एक बुक जर्नल: बोगेंनविलिया की टहनी - जगदर्शन सिंह बिष्ट

Sunday, December 29, 2019

बोगेंनविलिया की टहनी - जगदर्शन सिंह बिष्ट

उपन्यास नवम्बर 30,2019  से  दिसंबर 1,2019 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 91
प्रकाशक: समय साक्ष्य
आईएसबीएन: 9789388165389
मूल्य: 100


बोगेंनविलिया की टहनी - जगदर्शन सिंह बिष्ट
बोगेंनविलिया की टहनी - जगदर्शन सिंह बिष्ट

पहला वाक्य:
कॉन्फ्रेंस हॉल में कम्पनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की मीटिंग चल रही है।

कहानी
बौगेंनविलिया कि वह टहनी राघवेन्द्र सिंह रौतेला के लिए मन्दिर का दर्जा रखती थी। सुबह ऑफिस जाने से पहले और दफ्तर से लौटकर आने के बाद सबसे पहले वह उस टहनी को पानी चढ़ाना नहीं भूलता था। अपने हर अच्छे कार्य की शुरुआत वह उस टहनी के आगे नतमस्तक होकर करता था।

आज उस टहनी के समक्ष खड़ा वह बेहद खुश था। उसको अपने शहर देहरादून वापिस जाने का मौका जो मिल रहा था। पिछले बीस सालों से राघवेन्द्र अपने शहर से दूर रहा था। कुछ वर्षों से वह नॉएडा की कम्पनी में कार्यरत था लेकिन अब जाकर उसे अपने शहर जाकर रहने का मौका मिल रहा था।

इस ख़ुशी में चार चाँद तब लग गये जब उसके दोस्त रोहित ने खबर दी कि उसकी लिखी किताब प्रूफ के लिए रेडी थी और एक बार प्रूफ करके प्रकाशक को दी जाए तो वह छपने के लिए तैयार थी ।

यह किताब राघवेन्द्र के उन अनुभवों का दस्तावेज था जिनके चलते वह आज जो था वो बन पाया था। इस किताब में दर्ज था सन तिरासी और सन चौरासी का वह हिस्सा जिसने राघवेन्द्र को राघवेन्द्र बनाया था। इस किताब में राघवेन्द्र ने यह भी उजागर किया था कि क्यों एक बौगेंनविलिया की टहनी उसके लिए मन्दिर का दर्जा रखती थी?

आखिर क्या था इस बौगेंनविलिया की टहनी की कहानी? 
क्यों राघवेन्द्र के लिए वह इतनी महत्वपूर्ण थी? 
आखिर क्या घटित हुआ था 1984 को देहरादून में?

मुख्य किरदार:
राघवेन्द्र सिंह रौतेला- कॉसमॉस इंटरनेशनल में डिप्टी मेनेजर प्रोडक्शन के रूप में कार्यरत एक व्यक्ति
वी एस वासुदेव, आर एम विश्वास, एन कानन - कॉसमॉस  इंटरनेशनल लिमिटेड के डायरेक्टर्स
रोहन श्रीवास्तव - मेनेजर एच आर  कॉसमॉस इंटरनेशनल
नन्दिनी - राघवेन्द्र की धर्म पत्नी
जानकी - राघवेन्द्र की माँ
आदि - राघवेन्द्र का चार वर्षीय बेटा
रोहित - राघवेन्द्र का दोस्त
चरनजीत - राघवेन्द्र का दोस्त जिसका ढाबा सिख विरोधी दंगों में जला दिया गया था
गुरविंद्र सिंह -  चरनजीत के जीजा जी
विश्वेन्द्र - राघवेन्द्र का छोटा भाई
मिस्टर तोमर और मिस्टर शर्मा - राघवेन्द्र के सहकर्मचारी जो उसके सामान की शिफ्टिंग के लिए आये थे
देवेन्द्र  सिंह - राघवेन्द्र के पिताजी



मेरे विचार:
बोगेंनविलिया की टहनी जगदर्शन सिंह बिष्ट जी का पहला उपन्यास है। यह उपन्यास समय साक्ष्य से प्रकाशित हुआ है। यह उपन्यास  किरदारों के माध्यम  से भारतीय इतिहास के एक ऐसे अध्याय को छूता है जो कि हमारी सभ्यता के ऊपर एक बदनुमा दाग है। ८४ के हृदय विदारक दंगो में काफी लोगों ने अपना सब कुछ गँवा दिया था। भारत के कई जगहों में इस दावानल ने कई परिवारों को भस्म किया था।

इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने उस वर्ष का जिक्र किया है जब देहरादून भी इन लपटों से झुलसा था। मुझे पता नही था कि देहरादून तक इस घटना का असर हुआ था। कुछ दिनों पहले रस्किन बांड की किताब(टेल्स ऑफ़ फोस्टरगंज) में विभाजन के दौरान हुयी घटनाओं की झलक पढ़ने को मिली। उसमें एक किरदार इससे प्रभावित था तो वह इसका जिक्र करता है। यहाँ भी ऐसा ही कुछ है।

कहानी की बात करूँ तो कहानी पठनीय है। राघवेन्द्र, जो कि एक अन्तर्राष्ट्रीय कंपनी में मेनेजर हैं, ने एक किताब लिखी है। इस किताब में 83 और 84 के बीच जो घटनाएं राघवेन्द्र की जिंदगी में हुई उनका जिक्र किया गया है। पाठकों को यह घटनाएं तब जानने को मिलती हैं जब राघवेन्द्र के पिता उसकी लिखी किताब की प्रूफ रीडिंग कर रहे होते हैं।

यह किताब 1983 के वर्ल्ड कप विजय से शुरू होती है और 1984 के दंगों के बाद तक जाती है। हालाँकि इसमें दंगों का जिक्र है लेकिन किताब एक क्रिकेट मैच के इर्द गिर्द बुनी गयी है। यह मैच थापी एलेवेन नाम की टीम के लिए जीने मरने का प्रश्न बन जाता है। इसी क्रिकेट मैच के कारण ही वो घटना होती है जो नायक राघवेन्द्र, जो कि थापी एलेवन का सदस्य होता है, की जिंदगी बदल देता है। इसमें छात्र राजनीति है, बचपन की शरारतें हैं, 84 में दंगों के वक्त का देहरादून भी है और आखिर में एक सीख भी है। अक्सर इनसान गलती करता है और फिर कुछ दिनों बाद उसे भूल जाता है। पर यदि हम अपनी गलती को याद रखें तो शायद अपने जीवन को सही दिशा देने में कामयाब हो सके। यही इस कहानी की मूल शिक्षा है।

किताब पढ़ते हुए आप अपने बचपन में पहुँच जायेंगे। मैं थापी एलेवेन के सदस्यों से उम्र में काफी छोटा हूँ लेकिन एक बैट के लिए जितनी जद्दोजहद करते वो दिखते हैं उतनी मैंने भी की है। इसे पढ़ते हुए बचपन के वो दिन याद आ गये। टीम का एक सदस्य सिख भी है तो 84 के दंगों से वह कैसे प्रभावित हुआ था यह भी कहानी का हिस्सा बन जाता है। हाँ, यह हिस्सा छोटा सा है क्योंकि केंद्र में एक मैच है। उम्मीद है जगदर्शन जी कभी 84 को केंद्र में रखकर एक उपन्यास लिखेंगे।

कहानी के केंद्र में एक गढ़वाली लड़का है तो एक आध जगह गढ़वाली संस्कृति भी देखने को मिल जाती है। मुझे लगता है गढ़वाली संस्कृति को थोड़ा और ज्यादा दर्शाया होता तो अच्छा रहता। गढ़वाली लोगों की हिन्दी में गढ़वाली का टच आ जाता है तो अगर वो भी दर्शाया होता तो बेहतर रहता। बहरहाल कहानी में एक जगह एक गढ़वाली सूक्ति का प्रयोग किया है। उसे मैं इधर दर्ज करना चाहूँगा क्योंकि मुझे वह काफी पसंद आई थी:

 "तुम पिताजी की बात का बुरा मत मानना। हमारे गढ़वाल में एक कहावत है "दान आदिमे बात अर ओमला कु स्वाद, बादमा आन्दु।" बड़े लोगों की बात और आँवले का स्वाद बाद में ही पता लगता है। इस बात को समझना बेटा।

- पृष्ठ 47

उपन्यास मुझे पसंद आया। कथानक के बीच बीच में कवितायेँ भी हैं और इक्के दुक्के फ़िल्मी गीत हैं जो कम शब्दों में भी काफी कुछ बोल जाती हैं। कहानी को बढ़ाने के लिए इनका प्रयोग भी किया गया है।


