गवाह नम्बर तीन - बिमल मित्र

उपन्यास 6 नवम्बर 2019 से 8 नवम्बर 2019 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
प्रकाशक: डायमंड प्रकाशन
पृष्ठ संख्या: 96
आईएसबीएन: 9788128400650
मूल्य: 50 रूपये



गवाह नम्बर तीन - विमल मित्र
गवाह नम्बर तीन - विमल मित्र


पहला वाक्य:
जल्दबाजी में लिखी गई मेरी यह कहानी जब पत्रिका में प्रकाशित हुई थी, मुझे जरा भी पसंद नहीं आई थी और फिर मेरी कौन-सी कहानी मेरी मनपसंद  होती ही है।

कहानी:
कथावाचक को रोककर जब उस व्यक्ति ने उनसे पैसे माँगे तो उसे देखकर वो आश्चर्य में पड़ गये। कथावाचक पेशे से एक लेखक थे और वह इस व्यक्ति को जानते थे। निशिकांत नाम का यह व्यक्ति एक शराबी था जो कि कथावाचक की ज़िन्दगी में पहले भी आया था। निशिकांत से आखिरी बार कथावाचक उस मुकद्दमे के दौरान मिले थे जिसमें वो गवाह नम्बर तीन थे।

निशिकांत को देखते ही कथावाचक को सरयू की याद भी आ गयी।

निशिकांत और सरयू को लेकर उन्होंने एक उपन्यास भी लिखा था जिससे उन्हें अच्छी खासी ख्याति भी मिली थी।

आखिर कौन था निशिकांत? कौन थी सरयू? 
कथावाचक से उनका क्या रिश्ता था? 
आखिर किस मुकद्दमे का गवाह नम्बर तीन कथावाचक को बनना पड़ा था? 

ऐसे ही प्रश्नों का उत्तर पाठक को इस उपन्यास को पढ़ने के पश्चात मिलेगा।

मुख्य किरदार:
कथावाचक: एक लेखक  जो लेखक बनने से पहले सी बी आई के अफसर थे
निशिकांत हलदार: एक शराबी व्यक्ति
सरयू - निशिकांत की पत्नी
कमला - सरयू की वह नौकरानी जो  सरयू के यहाँ तब काम करती थी जब वह टालीगंज में रहती थी
कनाई - कथावाचक का नौकर जब वह टालीगंज में रहता था
मल्लिक साहब - निशिकान्त का मकान मालिक
सुदर्शन - वह आदमी जो सरयू और निशिकांत को तब मिला था जब वो बँटवारे के बाद भारत आये थे
प्रभुदयाल सिंह - वह व्यक्ति जो लेखक के उपन्यास पर फिल्म बनाना चाहते थे
शशिकांत - निशिकांत का बड़ा भाई
श्रीकांत - निशिकांत का बड़ा भाई
प्राणकान्त - निशिकांत का पिता
भारद्वाज कुंडू - प्राणकान्त का पड़ोसी
अश्विन कुंडू - भरद्वाज का बेटा



मेरे विचार:
गवाह नम्बर तीन सरयू और निशिकांत की कहानी है। कहानी के कथावाचक एक लेखक हैं जिनकी ज़िन्दगी में इन दो व्यक्तियों का आना जाना समय समय पर लगा रहा। यह आना जाना किन परिस्थितियों में था इसका पता आपको कथानक पढ़ते हुए लगता है।

अक्सर हम लोग किसी के जीवन को ऊपरी तौर पर देखते हैं और फिर अपने मन में उनके प्रति एक धारणा बैठा लेते हैं। फिर पूरे जीवन भर हम उसी धारणा रुपी लेंस से उन्हें देखते हैं। हम यह सोचने की कोशिश नहीं करते हैं कि हो सकता है कि जो हम सोच रहे हों और जो हमे दिख रहा हो वो गलत हो। कुछ ऐसा भी हो जो हम न देख पा रहे हों और फिर जब कभी गाहे बगाहे यह 'कुछ' हमे दिखलाई देता है तो हम हैरत में पड़ जाते हैं कि अमुक व्यक्ति के प्रति हमारे ख्याल कितने गलत थे।

