एक बुक जर्नल: वर्दी का नशा - अनिल मोहन

Thursday, July 25, 2019

वर्दी का नशा - अनिल मोहन

उपन्यास 21 जुलाई 2019 से 24 जुलाई 2019 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 256
प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स
आईएसबीएन: 9789380871301
मूल्य : 60 रूपये

वर्दी का नशा - अनिल मोहन


पहला वाक्य:
जगमोहन ने चाय की दुकान में प्रवेश किया और पल भर के लिए ठिठकर  भीतर निगाह मारी। 

कहानी:
जंगल में मौजूद वो खंडहर कभी महल रहे होंगे और कभी वो आबाद भी रहे होंगे लेकिन आज के वक्त में तो उधर कोई मुश्किल ही आता था। इसी कारण वो युवा प्रेमी युगलों का मिलने का ठिकाना बन गया था जहाँ वो बिना किसी की परवाह किये प्रेम के कुछ पल बिता सकते थे। उस वक्त भी वो जोड़ा यही कर रहा था जब  उन्हें उधर मौजूद एक रहस्यमय दरवाज़े का पता चला।

उन्होंने पुलिस को इसकी खबर की तो वह खंडहर पूरे देश के कोतुहल का मरकज बन गया। वह दरवाज़ा नौ कमरों तक जाता था और हर एक कमरा खजाने से भरा हुआ था।

अखबार वालों के मुताबिक 2000 करोड़ का खजाना होने की उम्मीद उधर थी और वही पुलिस वाले जानते थे कि यह कीमत 25000 करोड़ के करीब हो सकती थी।

कुछ दिनों पहले जो जगह वीरान रहा करती थी उधर अब 200 से ऊपर पुलिस वाले तैनात थे। जैसे जैसे खजाने की मूल्य का पता लगता जा रहा था उधर ही सुरक्षा का इंतजाम पुख्ता होता जा रहा था।

पुलिस के मुताबिक़ कोई बेवकूफ ही होगा जो 200 लोगों के बीच में उस खजाने को लूटने की कोशिश कर सकता था।
लेकिन वो लोग नहीं जानते थे कि एक ऐसा व्यक्ति था जो यह काम करने में माहिर था और उसने उस खजाने को लूटने का मन बना लिया था।

उसे लोग डकैती मास्टर कहा करते थे  और उसका नाम देवराज चौहान था।

क्या देवराज चौहान अपने मकसद में कामयाब हो पाया? 

अगर हाँ, तो उसने अपने इस कारनामे को कैसे अंजाम दिया?

अपने मकसद की कामयाबी के लिए उसे कैसे कैसे पापड़ बेलने पड़े?

ऐसे ही कई प्रश्नों का उत्तर इस उपन्यास को पढ़ने पर मिलेगा।


मुख्य किरदार:
शिवलाल तोड़े - एक चाय वाला
इंस्पेक्टर चेतन नाडा - पुलिस इंस्पेक्टर जिसके थाने में खजाना मिला था
रोशन गाड़े - एक सब इंस्पेक्टर
पार्वती - रोशन गाड़े की बीवी
विनय बरूटा - एक डकैत जिसका नाम जगमोहन इस्तेमाल कर रहा था
देवराज चौहान - डकैती मास्टर
जगमोहन - देवराज चौहान का साथी
पप्पू पासवान - एक बाईस वर्षीय नवयुवक
बंटी - एक बीस वर्षीय युवक जो गाड़े के लिए काम करता था
अमलेश कमती - गाड़े का आदमी जो उसके लिए नोट देने वाली पार्टी लाता था
हरिराम - एक शार्प शूटर जिससे रोशन गाड़े अपना काम निकलवाता था
भीमसिंह फोरे - एक केटरिंग कम्पनी का मुलाजिम
प्रकाश - भीमसिंह फोरे का सहकर्मचारी
इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े - पुलिस इंस्पेक्टर जो देवराज चौहान के पीछे पड़ा था
देवी शंकर - पुलिस कमीश्नर जो डकैती सुलझाने की तहकीकात को लीड कर रहा था
इंस्पेक्टर नरेंद्र ठाकरे - एक पुलिस वाला
सोहनलाल - एक वाल्ट बस्टर जो कि देवराज चौहान का दोस्त था
नानिया - सोहनलाल की पत्नी