अंत में यह उम्मीद है जगदर्शन सिंह बिष्ट जी और भी रचनाओं को लाते रहेंगे।

अगर आपने इस पुस्तक को पढ़ा है तो आपको यह कैसी लगी? अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाइयेगा।
रेटिंग: 3/5

अगर आप इस किताब को पढ़ना चाहते हैं तो इसे निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

कुछ प्रश्न:
प्रश्न 1: क्या आपने 84 को केंद्र में रखकर लिखे गये उपन्यास पढ़े हैं? क्या आप कुछ के नाम साझा कर सकते हैं?
प्रश्न 2: क्या 83 विश्व कप को केंद्र में रखकर कुछ उपन्यास लिखे गये हैं? क्या आप उनके नाम साझा कर सकते हैं?
प्रश्न 3: क्या आपने ऐसे उपन्यास पढ़े हैं जिनकी पृष्ठभूमि देहरादून हो? क्या आप उनके नाम साझा कर सकते हैं?

प्रश्न 4: क्या आप ऐसे उपन्यासों के नाम बता सकते हैं जिनके केंद्र में गढ़वाली परिवार हों?



© विकास नैनवाल 'अंजान'

8 comments:

  1. बहुत अच्छी समीक्षा . गुलजार के उपन्यास "दो लोग"
    का कथानक विभाजन से 84 के आस पास का है ।

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    1. जी, उसके विषय में भी सुना है। उसे भी पढ़ना है। जल्द ही पढ़ूँगा।

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  2. Kuch hi din pehle yah kitab mene padhkar khatm ki aur sach kahu to lekhak ki vo kahani dil me utar gayi hai.
    Bahut hi saral bhasha ka paryog bade hi sahaj dhamg se kiya gaya hai.aakhri tak suspense bana rahta hai ki vo tahni aakhir itne mahatvapurn kyu hai.

    Lekhak ke yah pahli kitab hai parantu kahani bahut hi gazab hai va gazab dhang se prastut ki gayi hai.

    Kahani padhte hue mujhe bhi apna bachpan yad aa gaya tha.kahani padhkar yad aaya ki aaj kal samaj me log ek dusre ko milte to hai lekin keval whatsapp facebook me. Parantu kahani padhkar yah bhi yad aya ki pahle log sabko hakikat me mila karte the, sath khusiya v gam bata karte the, ek duje ki madad ke liye tatpar rahte the jo aajkal ke samaj me kam hi dekhne ko mil raha hai.

    Kahni humko naitik mulyo ka aina bai dikhati hai.

    Me 4.5 rating dena chaunga kitab ko (5 me se)

    A very brilliant effort by the author/writer. Eagerly waiting for 2nd book by him.

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    1. जी कहानी आपको पसंद आई यह जानकर अच्छा लगा। आपने सही कहा कि टहनी की महत्ता के विषय में अंत तक कोतुहल बना रहता है। हाँ, आजकल दौड़ भाग के चक्कर में मिलना मिलाना कम हो गया है इस बात से सहमत हूँ पर मेरा अनुभव इस मामले में जुदा रहा है। मैं ऐसे समूहों का सदस्य भी हूँ जिनके माध्यम से मैं कई लोगों से मिलता रहता हूँ। लेखक की दूसरी किताब का इन्तजार मुझे भी है। आप ब्लॉग पर आये और अपने विचार रखे इसके लिए आभार। ब्लॉग पर आते रहियेगा।

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  3. Love the title of this book.
    Yes, I read 'Chaurasi' by Satya Vyas. I really liked it.

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    1. Chaurasi is on my tbr. I plan to read it soon.Yeah, i too found the title interesting.

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  4. सर मै आपकी तरह हॉरर उपन्यासो का जुनूनी शौकीन हूँ क्या अगर आपके पास हॉरर उपन्यासो की पुस्तक हो तो आप मुझे किराए पर पढने के लिए दे सकते है?

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    1. जी,पुस्तकें देनी तो मुमकिन नहीं हो पायेंगी। हाँ मेरा एक दूसरा ब्लॉग है जिसमें मैं गाहे बगाहे पब्लिक डोमेन में मौजूद कहानियों के अनुवाद करता रहता हूँ। आप उधर जाकर उन कहानियों को पढ़ सकते हैं। आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी। कहानियों का लिंक निम्न है:
      दुईबात: कहानियाँ

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