यही चीज लेखक के साथ भी होती है।  लेखक को यह किरदार इतने रोचक लगते हैं कि वह इनके ऊपर उपन्यास तक लिख देता है।  उपन्यास प्रसिद्ध भी होता है और उससे लेखक को प्रसिद्धि भी मिलती है। ऐसे में लेखक को लगने लगता है कि वह इनको अच्छी तरह जानता है लेकिन फिर अंत में उसे आश्चर्य का सामना करना पड़ता है। जिससे न केवल लेखक बल्कि पाठक भी हैरत में पड़ जाता है।

उपन्यास शुरुआत से लेकर अंत तक पठनीय है। निशिकांत के कहानी में दाखिल होते ही आप उसके विषय में और जानना चाहते हो। ज्यादातर  उपन्यास फ़्लैश बेक में ही है लेकिन इससे रोचकता पर असर नहीं पड़ता है। कहानी में सरयू है और उसके जीवन में इतने घुमाव आते हैं कि आप कहानी पढ़ते जाने के लिए विवश से हो जाते हैं। आप जानना चाहते हैं कि आखिर मुकद्दमा क्या था? और यह दोनों किरदार उस तक कैसे पहुँचे?

निशिकांत और सरयू का किरदार भी बेहतरीन बुना है। इन दोनों के बीच का समीकरण ऐसा है कि अंत तक पाठक यह नहीं समझ पाता है कि चल क्या रहा है लेकिन फिर आखिर में जब सब बात खुलती है तो सारी बातें सही लगने लगती हैं।

लेखन चुस्त है और कथानक कहीं भी धीमा नहीं पड़ता है। साथ ही चूँकि एक लेखक इस कहानी को सुना रहा है तो एक लेखक के लेखन वाले  जीवन और साहित्य के विषय पर रोचक टिप्पणियाँ भी कथानक का हिस्सा हैं जिन्हें कई बार पढ़ने का मन करता है। वहीं लेखन में एक और प्रसंग है जिसके माध्यम से लेखक ने बाबाओं पर एक टिप्पणी की है। इसमें भी एक बाबा हैं जो अध्यात्म के चोले ने गैरकानूनी कार्यों में लिप्त हैं। हाल फिलहाल में ऐसे कई बाबाओं का फर्दाफाश हुआ है तो पढ़ते हुए लगता है कि वक्त के साथ कुछ भी नहीं बदला है।

यह उपन्यास मुझे पसंद आया। निशिकांत और सरयू जैसे कई किरदार आपको अपने आस पास मिल जायेंगे। कई लोग उन्हें देखकर नाक भौं सिकोड़ लेंगे और उनसे दूर जाना चाहेंगे लेकिन अगर आप उनके पास जाकर उनकी कहानी सुनेंगे तो हो सकता है आप उनके लिए हमदर्दी महसूस करें जैसे लेखक निशिकांत के लिए करने लगता है।

किताब के कुछ अंश जो मुझे पसंद आये:
लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में मनुष्य के पास समय ही कहाँ है! मनुष्य का आज का धर्म हो गया है- आगे बढ़ते चलो-सबको पीछे छोड़ते चलो-धक्का मारकर, चोट पहुँचाकर- किसी भी तरह बढ़ते चले जाओ। रुकने का समय नहीं, पीछे मुड़कर देखने का समय नहीं, दो क्षण सोचने के लिए भी किसी के पास वक्त नहीं - क्योंकि उन्हीं दो क्षणों में तुम्हारे पीछे के वे लोग तुमसे आगे बढ़ जायेंगे।
(पृष्ठ 5)

साहित्य प्रयोजन पर निर्भर नहीं करता। साहित्य केवल प्रीति की फसल है और प्रीति प्रयोजन की परवाह नहीं करती। उसे तो समय चाहिए, गहराई तक पहुँचने के लिए। पर साहित्य सृष्टि के लिए वह 'समय' कोई नहीं देना चाहता। (पृष्ठ 5)