मेरे विचार:

देवराज चौहान सीरीज के उपन्यास पढ़ने में मुझे आनंद आता है। इस सीरीज के उपन्यास मूलतः थ्रिलर ही होते हैं। थ्रिलर उपन्यास रहस्यकथा से इस मामले में भिन्न होते हैं कि थ्रिलर में कथानक में ट्विस्ट या हैरतअंगेज घुमाव का होना जरूरी  नहीं होता है। ऐसा नहीं है कि रहस्य हो नहीं सकता  लेकिन उपन्यास की यूएसपी इसकी तेज रफ्तार होती है जो कि उपन्यास पढ़ते जाने के लिए आपको विवश कर देती है। जबकि रहस्यकथाओं में रहस्य को वरीयता दी जाती है और इस कारण काफी रहस्यकथाओं के कथानक तेज रफ्तार नहीं होते हैं। अगाथा क्रिस्टी इसका उदाहरण हैं।लेकिन  देवराज चौहान के उपन्यास में ये रफ्तार मौजूद रहती ही रहती है और इस कारण मैं इसके उपन्यास गाहे बगाहे पढ़ता रहता हूँ।

यही कारण है कि देवराज चौहान का एक उपन्यास जेल से फरार जून के पढ़ने के बावजूद इस बार फिर मैंने देवराज चौहान श्रृंखला  का ही एक उपन्यास उठाया। जहाँ जेल से फरार रवि पॉकेट बुक्स के द्वारा प्रकाशित किया गया है वहीं वर्दी का नशा राजा पॉकेट बुक्स के द्वारा प्रकाशित किया गया है। इन दो प्रकाशनों के अलावा देवराज चौहान श्रृंखला के उपन्यास सूरज पॉकेट बुक्स भी प्रकाशित करता है। लेकिन इधर मैं ये बताना चाहूँगा कि हिंदी पल्प में राजा पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित उपन्यासों के संस्करण की क्वालिटी  शायद ही कोई छू पाता है।  यह उपन्यास साठ रूपये का है लेकिन छपाई के मामले में काफी महंगे उपन्यासों से बीस ही है। अगर सभी पॉकेट बुक्स वाले इसको स्टैण्डर्ड माने तो मज़ा आ जाये। अपनी प्रिंटिंग क्वालिटी के लिए राजा पॉकेट बुक्स बधाई के पात्र हैं।

देवराज चौहान की अगर बात करूँ तो देवराज चौहान को डकैती मास्टर कहा जाता है। यानी वो असम्भव सी लगने वाली डकैतियों को भी अंजाम देने का हुनर रखता है। इन कारनामों में उसका साथी जगमोहन रहता है। जब कभी वाल्ट तोड़ने की बारी आती है तो वो अपने दोस्त सोहनलाल को भी अपनी टीम का हिस्सा बना लेता है।

देवराज चौहान के विषय में एक और बात मशहूर है कि वो डकैती के दौरान हत्या नहीं करता है। अगर कहीं ऐसा मौक़ा बनता है तो कि उसे हत्या करनी पड़े तो वो उस डकैती को ही छोड़ देता है। हाँ,अगर कोई उसे धोखा दे तब वो धोखेबाज की हत्या करने से भी नहीं चूकता है।

चूँकि देवराज चौहान डकैती मास्टर है तो अक्सर उपन्यासों का कथानक किसी न किसी डकैती को केंद्र में रख कर लिखा जाता है। और अक्सर (अक्सर इसलिए क्योंकि उपन्यास का केंद्र डकैती होना जरूरी नहीं है। जेल से फरार इसका उदाहरण है कि उपन्यास का केंद्र कुछ और भी हो सकता है।) उपन्यास में पहले डकैती की योजना बनती है, माल लूटा जाता है और उसके बाद कुछ न कुछ माल के साथ होता है देवराज चौहान और साथी उसी माल के चक्कर में यहाँ वहाँ भागे भागे फिरते हैं। इस श्रृंखला के जितने उपन्यास मैंने पढ़े हैं उसमें अक्सर यही होता है।

