलता है। अक्सर वह बाकि उपन्यासों में ऐसे व्यक्ति के तौर पर नजर आता है जिसे दौलत के आगे कुछ और नहीं दिखता है लेकिन इधर ऐसा नहीं है। पाठक को इधर एक अलग जगमोहन देखने को मिलता है जिसे मिलकर मुझे अच्छा लगा। जगमोहन को बिना  देवराज के निर्देश काम करते हुए देखना भी अलग अनुभव था जिसने मेरा मनोरंजन किया। इससे मेरे दिमाग में यह ख्याल आया कि क्या हो कि एक उपन्यास ऐसा हो जिसमें केवल जगमोहन और सोहनलाल हों। देवराज चौहान न हो। ऐसे उपन्यास को पढ़ने में मजा आयेगा। जिस प्रकार सोहनलाल और जगमोहन की नोक झोंक चलती है उसमें यह देखना रोचक होगा कि जगमोहन सोहन के साथ कैसे निभाता है।

सोहन लाल की बात चली है तो उसकी कमी इधर खली। सोहनलाल के होने से एक हँसी मजाक का माहौल बना रहता है जिसका आभाव उसके न होने से इधर महसूस हुआ।

उपन्यास के घटनाक्रम की बात करूँ तो जगमोहन से जुड़ा घटनाक्रम भावना प्रधान है वहीं देवराज चौहान से जुड़ा घटनाक्रम देश प्रधान है। मैं इतना ही कहूँगा कि इस बार देवराज देश के लिए काम करता दिखता है जो कि मुझे अच्छा लगा। रोचकता के मामले में मुझे जगमोहन वाला घटनाक्रम ज्यादा रोचक लगा। वह मुख्य घटनाक्रम भी है तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। हाँ, देवराज चौहान वाले घटनाक्रम एक प्रसंग आता है जब देवराज को एक व्यक्ति का अपहरण करना होता है। यह प्रसंग और रोचक बनाया जा सकता था।

उपन्यास के अंत की बात करूँ तो उपन्यास का अंत मुझे पसंद आया। उपन्यास के अंत में घुमाव हैं। ऐसे घुमाव काफी फिल्मों में देखने को मिलते हैं लेकिन मुझे इससे व्यक्तिगत तौर पर दिक्कत नहीं हुई। ये घुमाव मुझे पसंद आये।

उपन्यास की कमियों की बात करूँ तो मुझे एक कमी यही लगी कि उपन्यास कई जगह धीमा लगा। देवराज चौहान के उपन्यास अपने कथानक की स्पीड के लिए जाने जाते हैं। इस उपन्यास में चूँकि डकैती की योजना बन तो पूरे उपन्यास में रही होती हैं लेकिन डकैती आखिर के बीस पच्चीस पृष्ठों में होती है तो कथानक थोड़ा धीमा लगता है। अगर घटनाक्रम को कुछ और रोमांचक घटनाओं से तेजी प्रदान की जाती तो और बेहतर रहता।

उपन्यास आप एक बार पढ़ सकते हैं। देवराज चौहान के पाठकों को इसमें कुछ नया पढ़ने को मिलेगा।

अगर  अपने इस किताब उपन्यास को पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? अपने विचारों से आप मुझे कमेन्ट के माध्यम से बता सकते हैं।

रेटिंग: 3/5

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देवराज चौहान श्रृंखला के दूसरे उपन्यासों के प्रति मेरे विचार आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
देवराज चौहान

अनिल मोहन जी के अन्य उपन्यासों के प्रति मेरी राय आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
अनिल मोहन

कुछ प्रश्न:
प्रश्न 1: देवराज चौहान और जगमोहन में जगमोहन साइड किक है। यानी अक्सर मुख्य भूमिका देवराज की होती है। लेकिन इस उपन्यास के कुछ हिस्से में ऐसा नहीं है। मेरा प्रश्न यह है कि ऐसी और कौन सी जोड़ियों में मौजूद साइड किक के उपन्यास आप पढ़ना चाहेंगे? उदाहरण के लिए ब्योमकेश बक्षी में आने वाले अजित को लेकर लिखा गया उपन्यास मैं जरूर पढ़ना चाहूँगा जहाँ वो अकेला ही केस सुलझाता है।
प्रश्न 2: अपराध साहित्य में अक्सर जोड़ियों का महत्व रहा है। आपकी सबसे पसंदीदा जोड़ी कौन सी है?
प्रश्न 3: उपन्यास की एक और ख़ास बात यह थी कि इसका घटनाक्रम 31 दिसम्बर की रात को जाकर खत्म होता है और मैंने भी उपन्यास 31 दिसम्बर की रात को ही पूरा किया। क्या आपने कभी ऐसा किया है जिस तारीक में उपन्यास के घटनाक्रम चल रहे हैं आपने भी उसी तारीक को इसे पढ़ा हो? अगर हाँ, तो वो कौन सा उपन्यास था?


©विकास नैनवाल 'अंजान'

2 comments:

  1. समीक्षा अच्छी लगी । उपन्यास भी पढ़ना चाहूंगी । अमेजन पर कोशिश करती हूँ ।

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    1. जी आभार। पढ़कर राय दीजियेगा।

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