व्यक्तिगत रूप से मेरी धारणा रही है कि प्रत्येक कलात्मक रचना के पीछे एक सामाजिक नीतिबोध रहता है इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को नैतिक शिक्षा देना ही साहित्य का धर्म है, क्योंकि ऐसा होने से तो वह या तो धर्म-पुस्तक बन जाएगी या फिर पाठ्य पुस्तक। साहित्य की जो अधिष्ठात्री देवी है वह धर्म नहीं मानती, शिक्षा भी नहीं मानती। वह केवल एक ही चीज मानती है और वह रस।
(पृष्ठ 7)

लेकिन जहाँ भक्ति गाढ़ी हो युक्ति तुच्छ पढ़ जाती है। भक्ति के स्रोत में युक्ति और तर्क बिलकुल बह जाते हैं। 
 (पृष्ठ 13)

मनुष्य की स्मरण शक्ति भी बड़ी अजीब चीज है। एक छोटी-सी खोपड़ी में कितना कुछ है - सोचकर हैरानी होती है। कब की घटी कोई घटना अचानक नींद में याद आ जाती है और फिर जागने पर सोचता हूँ कि ऐसी बेतुकी बात दिमाग में आई कैसे?
(पृष्ठ 15)
नौकरी छोड़ने के बाद मेरी ख्याती तो उतनी नहीं बढ़ी पर दायित्व हजार गुना बढ़ गया था। नौकरी में एक बात बड़े मजे की है। वहाँ एक व्यक्ति को खुश रखने से काम चल जाता था, लेकिन लेखक की दुनिया तो कुछ और ही है। एक ओर तो वह स्वयं मालिक है और दूसरी तरफ उसके सभी पाठकगण उसके मालिक हो जाते हैं। 
(पृष्ठ 16)

जीवन में बहुत सी ऐसी घटनाएं घटती हैं जिनके आरम्भ का पता तो सबको होता है, पर जिनका अंत अज्ञात रह जाता है। इतनी बड़ी दुनिया में कब कौन आता है और कब कौन खो जाता है, इसका हिसाब कौन रखे? लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी भी होती हैं जो रेलगाड़ी की तरह बनी बनाई पटरी पर चलकर रेल की तरफ ही एक निर्दिष्ट गंतव्य पर जाकर खत्म होती हैं।
(पृष्ठ 21)

साहित्य सेवा ने इतने दिन बिताकर आज फिल्मों के लोगों से जब हितोपदेश सुनता हूँ तब अपने को धिक्कारने का मन करता है। सिनेमा के दर्शकों की बात मैं नहीं करना चाहता। उन्हें शायद मालूम नहीं कि हम अनपढ़ लोगों के लिए कलम नहीं पकड़ते, और न ही पढ़े लिखे लोगों के लिए। हम तो बस थोड़े बहुत रसिक लोगों के लिए लिखते हैं।....लिखने के समय केवल दो ही लोगों का ख्याल रहता है- एक तो स्वयं का और दूसरा चिरकाल के उस अदृश्य पाठक का।(पृष्ठ 58)


उपन्यास अगर आपने पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? अपने विचारों से मुझे टिप्पणियों के माध्यम से अवगत करवा सकते हैं।

रेटिंग: 3.5/5

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© विकास नैनवाल 'अंजान'
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4 Comments
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  1. बहुत बढ़िया समीक्षा ।

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    1. जी आभार। बिमल मित्र जी के उपन्यास पठनीय ही होते हैं। मौका लगे तो पढ़ियेगा जरूर।

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  2. यह बात सत्य है कि हमारी किसी के प्रति एक बार निर्मित धारणा उम्रभर नहीं बदलती।
    उपन्यास समीक्षा रोचक लगी।
    उपन्यास पढने की कोशिश रहेगी।

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    1. पुस्तक के प्रति आपकी राय जरूर जानना चाहूँगा। यह लेख आपको पसंद आया यह जानकर अच्छा लगा।

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