'वर्दी का नशा' की बात करूँ तो यह उपन्यास मुझे पसंद आया। अक्सर देवराज चौहान के उपन्यास में मैंने ये देखा है कि उपन्यास के शुरूआती कुछ ही पृष्ठों में डकैती डल जाती है और बाद के उपन्यास में रोमांच इस बात से लाया जाता है कि कोई न कोई धोखेबाज निकलता है और पूरा माल हथियाना चाहता है। और बाकि किरदार इस परिस्थिति से जूझते हैं। परन्तु यह उपन्यास इस मामले में अलग है।

250 पृष्ठ के इस उपन्यास में डकैती डालने की योजना बनाने और उसे सफल करने में डेढ़ सौ पृष्ठ लगते हैं। यानी हम देवराज के काम करने के तरीके को देखते हैं कि किस तरह वो इस मुश्किल से लग रहे काम को अपनी सूझ बूझ और तिकड़मबाजी से मुमकिन करता है। उपन्यास का बाद का हिस्सा डकैती के बाद क्या होता है यह दर्शाता है।

दोनों ही हिस्से मुझे पसंद आये। जहाँ शुरुआती हिस्से से पता चलता है कि अगर सिस्टम के अन्दर आपकी पहुँच हो तो काफी कुछ आप हासिल कर पाते हैं फिर चाहे वो दो सौ पुलिस वालों के बीच में से बेशकीमती खजाना उड़ाना ही क्यों न हो। वहीं आखिर के हिस्से में पता चलता है कि अपराधी कितना ही शातिर क्यों न हो वो कुछ न कुछ गलती करता ही है और कई बार उसका अपराधिक किरदार ही भस्मासुर की तरह उसका विनाश कर देता है।

हाँ, चूँकि उपन्यास का ढांचा इस बार बदला हुआ है तो कथानक में एक तरह का ठहराव सा है लेकिन वो कहानी के लिए उपयुक्त है। किरदारों के आपसी द्वन्द इसमें ज्यादा देखने को मिलते हैं। किस तरह किरदार अपने मन के चोर के कारण, अपनी गलतियों के कारण या अपने लालच के कारण अपने अंजाम तक पहुँचते हैं ये हमे देखने को मिलता है।

उपन्यास में ऐसे कोई कमी तो नहीं है लेकिन एक दो बातें मुझे ऐसी लगी जिसे मेहनत करके सुधारा जा सकता था।

उपन्यास में एक रहस्यमय किरदार शुरुआत से लेकर अंत तक बना रहता है। वह रहस्यमय किरदार कौन होगा ये जानने के लिए आप उपन्यास के पन्ने पलटते जाते हैं। मैं इसमें किसी ऐसे किरदार के होने की कल्पना कर रहा था जिसका नाम जब पता चले तो मुझे हैरानी हो।लेकिन अंत में यह किरदार वही निकला जो मैंने सोचा था। इससे थोड़ी निराशा तो हुई लेकिन इस चीज के बावजूद जिस तरह का अंत उपन्यास में दिखाया है उसकी कल्पना मैंने नहीं की थी तो अंत ने उस कमी को पूरा कर दिया।

उपन्यास में एक छोटी सी चीज है जिसके विषय में मैं इतना ही कहूँगा कि अगर मैं इंस्पेक्टर हूँ और किसी गाड़ी की चेकिंग कर रहा हूँ तो सबसे पहले मैं उस व्यक्ति का ड्राईवर लाइसेंस देखूँगा। इधर एक बहुत ही महत्वपूर्ण मौके पर एक बहुत ही समझदार पुलिस वाला ये काम नहीं करता है। अगर करता तो कहानी का रुख ही कुछ और होता। 

अक्सर पहले के उपन्यासों में उपन्यास के शीर्षक को सही ठहराने के लिए डायलॉग में किरदारों द्वारा वो वाक्यांश बुलवाया जाता था। ये चीज मैंने जेम्स हेडली चेस के उपन्यासों में भी देखी है और कई और हिन्दी पल्प उपन्यासों में भी देखी है। इधर भी एक अनुच्छेद ऐसा है जिसमें  वो इस उपन्यास के शीर्षक वर्दी का नशा का इस्तेमाल करते हैं। उससे बचा जा सकता था।

इन चीजों  छोड़ और कुछ ऐसा नहीं था जो मुझे खटका हो।

उपन्यास के किरदारों की बात करूँ तो उपन्यास की शुरुआत में रोशन गाड़े का चरित्र बेहतरीन तरीके से लिखा गया है। जिस तरह का सिस्टम उसने विकसित किया है वो देखने में हैरत होती है और वो रोमांच भी पैदा करता। वह किरदार यथार्थ के करीब लगता है। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसा सिस्टम भ्रष्ट पुलिस वालों ने पहले से ही स्थापित नहीं किया है। एक खबर मैंने पढ़ी थी उसमें एक पुलिस वाले ने एक चोर के साथ साँठ-गाँठ की थी और वो दोनों मिलकर इंश्योरेंस फ्रॉड करते थे। पुलिसवाला गाड़ी लेता, उसका इंश्योरेंस निकलवाता और फिर चोर से कहके उसे चोरी करवा देता। चोरी का माल बिकने में जो पैसा आता उसमें तो हिस्सा लेता ही था इसके अलावा इंश्योरेंस के पैसे भी हडप जाता था। तो गाड़े का चरित्र मुझे ऐसे ही पुलिस वाले की याद दिलाता है जो वर्दी पहनते ही खुद को वर्दी का मालिक समझने लगते हैं।  उपन्यास का शीर्षक भी इसी नशे को सम्बोधित कर रहा है कि कैसे अपनी वर्दी के नशे में अक्सर पुलिसवाले क़ानून को अपनी जागीर समझने लगते हैं। 

गाड़े के अलावा जगमोहन का चरित्र इस बार उभर कर आया है। अक्सर देवराज के साथ रहते हुए वह दब सा जाता है लेकिन इस बार एक किरदार को जब वो अपराधियों के ज़िन्दगी के विषय में बताता है तो उसके अंदर का दुःख और विषाद साफ़ दिखाई देता है। उदाहरण:

हमारे साथ बराबरी मत करो वरना दम निकल जायेगा। बहुत परेशान करने वाली ज़िंदगी है हमारी। चैन तो मिलता ही नहीं। पुलिस से तो खुद को बचाकर रहना पड़ता है और साथ ही दुश्मनों से भी सतर्क रहना पड़ता है। बहुत दुश्मन हैं हमारे। तुम क्या समझ रहे हो मज़े से जी रहे हैं।

अक्सर जब भी देवराज चौहान के उपन्यास हम पढ़ते हैं तो उनके जीवन का यह पहलू हमे नहीं दिखता है। हमे केवल रोमांच ही दिखाई देता है। ऐसे उनके मन में क्या चल रहा है यह मुझे पहली बार दिखा और अच्छा लगा।

पवन कुमार वानखेड़े जिसका देवराज चौहान के साथ छत्तीस का आँकडा है भी इस उपन्यास का हिस्सा है। उसके आने से उपन्यास में रोमांच बढ़ जाता है।  उपन्यास के बाकी किरदार भी कहानी के अनुरूप ही है। 

हाँ, उपन्यास में सबसे ज्यादा मुझे जिसने प्रभावित किया वो सोहनलाल की पत्नी नानिया थी। वो बड़ी खुर्राट है। वो अंत में आयी और जैसे उसने वानखेड़े की ऐसी तैसी की उसे देखकर मज़ा आ गया। उसे मैं दूसरे उपन्यासों में भी देखना चाहूँगा। 

उपन्यास में पार्वती के किरदार के लिए  मुझे बुरा तो लगा लेकिन लालच के अपने नुकसान होते हैं और आपको भुगतने पड़ते हैं। हमे पता होना चाहिए कि सब चीजें हमारे अनुरूप नहीं होती। कई लोग पार्वती जैसी गलती करते हैं, उन्हें दोनों हाथों में लड्डू चाहिए होता है, लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं होता है और अपने लालच के कारण उनका पतन हो जाता है और उन्हें पछताने का मौका भी नहीं मिलता है।  पार्वती मेरे ख्याल से सस्ते में ही छूट गयी थी।  

अंत में मैं तो यही कहूँगा कि उपन्यास मुझे तो बहुत पसंद आया। इसने शुरुआत से लेकर अंत तक मेरा मनोरंजन किया।  

मेरी रेटिंग: 3.5/5

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको यह कैसा लगा? अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाइयेगा। अगर आपने इसे नहीं पढ़ा है तो आप इसे निम्न लिंक से मँगवा सकते हो:
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अनिल मोहन 

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हिन्दी पल्प साहित्य

© विकास नैनवाल 'अंजान'

14 comments:

  1. लाजवाब सर। कमाल कर दिया आपने। बहुत शानदार रिव्यू है👌👌👌
    देवराज चौहान द्वारा डकैती के दौरान किसी की हत्या करने की नौबत आने पर उसे मारनें के स्थान पर डकैती को हो छोड़ देने वाली बात तो कमाल की है। इसी चीज ने पाठकों को देवराज चौहान का दीवाना बनाया है। जगमोहन वाला पार्ट भी खूब लिखा आपने। सचमुच जगमोहन का कैरेक्टर
    पाठकों की उम्मीद से कम गहराई से दिखाया जाता था। मुझे भी याद आया कि जब मैं देवराज चौहान के नॉवेल पढ़ता था तो इंतजार रहता था कि कब जगमोहन के डिटेल्ड वाले प्रसंग आयेंगें।

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    1. जी आभार सर। ब्लॉग पर आते रहियेगा।

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    2. बिल्कुल सर। नॉवेल्स पर आधारित बहुत जबर्दस्त ब्लॉग बनाया है आपने। बहुत रोचक और महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है आपके ब्लॉग से नॉवेल्स के बारे में।

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    3. जी आभार। ब्लॉग बनाने का मकसद यही है कि साहित्य को थोड़ा प्रोमोट किया जा सके।

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  2. देवराज चौहान एक बेहतरीन पात्र है। 'जेल से फरार' मुझे बहुत रोचक लगा।
    अच्छी समीक्षा

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    1. जी आभार। जेल से फरार का कथानक भी अलग सा था। देवराज चौहान जिस चीज के लिए प्रसिद्ध है उससे जुदा। मैं ऐसे और भी कथानक देवराज के पढ़ना चाहूँगा। आपको ऐसे कथानकों के विषय में पता हो तो जरूर उनकी सूची दीजियेगा।

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    2. हथियार सर। उसका कथानक भी थोड़ा अलग लगा मुझे। उस पर आपका रिव्यू भी पढ़ना चाहूंगा।

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    3. जी हथियार मिलता है तो जरूर उसे पढूँगा।

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  3. Replies
    1. जी, उपन्यास भी पाठक का भरपूर मनोरंजन करत है।

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  4. एक बेहतरीन समीक्षा। ये उपन्यास मुझे भी बहुत पसंद आया था।
    आपने रिव्यु में सभी घटनाक्रम को जीवंत कर दिया।

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    1. जी आभार। ब्लॉग पर आते रहिएगा।

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  5. अच्छी समीक्षा है | नॉवेल मिलते ही पढूंगा | देवराज चौहान सीरीज मुझे भी पसंद है

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    1. जी देवराज को पढ़ने का अपना अलग मज़ा है। मैं भी जल्द कोई उठाता हूँ। लेख आपको पसंद आया यह जानकर अच्छा लगा।

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